-सुभाष मिश्र
प्रदेश की 32 हाउसिंग बोर्ड कॉलोनियों में रहने वाले 40 हजार से अधिक परिवारों के लिए बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। कहा जा रहा है कि 31 मार्च 2026 तक वेलफेयर सोसायटियों का गठन कर कॉलोनियों का संचालन रहवासियों को सौंप दिया जाएगा। हाउसिंग बोर्ड कमिश्नर ने डिविजनल अफसरों से प्रपोजल भी मांग लिए हैं और यह दावा किया जा रहा है कि अब किसी भी तरह की देरी नहीं होगी।
सुनने में यह फैसला सुधार की दिशा में एक ठोस कदम लगता है, लेकिन ज़मीन पर तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। जनवरी का महीना निकल चुका है, मगर न तो कॉलोनियों में रहने वाले लोगों को औपचारिक सूचना दी गई है, न ही यह स्पष्ट किया गया है कि सोसायटी गठन, पंजीयन और हैंडओवर की प्रक्रिया कैसे और कब शुरू होगी। सवाल यह है कि क्या यह फैसला भी फाइलों में ही दौड़ता रहेगा, या सचमुच जमीन पर उतरेगा?
सोसायटी गठन कोई एक दिन का काम नहीं होता। रहवासियों को एकजुट करना, बैठक बुलाना, संचालन समिति बनाना, पदाधिकारियों का चयन, बायलॉज तैयार करना और फिर सहकारिता विभाग में पंजीयन—इन सबमें कम से कम डेढ़ से दो महीने लगते हैं, वह भी तब जब सभी काम बिना अड़चन के हों। लेकिन हाउसिंग बोर्ड की कॉलोनियों की हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
इन 32 कॉलोनियों में एक जैसी सामाजिक-आर्थिक स्थिति नहीं है। कई कॉलोनियाँ 10-20 साल पुरानी हैं, जहां बड़ी संख्या में बुजुर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवार रहते हैं। कई जगहों पर तो कोई अनौपचारिक समिति तक मौजूद नहीं है। कहीं सड़कें जर्जर हैं, कहीं नालियां उफान पर हैं, तो कहीं पाइपलाइन जवाब दे चुकी है। रहवासी यह पूछ रहे हैं कि हैंडओवर से पहले इन बुनियादी समस्याओं की मरम्मत होगी या नहीं—लेकिन इस सवाल का कोई जवाब उनके पास नहीं है।
दरअसल, यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। हाउसिंग बोर्ड की कॉलोनियों की हालत सालों से गिरती चली गई। मेंटेनेंस के लिए अलग से पर्याप्त बजट नहीं था। छोटे-छोटे कामों के लिए भी फाइलें महीनों घूमती रहीं। टेंडर प्रक्रिया इतनी धीमी रही कि समस्या बढ़ती गई, समाधान फाइलों में अटका रहा। ऊपर से अफसर कॉलोनियों में रहते नहीं थे, नतीजा यह हुआ कि स्थानीय समस्याओं की गंभीरता समझने में देरी होती रही और रहवासियों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े।
हालांकि, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और अन्य चुनौतियां जैसे भूमि की कमी, निर्माण सामग्री की उच्च लागत और अनौपचारिक आवास विकल्पों की बढ़ती संख्या के कारण सरकारी एजेंसियां गुणवत्तापूर्ण घर नहीं बना पा रही है। यह विशेष रूप से छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड के मामले में स्पष्ट है, जहां 2,651 घर बिक नहीं रहे, भले ही 10-30 फीसदी तक की छूट दी जा रही हो और इनकी कुल कीमत 380 करोड़ रुपये है। छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड ने पिछले 15 वर्षों में 100,000 से अधिक घर बनाए हैं, जिनमें से 85 फीसदी ईडब्ल्यूएस और एलआईजी परिवारों के लिए है और इसे कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं। सीजीएचबी के पास वर्तमान में 2,651 घर बिक्री के लिए उपलब्ध हैं, जिनकी कुल अनुमानित कीमत 380 करोड़ रुपये है। इन घरों पर 10-30 फीसदी तक की छूट दी जा रही है लेकिन फिर भी खरीदार नहीं मिल रहे हैं। मार्च 2025 तक भी 113 करोड़ रुपये के घर खाली पड़े हैं, जो जर्जर हो रहे हैं। यह संभावना है कि इन घरों की गुणवत्ता, स्थान या अन्य कारक जैसे कि बाजार की मांग और ग्राहक वरीयताएं बिक्री में बाधा डाल रही हैं।
