Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – बेटी का दान या जाति का अपमान

-सुभाष मिश्र

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में उठा हालिया विवाद, प्रशासनिक बयान की मर्यादा से कहीं आगे जाकर, समाज की सामूहिक सोच के कठघरे में खड़ा हो गया। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा ने आरक्षण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए, जब तक कोई ब्राह्मण मेरी बेटी दान में न दे—वह भले ही दो ‘सेकंडÓ की क्लिप में वायरल हुआ, पर इसके मूल में सदियों से चली आ रही जातीय स्मृतियों और सामाजिक दूरी की बेचैनी साफ झलकती है।
यहाँ प्रश्न आरक्षण बनने-बिगडऩे का कम, और उस वाक्य में छिपी मानसिकता का अधिक है। एक तरफ वंचित वर्ग का हिस्सा आज भी अपने अतीत के अपमानों को वर्तमान की संरचना में महसूस करता है, जिसकी आवाज़ कभी विमर्श बनती है, कभी आक्रोश। दूसरी ओर, विरोध की भाषा भी कई बार संयम नहीं, बल्कि प्रतिशोध से जन्म लेती दिखाई देती है। प्रदर्शन, इनाम, घोषणाएं, पुतला दहन और व्यक्तिगत बर्खास्तगी की मांगें बताती हैं कि हम तर्क नहीं, चोट के जवाब में चोट देने की प्रवृत्ति में उलझे हैं।
इसी विमर्श में, साहित्यिक पंक्तियाँ भी अक्सर तलवार की तरह चलाई जाती हैं। तुलसीदास की चौपाई ढोर, गँवार, शूद्र, पशु, नारी को समाज का एक हिस्सा आज भी जातीय अपमान के प्रमाण-पत्र की तरह पेश करता है, जबकि वह 16वीं सदी की सामाजिक संरचना, बोली और मुहावरे में रचा गया कथ्य था। उसे वर्तमान की कसौटी पर संदर्भ से काटकर दोषारोपण करना उतना ही अनुचित है, जितना किसी समुदाय की गरिमा पर चोट करना।
इस पूरे बवाल में, सबसे गंभीर पक्ष वह है, जिस पर सबसे कम बात हो रही है, कन्यादान को बेटी के दान की तरह शब्दश: पढऩा। हिंदू समाज में कन्यादान एक आस्था आधारित धार्मिक परंपरा है, जिसमें बेटी को सम्मानपूर्वक अग्नि और साक्षी भाव में गृहस्थी के लिए समर्पित किया जाता है। यहां दान वस्तु का नहीं, जिम्मेदारी और संबंध की पवित्रता का प्रतीक है पर यदि कोई इसे भाषाई हथियार बनाकर यह आशय दें कि बेटी दान की कोई चीज़ है और उसे एक जाति से दूसरी जाति के हाथ सौंपा जाएगा या नहीं तो यह लड़की की गरिमा, स्वायत्तता और मानव अधिकार को चोट पहुँचाता है।
हमारे संविधान और यूनिवर्सल डिक्लरेशन आफ ह्यूमन राइट्स यह स्पष्ट कहते हैं कि हर मनुष्य स्त्री या पुरुष, किसी भी जाति का सम्मान और समान गरिमा का अधिकारी है पर समाज के भीतर बैठी सच्चाई भिन्न है। आज भी विवाह में, ‘रोटी-बेटीÓ का रिश्ता, जाति के ताने-बाने से सबसे अधिक प्रभावित होता है। हर वर्ग—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अपने भीतर के रिश्तों को प्राथमिकता देता रहा है। यह सामाजिक संरचना का अपना पक्ष है पर यह प्राथमिकता किसी को यह अधिकार नहीं देती कि वह समानता की मूल भावना का मखौल उड़ाए, या किसी महिला को उसकी मर्जी से अलग पहचान के नाम पर सौंपे जाने योग्य वस्तु माने।
समाज विरोधाभास से भरा है एक तरफ बेटियां पढ़ रही हैं, आत्मनिर्भर हैं, अपने लिए जीवन साथी चुन रही हैं। दूसरी तरफ, आधुनिक शिक्षा के बावजूद, संवाद जातीय अहंकार और कुंठाओं की तीखी बोली में ढल जाता है। यह केवल प्रशासनिक विवाद नहीं, विचारों की टकराहट में स्त्री की मानवीय पहचान को भूल जाने का सामाजिक संकट है।
यदि हम सचमुच जाति की दीवारों से ऊपर उठना चाहते हैं, तो शुरुआत कानून से नहीं भाषा और भावनात्मक सम्मान से करनी होगी। तब समझ आएगा कि कन्या दान में दी जाने वाली वस्तु नहीं जीवन में बराबरी की हकदार स्वतंत्र चेतना है।

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