-सुभाष मिश्र
भारत सचमुच विविधताओं का देश है। यहाँ धर्म केवल पूजा की विधि नहीं, बल्कि जीवन का विस्तृत सांस्कृतिक ताना-बाना है। अलग-अलग क्षेत्रों, संप्रदायों और परंपराओं ने मिलकर इस देश की धार्मिक संरचना को इतना व्यापक बनाया है कि एक ही आस्था के भीतर भी अनेक रूप दिखाई देते हैं। लेकिन जब यही विविधता संवैधानिक मूल्यों से टकराती है, तो सवाल केवल परंपरा का नहीं रह जाता, बल्कि न्याय, समानता और अधिकारों का भी हो जाता है। केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ा विवाद इसी टकराव का सबसे तीखा उदाहरण बनकर सामने आया है। यह विवाद मूलत: महिलाओं के प्रवेश को लेकर था। एक ऐसी परंपरा, जिसमें 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। इसे भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचर्य से जोड़ा गया। वर्षों तक यह परंपरा बिना बड़े सवालों के चलती रही, यहाँ तक कि 1991 में केरल हाईकोर्ट ने भी इसे वैध ठहराया। लेकिन 2006 में जब इंडियन यंग लॉयर्स संगठन ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, तब यह मामला आस्था से निकलकर संवैधानिक अधिकारों की कसौटी पर आ गया।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए इस प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया और सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश का रास्ता खोल दिया। यह फैसला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या धार्मिक परंपराएं संविधान से ऊपर हो सकती हैं? क्या किसी आस्था के नाम पर समानता के अधिकार को सीमित किया जा सकता है?
लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने इस बहस को और जटिल बना दिया। विरोध प्रदर्शन हुए, समाज बंटा, और अंतत: मामला फिर बड़ी पीठ के पास चला गया। अब यह केवल सबरीमाला का प्रश्न नहीं रहा, बल्कि यह तय करने का प्रश्न बन गया है कि धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच सीमा रेखा कहाँ खींची जाए। इसी बीच हालिया सुनवाई में एक नया तर्क सामने आया—कुछ मंदिरों में मदिरा और मांस को भी प्रसाद के रूप में स्वीकार किया जाता है। उदाहरण के तौर पर उज्जैन का काल भैरव मंदिर, असम का कामाख्या मंदिर और पश्चिम बंगाल का तारापीठ मंदिर अक्सर इस संदर्भ में दिए जाते हैं। यहाँ तांत्रिक परंपराओं के तहत मदिरा और मांस का धार्मिक महत्व माना जाता है।
लेकिन यहीं पर यह बहस एक खतरनाक मोड़ लेती दिखाई देती है। जो मुद्दा मूलत: महिलाओं के प्रवेश और समानता का था, वह अब मदिरा, मांस और प्रसाद की प्रकृति की ओर मोड़ा जा रहा है। यह एक तरह से मूल प्रश्न से ध्यान हटाने जैसा है। सवाल यह नहीं था कि मंदिर में क्या चढ़ाया जाता है, बल्कि यह था कि मंदिर में कौन जा सकता है और कौन नहीं? इस बहस को कानूनी दांवपेंच में समानता के अधिकार को खत्म करने की साजिश माना जा रहा है।
भारत की परंपराएं विविध हैं। यह सत्य है। कुछ परंपराएं वैदिक हैं, कुछ लोक आधारित हैं, और कुछ तांत्रिक साधनाओं से जुड़ी हैं। पंच मकार जैसी अवधारणाएँ भी इन्हीं परंपराओं का हिस्सा रही हैं। लेकिन क्या इन उदाहरणों का उपयोग यह साबित करने के लिए किया जा सकता है कि किसी भी प्रकार का भेदभाव या प्रतिबंध उचित है? यह एक गंभीर प्रश्न है। केंद्र सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि अदालतों को धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, क्योंकि न्यायाधीश धर्म के विशेषज्ञ नहीं होते। साथ ही यह भी कहा गया कि कई ऐसे मंदिर हैं जहाँ पुरुषों पर भी प्रतिबंध हैं ,जैसे केरल का कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर, जहाँ पुरुषों को महिलाओं के वेश में ही प्रवेश की परंपरा है।
यह तर्क पहली नजर में संतुलन का प्रयास लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह तुलना भी अधूरी है। कहीं प्रतीकात्मक परंपराएँ हैं, तो कहीं स्थायी प्रतिबंध। कहीं आस्था का अनुष्ठान है, तो कहीं अधिकारों का हनन। इन दोनों को एक तराजू में तौलना आसान नहीं है। दरअसल, इस पूरे विवाद के केंद्र में एक बड़ा सवाल है, क्या आस्था के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार किया जा सकता है? भारत का संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 और 25 के बीच संतुलन बनाना ही इस पूरे विवाद की असली चुनौती है।
इतिहास गवाह है कि धर्म और समाज में सुधार हमेशा भीतर से भी आए हैं और बाहर से भी। कभी सती प्रथा थी, कभी मंदिरों में दलितों का प्रवेश वर्जित था, कभी महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखा गया। इन सुधारो के पहले ये भी धर्म के नाम पर बड़े सवाल माने गए थे और इन पर बहुत बवाल भी मचा था। लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे कानून के आगे सब को झुकना पड़ा। समय के साथ इन परंपराओं पर सवाल उठे और बदलाव आया। अगर हर परंपरा को केवल आस्था कहकर अछूता मान लिया जाता, तो समाज कभी आगे नहीं बढ़ता।
निदा फ़ाज़ली की पंक्तियाँ इस विविधता और सह-अस्तित्व की खूबसूरती को बहुत सरल शब्दों में व्यक्त करती हैं—
‘सबकी पूजा अलग-अलग है, सबकी अपनी रीत,
मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत।
यही भारत की आत्मा है। विविधता में एकता, भिन्नता में सम्मान। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस विविधता के भीतर समानता और गरिमा की भावना भी बनी रहनी चाहिए। गांधी जी का प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म वही है जो दूसरों के दुख को समझे और किसी के साथ भेदभाव न करे।
आज जब दुनिया तकनीक और विज्ञान के नए आयाम छू रही है, जब भारत चाँद और मंगल तक पहुँच चुका है, तब यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हम सामाजिक और धार्मिक स्तर पर भी उतनी ही प्रगति कर पा रहे हैं? या हम अब भी उन रूढिय़ों और परंपराओं में उलझे हैं जो व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता को सीमित करती हैं?
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बहस भटके नहीं। मदिरा प्रसाद है या नहीं, यह एक अलग विमर्श हो सकता है। लेकिन इसे महिलाओं के अधिकार और समानता के मूल प्रश्न के स्थान पर नहीं रखा जा सकता। अंतत: यह तय करना समाज और न्यायपालिका दोनों की जिम्मेदारी है कि कौन-सी परंपराएं हमें जोड़ती हैं और कौन-सी हमें बाँटती हैं। आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन अधिकारों की कीमत पर नहीं। परंपरा महत्वपूर्ण है, लेकिन वह अंतिम सत्य नहीं है। और संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध है ,जो यह सुनिश्चित करता है कि इस देश में किसी भी व्यक्ति की आस्था, उसकी गरिमा और उसके अधिकारों से ऊपर न हो।