हाउसिंग बोर्ड की स्थापना का मूल उद्देश्य लोगों को सस्ती दरों पर आवास उपलब्ध कराना था। सरकार सस्ती जमीन देगी, बोर्ड मकान और पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करेगा, यह सोच थी। लेकिन मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में यह मॉडल बुरी तरह लडख़ड़ा गया। आज हालात यह हैं कि प्राइवेट बिल्डर महंगे मकान बेच रहे हैं, लेकिन गुणवत्ता और समयबद्धता के कारण लोग वहां जाना पसंद कर रहे हैं। वहीं हाउसिंग बोर्ड के मकानों की स्थिति अक्सर खराब रहती है।
यह भी कोई रहस्य नहीं है कि हाउसिंग बोर्ड एक सरकारी उपक्रम है, जहां अध्यक्ष अक्सर कोई राजनीतिक व्यक्ति होता है, एमडी या सीईओ कोई आईएएस अफसर, और बाकी पूरा ढांचा सरकारी कर्मचारियों पर टिका होता है। न मुनाफे की चिंता, न ब्रांड की साख की फिक्र, यही वजह है कि गुणवत्ता के साथ बड़े पैमाने पर समझौता हुआ। कई कॉलोनियां ऐसी जगह बनाई गईं जहां पानी भरता है। रायपुर के सड्डू, कचना और टाटीबंध जैसी कॉलोनियां इसके उदाहरण हैं। लोगों ने जैसे-तैसे खुद को बचाया, लेकिन सिस्टम मूकदर्शक बना रहा।
नया रायपुर इसका दूसरा चेहरा दिखाता है, जहां हाउसिंग बोर्ड के कई मकान आज भी खाली पड़े हैं। न वे बिक रहे हैं, न किराए पर जा रहे हैं। रेट घटाने के बावजूद हालात नहीं बदले। इसके बावजूद हाउसिंग बोर्ड नई-नई स्कीमें लाता रहा, नई बातें करता रहा। यही वजह है कि यह सवाल पहले भी उठा था कि क्या हाउसिंग बोर्ड को राज्य परिवहन निगम की तरह बंद कर देना चाहिए?
अब बोर्ड कहता है कि कॉलोनियों में न ठीक से लाइट है, न नगर निगम की सेवाएं, न सफाई—इसलिए संचालन रहवासियों की समिति को सौंपा जाएगा। यह मॉडल प्राइवेट कॉलोनियों में पहले से लागू है, लेकिन वहां बिल्डर आमतौर पर 5-6 साल बाद जिम्मेदारी सौंपता है। यहां 20 साल बाद सिस्टम जाग रहा है। नीयत पर शक करना जरूरी नहीं, लेकिन इतनी देर से उठाए गए कदम के नतीजे क्या होंगे, यह सवाल जायज है।
कहा जाता है कि सरकार को बिजनेस नहीं करना चाहिए, उसे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए। हाउसिंग बोर्ड और राज्य परिवहन जैसी संस्थाएं बार-बार यह याद दिलाती हैं कि जब सरकार बिजनेस करती है, तो अक्सर जवाबदेही और गुणवत्ता दोनों कमजोर पड़ जाती हैं। आज हाउसिंग बोर्ड कह रहा है कि अब सब कुछ समय पर होगा, 31 मार्च से पहले प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। लेकिन रहवासी यह पूछने के हकदार हैं—क्या यह सिर्फ एक और घोषणा है, या सचमुच जमीन पर बदलाव आएगा?
क्योंकि हाउसिंग बोर्ड वर्षों से यही कहता आया है कि वह मकान नहीं, घर बनाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि घर केवल दीवारों से नहीं बनते—वे भरोसे, रखरखाव और जिम्मेदारी से बनते हैं। और इन तीनों की कमी ने ही हाउसिंग बोर्ड को आज इस मुकाम पर ला खड़ा किया है।
‘बड़ी देर कर दी मेहरबान आते-आतेÓ और डर यह है कि कहीं ऐसा न हो कि इस बार भी आते-आते ही रह जाएँ।