-सुभाष मिश्र
भारतीय समाज में विवाह परंपरागत रूप से संस्कार, मर्यादा और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक रहा है। लेकिन बीते डेढ़-दो दशक में विवाह धीरे-धीरे इवेंट, ब्रांडिंग और सोशल स्टेटस शो में बदलता गया।
प्री-वेडिंग शूट उसी बदलाव की सबसे दृश्य अभिव्यक्ति है जहां विवाह से पहले ही पति-पत्नी की भूमिका का प्रदर्शन होने लगता है, जबकि सामाजिक और कानूनी रूप से रिश्ता अभी तय भी नहीं होता। यहाँ समस्या केवल नैतिकता की नहीं, बल्कि अपेक्षाओं के कृत्रिम निर्माण की है। कैमरे के सामने रची गई परफेक्ट केमिस्ट्री जब वास्तविक जीवन से टकराती है, तो टूटन, इनकार और विवाद बढ़ते हैं, जिसकी ओर समाज का ध्यान जाना स्वाभाविक है।
भारतीय समाज में विवाह कभी केवल दो व्यक्तियों का निजी निर्णय नहीं रहा, बल्कि वह परिवार, बिरादरी और समुदाय की सामूहिक व्यवस्था का हिस्सा रहा है। समय के साथ समाज बदला, अर्थव्यवस्था बदली, शिक्षा और रोजग़ार के नए अवसर खुले और उसी के साथ विवाह की प्रकृति भी बदलती चली गई। आज विवाह कई जगह संस्कार से अधिक एक आयोजन, एक प्रदर्शन और सामाजिक हैसियत के सार्वजनिक इज़हार का माध्यम बनता जा रहा है। प्री-वेडिंग शूट, डेस्टिनेशन वेडिंग और सोशल मीडिया पर विवाह को ‘परफेक्ट लव स्टोरीÓ की तरह पेश करने की होड़ इसी बदलाव का परिणाम है।
छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ द्वारा प्री-वेडिंग शूट पर पूर्ण प्रतिबंध का निर्णय इसी पृष्ठभूमि में सामने आया है। समाज का तर्क है कि इस तरह के दिखावे से फिजूलखर्ची बढ़ रही है, पारंपरिक मर्यादाएँ कमजोर हो रही हैं और विवाह से पहले लड़के-लड़कियों के बीच वह दूरी समाप्त हो रही है जो परंपरागत सामाजिक संरचना में मानी जाती रही है। समाज यह भी मानता है कि कई मामलों में प्री-वेडिंग शूट के बाद ही विवाह टूट जाने की घटनाएँ सामने आई हैं, जिससे परिवार और समाज दोनों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसी चिंता के तहत संस्कार शिविर, पारिवारिक काउंसलिंग और अंतरजातीय विवाह को हतोत्साहित करने जैसे निर्णय लिए गए हैं। लेकिन यह निर्णय केवल साहू समाज तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समुदाय अपने-अपने तरीके से विवाह को नियंत्रित करने की कोशिश करते रहे हैं। कहीं खान-पान सीमित किया गया, कहीं खर्च की सीमा तय की गई, कहीं जाति के बाहर विवाह पर सामाजिक दंड का प्रावधान किया गया। हरियाणा की खाप पंचायतों से लेकर छत्तीसगढ़ के सामाजिक संगठनों तक, यह प्रवृत्ति इस बात का संकेत है कि समाज तेज़ी से बदलती जीवन-शैली से असहज है और पुराने ढाँचों को बचाने की कोशिश कर रहा है।
इसी बीच आंकड़े एक दूसरी कहानी कहते हैं। भारत में तलाक की दर आज भी दुनिया के कई देशों की तुलना में बहुत कम मानी जाती है, करीब एक प्रतिशत के आसपास। इसके बावजूद पिछले एक-दो दशकों में शहरी क्षेत्रों और शिक्षित युवा वर्ग में तलाक के मामलों में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। विवाह टूटने के कारण केवल अंतरजातीय विवाह या आधुनिक जीवन-शैली नहीं हैं, बल्कि अपेक्षाओं का टकराव, आर्थिक दबाव, पारिवारिक हस्तक्षेप और भावनात्मक अपरिपक्वता भी उतने ही बड़े कारण हैं। विवाह को जितना ज़्यादा एक परफेक्ट प्रोजेक्ट की तरह पेश किया जाता है, वास्तविक जीवन में असफलता की पीड़ा उतनी ही गहरी हो जाती है। विवाह से जुड़ा एक और कड़वा सच दहेज प्रताडऩा और घरेलू हिंसा के आँकड़ों में दिखाई देता है। हर साल हजारों दहेज-संबंधी मामले दर्ज होते हैं और सैकड़ों महिलाओं की मौत दहेज के कारण हो जाती है। कानून होने के बावजूद सजा की दर कम है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल नैतिक उपदेशों से हल नहीं हो रही। यह विडंबना ही है कि एक ओर समाज दिखावे और प्री-वेडिंग शूट को संस्कारों के लिए खतरा मानता है, वहीं दूसरी ओर वही समाज दहेज जैसी कुप्रथा को पूरी कठोरता से समाप्त करने में अब भी असफल दिखता है।
अंतरजातीय विवाह को लेकर भी यही द्वंद्व दिखाई देता है। सरकारें इन्हें सामाजिक समरसता के लिए प्रोत्साहित करती हैं, जबकि कई समाज इन्हें अपनी जातीय अस्मिता के लिए खतरा मानते हैं। यह तर्क दिया जाता है कि अंतरजातीय विवाह से तलाक बढ़ रहे हैं, लेकिन आँकड़े यह भी बताते हैं कि टूटते रिश्तों के पीछे केवल जाति नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ अधिक जिम्मेदार हैं। पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ, जो महानगरों या विदेशों में काम कर रहे हैं, वे सामाजिक दंड और बहिष्कार से कम प्रभावित होते हैं, जबकि गांवों और छोटे कस्बों में रहने वाले लोग आज भी समाज के नियमों के अधीन हैं। यहीं से असमानता पैदा होती है, नियम कमजोर पर लागू होते हैं और ताकतवर उनसे बाहर निकल जाते हैं।
साहू समाज का निर्णय इसलिए एक उदाहरण भर नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक बेचैनी का प्रतीक है जो आज भारतीय समाज के भीतर चल रही है। सवाल यह नहीं है कि प्री-वेडिंग शूट सही है या गलत, सवाल यह है कि क्या समाज बदलती वास्तविकताओं को समझे बिना केवल प्रतिबंधों के सहारे अपनी परंपराओं को बचा सकता है। जब लिव-इन रिलेशनशिप, ऑनलाइन रिश्ते और व्यक्तिगत पसंद सामाजिक सच बन चुके हों, तब आदेश और दंड कितने प्रभावी रहेंगे, यह विचार का विषय है। विवाह की संस्था को बचाने के लिए सादगी, संवाद और समझदारी की ज़रूरत है, न कि केवल निषेध और भय की। समाज को शायद सबसे पहले अपने ही प्रतिबिंब को देखना होगा कि समस्या केवल नई पीढ़ी के व्यवहार में नहीं, बल्कि उस ढांचे में भी है जो दिखावे, दहेज और असमानता को अब तक ढोता चला आ रहा है।