नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की कथित “कॉकरोच” और “परजीवी” संबंधी टिप्पणी को लेकर देशभर में छिड़ा विवाद अब राजनीतिक और वैचारिक बहस का बड़ा विषय बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद Manoj Jha ने मुख्य न्यायाधीश के नाम एक खुली चिट्ठी लिखकर तीखी आपत्ति दर्ज कराई है। सोशल मीडिया पर साझा की गई इस चिट्ठी में उन्होंने कहा कि इस तरह की भाषा केवल कुछ व्यक्तियों के लिए इस्तेमाल किए गए शब्द नहीं हैं, बल्कि इससे न्यायपालिका की संवैधानिक गरिमा, लोकतांत्रिक संस्कृति और असहमति के अधिकार को लेकर चिंताजनक संकेत मिलते हैं।

मनोज झा ने अपनी चिट्ठी में लिखा कि जब देश का सर्वोच्च न्यायिक पद संभालने वाला व्यक्ति बेरोजगार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडिया कर्मियों और असहमति रखने वालों के लिए “कॉकरोच” और “परजीवी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो यह केवल भाषाई असंवेदनशीलता नहीं रह जाती, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को आहत करने वाली स्थिति बन जाती है। उन्होंने कहा कि किसी संवैधानिक पद की वास्तविक शक्ति उसके अधिकारों से नहीं, बल्कि उसके संयम, संवेदनशीलता और संवैधानिक नैतिकता से तय होती है।
अपने पत्र में आरजेडी सांसद ने यह भी लिखा कि इतिहास में अमानवीकरण की भाषा हमेशा असहिष्णुता की पहली सीढ़ी रही है और न्यायपालिका से अपेक्षा की जाती रही है कि वह लोकतांत्रिक संवाद को गरिमा प्रदान करे, न कि उसे और कठोर बनाए। उन्होंने बेरोजगार युवाओं की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि आज देश का शिक्षित युवा भर्ती में देरी, प्रश्नपत्र लीक, संविदा आधारित नौकरियों और अवसरों की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में उनकी बेचैनी को “परजीविता” कह देना उस पीढ़ी का अपमान है, जो पहले से ही असुरक्षा और अनिश्चितता के बोझ तले दबा हुआ है।
मनोज झा ने सूचना के अधिकार आंदोलन और खोजी पत्रकारिता का भी बचाव किया। उन्होंने लिखा कि आरटीआई कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र पत्रकारों ने लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत करने के लिए व्यक्तिगत जोखिम उठाए हैं और कई लोगों ने अपनी जान तक गंवाई है। ऐसे लोगों को संदेह की नजर से देखना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने कहा कि यदि आलोचना को राष्ट्र-विरोध या व्यवस्था-विरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगे, तो लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।
चिट्ठी में सोशल मीडिया पोस्ट और वकीलों की ऑनलाइन अभिव्यक्तियों को लेकर की गई टिप्पणियों पर भी सवाल उठाए गए। मनोज झा ने कहा कि पेशेगत अनुशासन आवश्यक है और फर्जी डिग्रियों की जांच होनी चाहिए, लेकिन आलोचना और असहमति को संस्थागत संदेह का आधार बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने लिखा कि न्यायपालिका से अपेक्षा होती है कि वह असहमति की आवाजों की रक्षा करे, न कि उन्हें कलंकित करे।
अपने पत्र के अंत में उन्होंने कहा कि भारत के बेरोजगार युवा, आरटीआई कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार और असहमति रखने वाले नागरिक लोकतंत्र में “कीड़े-मकोड़े” नहीं हैं, बल्कि वही वे स्वर हैं जिनसे लोकतंत्र सांस लेता है और उम्मीद कायम रहती है।
इधर विवाद बढ़ने और सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना के बाद मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने भी अपनी सफाई पेश की है। उन्होंने कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया और उसका संदर्भ तोड़-मरोड़ दिया गया। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य देश के युवाओं का अपमान करना नहीं था। उन्होंने कहा कि सुनवाई के दौरान उनकी टिप्पणी विशेष रूप से उन लोगों के संदर्भ में थी, जो फर्जी और जाली डिग्रियों के जरिए वकालत जैसे प्रतिष्ठित पेशों में अवैध तरीके से प्रवेश कर लेते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे अयोग्य और फर्जी लोग केवल न्यायिक व्यवस्था ही नहीं, बल्कि मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं और व्यवस्था को भीतर से नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने इन्हीं लोगों को “परजीवी” कहकर संबोधित किया था। जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि उन्हें दुख है कि उनकी मौखिक टिप्पणी को इस तरह प्रस्तुत किया गया, जिससे यह संदेश गया कि उन्होंने देश के युवाओं को अपमानित किया है।
हालांकि सफाई आने के बाद भी यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग न्यायपालिका की भाषा, संवैधानिक मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बहस कर रहे हैं। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की आलोचना और संस्थागत गरिमा के बीच संतुलन किस प्रकार कायम रखा जाए।