आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया: चुनावी रेवडिय़ों का बढ़ता जाल

सुभाष मिश्र

देश में चुनाव अब केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं रह गए हैं, बल्कि वे धीरे-धीरे वायदों की नीलामी में बदलते जा रहे हैं। मुफ्त राशन, महिलाओं को नकद सहायता, बिजली-पानी सब्सिडी इन सबका मकसद भले ही जनकल्याण बताया जाता हो, लेकिन असल में यह एक खतरनाक आर्थिक प्रवृत्ति का रूप ले चुका है। हालात यह हैं कि कई राज्यों में ऐसी योजनाओं का बोझ कुल राजस्व का 30 से 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

छोटे राज्य सबसे ज्यादा संकट में हैं। हिमाचल प्रदेश में नकदी संकट इतना गहरा गया कि मुख्यमंत्री, मंत्रियों और कर्मचारियों तक के वेतन-पेंशन टालने पड़े। पंजाब में स्थिति और भी चिंताजनक है—जहां 1.26 लाख करोड़ की आय के मुकाबले 2.6 लाख करोड़ की योजनाओं का बोझ है। वेतन, पेंशन और ब्याज में ही 90 हजार करोड़ खर्च हो रहे हैं। यह सीधा संकेत है कि राज्य अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा खर्च का वादा कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश में ‘लाड़ली बहना जैसी योजनाओं के कारण कर्ज का स्तर त्रस्ष्ठक्क के मुकाबले 27 से बढ़कर 32 प्रतिशत हो गया। तेलंगाना में चुनावी वादों को पूरा करने के लिए हर साल करीब 1 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है, जबकि संसाधन सीमित हैं, नतीजा—योजनाएं अधर में। महाराष्ट्र में ‘लाडकी बहिन योजना का दबाव इतना बढ़ा कि पारंपरिक राशन किट जैसी योजनाएं बंद करनी पड़ीं। राजस्थान में सड़क और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के बजट में 28 प्रतिशत तक कटौती करनी पड़ी।

यह स्थिति केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि विकास के मॉडल पर सीधा सवाल है। जब सरकारें अपने सीमित संसाधनों का बड़ा हिस्सा मुफ्त वितरण में झोंक देती हैं तो बुनियादी ढांचे—सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य—पर निवेश घटता है। यानी अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए दीर्घकालिक विकास से समझौता। समस्या का एक और गंभीर पहलू है उत्पादन और श्रम पर असर। जब बिना श्रम के नकद सहायता या मुफ्त सुविधाएं मिलने लगती हैं, तो श्रम बाजार पर भी असर पड़ता है। खेती और छोटे उद्योगों में कामगारों की कमी की शिकायतें बढ़ रही हैं। इससे उत्पादन घटता है और महंगाई का दबाव बढ़ता है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि कल्याणकारी राज्य और चुनावी लालच के बीच की रेखा तेजी से धुंधली हो गई है। गरीबों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन बिना किसी उत्पादकता के सीधे नकद वितरण दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पर रोक कैसे लगे? कई बार सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई हुई, इलेक्शन कमीशन ने भी चिंता जताई, लेकिन ठोस समाधान अब तक नहीं निकला। जरूरत इस बात की है कि चुनाव घोषित होते ही हर राज्य की वित्तीय स्थिति पर एक श्वेत पत्र जारी हो। साथ ही राजनीतिक दलों को ऐसी घोषणाओं से रोका जाए जो राज्य के बजट को असंतुलित करें।

इसके अलावा, नीति आयोग जैसे संस्थानों की भूमिका भी मजबूत करनी होगी, ताकि राज्यों की दीर्घकालिक विकास योजना और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित हो सके। चुनावी घोषणाओं को भी एक जिम्मेदार ढांचे में लाने की जरूरत है, जहां हर वादे के साथ उसके वित्तीय स्रोत और प्रभाव का स्पष्ट उल्लेख हो। आज स्थिति यह है कि रेवड़ी संस्कृति पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक फैल चुकी है। चुनाव जीतने की होड़ में नीति, योजना और वित्तीय अनुशासन पीछे छूट गए हैं।

अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो भले ही देश की समग्र अर्थव्यवस्था मजबूत दिखे, लेकिन कई राज्य वित्तीय संकट और डिफॉल्ट के कगार पर पहुंच सकते हैं। लोकतंत्र में वादे जरूरी हैं, लेकिन वे जिम्मेदारी से जुड़े होने चाहिए—न कि केवल वोट पाने की रणनीति बनकर रह जाएं।

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