Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से: अश्लीलता का कारोबार- किसी की मजबूरी, किसी का मनोरंजन

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से: अश्लीलता का कारोबार- किसी की मजबूरी, किसी का मनोरंजन

समाज में धीरे-धीरे अश्लीलता की स्वीकारिता बढ़ती जा रही है। एक ओर जब हिजाब की बात हो रही हो, लड़कियों के पहनावे, जीवनशैली पर सवाल उठ रहे हैं, वही दूसरी तरह स्टेज और स्क्रीन पर लड़कियों को अद्र्धनग्न देखने, उनके साथ नाच-गाने की आड़ में मजे लेने की लालसा भी बढ़ रही है। पहले यह काम कुछ सामंत किस्म के लोगों, पैसे वाले दबंगो और कुछ कथित उच्चपुलीन लोगों के शादी ब्याह और अन्य आयोजनों तक सीमित थे। अब धीरे-धीरे उसका सार्वजनिक प्रदर्शन होने लगा है। सोने पर सुहागा तो तब हो जाता है, जब इसमें पुलिस प्रशासन और नेतानगरी की स्वीकृति सहमति और दबी हुई आदिम इच्छाएं प्रकट होने लगती है।

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और सूरजपुर में सामने आए हालिया मामले केवल दो जिलों की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे उस व्यापक सामाजिक-प्रशासनिक संकट का प्रतीक हैं, जिसमें अश्लीलता धीरे-धीरे सामान्य मनोरंजन के रूप में स्वीकार की जा रही है। एक ओर मंच पर नाचती देह, उड़ते नोट और मोबाइल कैमरों में कैद दृश्य हैं, तो दूसरी ओर सत्ता, कानून और नैतिकता की ऐसी खामोशी है, जो सवालों से बचती दिखती है। यह सवाल अब केवल ‘अश्लील डांस’ का नहीं रह गया है, बल्कि उस मानसिकता का है, जिसने इसे बाजार, मजबूरी और मनोरंजन के त्रिकोण में बदल दिया है।

भारत जैसे समाज में विवाह, सांस्कृतिक आयोजन और सरकारी कार्यक्रम हमेशा से सामाजिक मूल्यों के संवाहक रहे हैं। ये आयोजन केवल खुशी या उत्सव के अवसर नहीं, बल्कि सामूहिक नैतिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होते हैं। लेकिन बीते वर्षों में इन मंचों पर जो बदलाव दिखा है, वह चिंता पैदा करने वाला है। फूहड़ गीत, उत्तेजक नृत्य और मर्यादा-विहीन प्रस्तुतियां अब अपवाद नहीं रहीं, बल्कि कई जगहों पर ‘डिमांड’ बन चुकी हैं। यह मांग सिर्फ आयोजकों की नहीं, बल्कि उस दर्शक वर्ग की भी है, जो पैसे के दम पर हर चीज को खरीदने का अधिकार अपने पास मान बैठा है।

अश्लीलता का यह कारोबार दो ध्रुवों पर खड़ा है। एक तरफ वे लोग हैं, जिनके लिए यह मजबूरी है—आर्थिक, सामाजिक और कभी-कभी पारिवारिक। अश्लील डांस करने वाली अधिकांश युवतियां या कलाकार किसी सुरक्षित, सम्मानजनक विकल्प की स्थिति में नहीं होतीं। गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव और सामाजिक असमानता उन्हें ऐसे कामों की ओर धकेलती है, जहां देह ही पूंजी बन जाती है। दूसरी तरफ वे लोग हैं, जिनके लिए यह शुद्ध मनोरंजन है, ऐसा मनोरंजन, जिसमें महिला की देह, उसका अधनंगापन और उसकी असहजता भी ‘एंटरटेनमेंट पैकेज’ का हिस्सा होती है। यही असमानता इस कारोबार की असली सच्चाई है।
समस्या तब और गहरी हो जाती है, जब यह सब प्रशासनिक अनुमति, पुलिस की मौजूदगी और सरकारी परिसरों तक पहुंच जाता है। गरियाबंद का मामला इसीलिए ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि वहां अश्लीलता किसी छिपे कमरे में नहीं, बल्कि अनुमति प्राप्त सार्वजनिक मंच पर हुई। सूरजपुर का मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि सरकारी रेस्ट हाउस जैसी संपत्ति का नाम इस तरह के वीडियो से जुड़ा। यह घटनाएं बताती हैं कि समस्या केवल सामाजिक नहीं, बल्कि संस्थागत भी है। कानून मौजूद है, लेकिन उसका अमल चयनात्मक दिखता है, जब तक वीडियो वायरल न हो, तब तक व्यवस्था सोई रहती है।

