ऑस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र

करीब एक महीने से अधिक के ऑस्ट्रेलिया प्रवास के बाद अब लौटने की घड़ी आ पहुँची है। यह मेरी दूसरी यात्रा थी। पहली बार की जिज्ञासा इस बार कुछ अधिक तर्क और विश्लेषण में बदली, कुछ अधिक ठहराव में। दुनिया सचमुच अब सीमाओं में बंधी नहीं रह गई है; पासपोर्ट और वीज़ा हों तो मनुष्य कहीं भी जा सकता है। फिर भी, रहने और बस जाने के बीच एक महीन-सी रेखा होती है जिसे पार करने के लिए केवल अवसर नहीं, अपनापन भी चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया में इस एक महीने के दौरान बहुत कुछ देखने-समझने का अवसर मिला। वह सब भी जो विदेश आने पर एक आम आदमी अचरज से देखा है कि यहाँ का जनजीवन व्यवस्थित है, सड़कों पर अनुशासन है, सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता है लेकिन मुझे जो और सबसे बड़ी बात महसूस हुई कि काम और जीवन के बीच संतुलन है। शाम पाँच बजे के बाद अधिकांश दुकानें बंद हो जाती हैं; रेस्टोरेंट, पब और पेट्रोल पंप को छोड़ दें तो शहर जैसे अपने-अपने घरों में लौट जाता है। लोग परिवार के साथ समय बिताते हैं, समुद्र किनारे टहलते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं या अपने निजी शौकों में डूब जाते हैं।
वैलेंटाइन डे की शाम बेटी, दामाद और पत्नी के साथ समुद्र तट पर बिताए वे पल मेरी स्मृति में ठहर गए गए हैं। सजी हुई रोशनियां, खुले आसमान के नीचे परिवारों का सहज उत्सव, बच्चों की हँसी और बिना किसी कृत्रिमता के जीती हुई शाम, इन दृश्यों ने मन को छुआ। तभी समझ में आता है कि क्यों दुनिया भर से लोग यहाँ आकर बसना चाहते हैं। भारतीय हों, चीनी हों या अन्य देशों से आए लोग , यहाँ अवसर हैं, स्वतंत्रता है, और जीवन का सौंदर्य है।
फिर भी, प्रवासी होने का भाव अलग होता है। नागरिकता केवल कागज़ का दस्तावेज़ नहीं, वह स्मृतियों और जड़ों का रिश्ता भी है। ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता मिल जाने के बाद भी अधिकांश ऑस्ट्रेलियन लोग बाहरी लोगों को दिल से स्वीकार नहीं करते हैं। मेरी नातिन यहीं जन्मी है; उसके लिए यह धरती उतनी ही मातृभूमि होगी, जितनी मेरे लिए भारत है। उसकी पहचान, उसका बचपन, उसके दोस्त , सब इसी समाज से जुड़े होंगे। समय के साथ उसकी भावनाएँ भी यहीं रच-बस जाएँगी।
पर मेरे भीतर अब भी वही स्वर गूँजता है, जिसे मुहम्मद इक़बाल ने शब्द दिए थे—
सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्ताँ हमारा।
और लौटने की इस बेला में अनायास ही अमीर ख़ुसरो की पंक्तियाँ याद आती हैं—
चल ख़ुसरो घर आपने,
रैन भई चहुँ देस।
घर से इतने लंबे समय तक दूर रहना कम नहीं होता। धीरे-धीरे मन में घर की याद और चिंता सिर उठाने लगती है। अधूरे काम याद आते हैं, जि़म्मेदारियाँ आवाज़ देती हैं, अपनी मिट्टी की गंध खींचने लगती है। लगता है कि प्रवास कितना भी सुंदर क्यों न हो, अंतत: लौटना ही होता है।
यह यात्रा दूसरी थी और निश्चय ही अंतिम नहीं। आगे भी यात्राएं होंगी, नए देश होंगे, नए अनुभव होंगे। दुनिया को देखने-समझने की जिज्ञासा बनी रहेगी। आने-जाने का यह सिलसिला जीवन का हिस्सा है। पर हर यात्रा का एक पड़ाव होता है और हर पड़ाव पर एक घर प्रतीक्षा करता है।
इस लम्बे प्रवास ने बहुत कुछ दिया—नई समझ, नए लोग, नए दृश्य। बहुत कुछ अभी जानना बाकी है। पर फिलहाल मन यही कहता है—
चल खुसरो घर आपने
अब अगली कड़ी भारत भूमि से लिखी जाएगी। रायपुर की गलियों, अपने लोगों और उन अधूरे कामों के बीच, जो लौटने का अर्थ और भी गहरा बना देते हैं।