-सुभाष मिश्र
विवाह भारतीय समाज में कभी केवल दो व्यक्तियों के बीच का निजी संबंध नहीं रहा। यह एक संस्कार था—जहां परिवार, समाज और धर्म साझी भूमिका निभाते थे। अग्नि को साक्षी मानकर लिए गए फेरे हों, निकाह में ‘कुबूल है की सहमति हो या चर्च और गुरुद्वारे में निभाई गई रस्में। हर जगह विवाह का आशय एक ही था: स्थायित्व, भरोसा और सामूहिक जिम्मेदारी।
लेकिन आज विवाह की परिभाषा नहीं, उसकी भाषा बदल रही है। सात फेरों की जगह शर्तें आ रही हैं और वचन की जगह समझौते। आज की पीढ़ी विवाह को भावना से ज़्यादा संरचना की तरह देखने लगी है—एक ऐसा ढांचा जिसमें प्रेम हो, लेकिन अस्पष्टता नहीं। यह बदलाव किसी वैचारिक विद्रोह का नतीजा नहीं, बल्कि बदली हुई जीवन-स्थितियों की उपज है। आज का समाज अस्थिर है—नौकरियाँ अस्थायी हैं, करियर सीधी रेखा में नहीं चलते, फ्रीलांस और गिग इकॉनामी ने सुरक्षा की जगह जोखिम को सामान्य बना दिया है। स्टूडेंट लोन, होम लोन और ईएमआई जीवन की शुरुआती सच्चाइयां बन चुकी है। ऐसे में विवाह भावनाओं का नहीं, बल्कि जोखिम साझा करने का निर्णय बनता जा रहा है।
इसी संदर्भ में प्रीनअप जैसी अवधारणाएं उभरती है। नई पीढ़ी के लिए यह अविश्वास का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक साफ़ बातचीत है। वे प्रेम से इनकार नहीं कर रहे, बल्कि यह मान रहे हैं कि प्रेम अकेला पर्याप्त नहीं होता। इसलिए वे विवाह से पहले आय, कजऱ्, जिम्मेदारियों और संभावित अनिश्चितताओं पर बात करना ज़रूरी समझते हैं। उनके लिए यह भावनात्मक कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता है।
यहाँ तकनीक की भूमिका निर्णायक है। सोशल मीडिया और डिजिटल जीवन ने रिश्तों को तेज़ किया है, लेकिन गहराई को चुनौती भी दी है। विकल्पों की भरमार ने रिश्तों को उपभोक्तावादी नजऱ से देखने की प्रवृत्ति बढ़ाई है जहां हर संबंध एक तरह का निवेश लगता है। बाज़ार की भाषा—जोखिम, सुरक्षा, शर्तें, लाभ—अब निजी जीवन में भी प्रवेश कर चुकी है।
दिलचस्प यह है कि जहां विवाह को अनुबंध की तरह समझा जा रहा है, वहीं विवाह के बाहर रहने वाले रिश्तों—लिविंग रिलेशनशिप के लिए भी न्यायालयों को नियम तय करने पड़े हैं। अदालतें यह स्वीकार कर चुकी हैं कि लंबे समय तक साथ रहना अपने-आप में अधिकार और जिम्मेदारियां पैदा करता है। यानी समाज भले भावनाओं की भाषा बोले, लेकिन कानून अब रिश्तों को व्यवहार और दायित्व के चश्मे से देख रहा है।
संयुक्त परिवारों का विघटन, निजता की बढ़ती माँग, स्त्री-पुरुष की बदलती भूमिकाएं, आर्थिक स्वावलंबन और रिश्तों में बराबरी की अपेक्षा—इन सबने विवाह को एक पवित्र संस्था से अधिक समझौते की प्रक्रिया बना दिया है। आज की पीढ़ी निभाने से पहले समझने पर ज़ोर देती है, क्योंकि टूटन के सामाजिक और मानसिक दुष्परिणाम वे पहले से देख चुके हैं।
प्रीनअप न तो रिश्तों का शत्रु है और न ही उनका समाधान। यह एक औज़ार है जो यह तय करता है कि संबंध डर से बना है या संवाद से। सही भावना से किया गया अनुबंध रिश्ते को सुरक्षा दे सकता है, लेकिन अगर यही अनुबंध भावनाओं का विकल्प बन जाए, तो संबंध केवल कानूनी ढांचा रह जाता है, रिश्ता नहीं।
भारतीय समाज आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां संस्कार और अनुबंध एक-दूसरे को नकार नहीं रहे, बल्कि साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं। सात फेरों की नहीं, अनुबंध की शादी किसी परंपरा का अंत नहीं, बल्कि यह संकेत है कि समाज बदल रहा है—तेजी से, जटिलता के साथ और नए सवालों के बीच।
सवाल यह नहीं है कि विवाह संस्कार रहेगा या अनुबंध बनेगा। सवाल यह है कि इस बदलती संरचना में मानव संवेदना, भरोसा और बराबरी को हम कितना बचा पाते हैं। यही इस समय की असली सामाजिक बहस है।
Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – सात फेरों की नहीं, अनुबंध की शादी

27
Dec