इस पूरी प्रक्रिया में ओटीटी प्लेटफॉर्म और डिजिटल संस्कृति की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वेब सीरीज, फिल्मों और सोशल मीडिया कंटेंट में जिस तरह से बोल्डनेस और अश्लीलता को ‘नॉर्मल’ किया गया है, उसने सामाजिक संवेदनशीलता की सीमा को धुंधला किया है। जब स्क्रीन पर हर चीज जायज लगने लगे, तो मंच और मैदान पर भी वही मानसिकता उतर आती है। हालांकि ओटीटी अकेला कारण नहीं है, लेकिन यह जरूर सच है कि उसने अश्लीलता को एक तरह की वैधता और स्वीकार्यता दी है।
लोककलाओं का पतन इस बहस का सबसे दुखद पक्ष है। मुजरा, लौंडा नाच, नचनियां और बेडऩी जैसे नृत्य कभी संस्कृति, व्यंग्य और सौंदर्यबोध के माध्यम थे। आज बाजार और भीड़ की मांग ने इन्हें फूहड़ता के प्रतीक में बदल दिया है। दोष कला का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है, जिसने कलाकारों को संरक्षण देने के बजाय उन्हें ठेकेदारों और दर्शकों की दया पर छोड़ दिया। यही वजह है कि आज लोककला की पहचान भी अश्लीलता से जोड़ दी जाती है, जो एक सांस्कृतिक अन्याय है।
विदेशी लड़कियों को बुलाकर शादी या निजी आयोजनों में अश्लील नाच कराने का चलन इसी मानसिकता का ‘अपग्रेडेड’ संस्करण है। यहां अश्लीलता को ‘इंटरनेशनल’ टैग देकर और महंगा बनाकर परोसा जाता है। वीज़ा नियम, श्रम कानून और स्थानीय अनुमति—सब कुछ नजरअंदाज कर दिया जाता है, क्योंकि मांग है और पैसा है। यह दिखाता है कि समस्या किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के हर स्तर में मौजूद है।

असली सवाल यह है कि हम दोषी किसे मानें—नाचने वाली युवती को, आयोजन करने वाले को, देखने वाले को या अनुमति देने वाले को? सच्चाई यह है कि दोष सामूहिक है। जब समाज चुप रहता है, जब प्रशासन आंख मूंदता है और जब कानून केवल कागज पर सख्त रहता है, तब अश्लीलता एक ‘नॉर्मल बिजनेस’ बन जाती है।
समाधान नैतिक भाषणों से नहीं आएगा। इसके लिए स्पष्ट नियम, सख्त निगरानी और बिना भेदभाव कार्रवाई जरूरी है। आयोजनों की अनुमति केवल औपचारिकता न रहे, बल्कि लाइव मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय हो। कलाकारों के लिए वैकल्पिक और सम्मानजनक आजीविका के रास्ते खोले जाएं। और सबसे जरूरी—दर्शक की मानसिकता बदले, क्योंकि मांग खत्म होगी, तभी बाजार भी सिमटेगा।
अश्लीलता का यह कारोबार किसी की मजबूरी और किसी का मनोरंजन—दोनों का आईना है। सवाल यह है कि हम किस तरफ खड़े होना चाहते हैं। यदि व्यवस्था और समाज ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह कारोबार और ‘सोफिस्टिकेटेड’ होगा, और मर्यादा, संस्कृति व कानून—तीनों पीछे छूटते चले जाएंगे।

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