आधी आबादी की मेहनत: क्या सचमुच सशक्तिकरण की ओर बढ़ रहे हैं कदम?

-सुभाष मिश्र

अभी हाल ही में हमने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को लेकर काफी बातचीत की और महिलाओं को उनके क्षेत्र में आने वाली दिक्कतों के बारे में भी काफी बातें हुई अब हम यह देख रहे हैं कि जमीनी हकीकत क्या है और क्या वाकई में महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलंबी हैं ? या सरकार की जो मनभावन योजनाएं हैं क्या वे महिलाओं को एक वोट बैंक के रूप में भी देखने की कोशिश है उसके जरिए फौजी तरीके से तो कहीं यह स्वावलंबन नहीं हो रहा है इसको लेकर भी विमर्श की जरूरत है
भारत में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की चर्चा पिछले कुछ वर्षों में बहुत तेज़ हुई है। केंद्र और राज्यों की सरकारें भी महिलाओं के नाम पर अनेक योजनाएं चला रही हैं। कहीं महिलाओं को मासिक आर्थिक सहायता दी जा रही है, कहीं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उन्हें उद्यमिता से जोड़ा जा रहा है और कहीं लखपति दीदी जैसी योजनाओं के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। लेकिन यदि इस पूरी तस्वीर को थोड़ा गहराई से देखें तो कई सवाल खड़े होते हैं—क्या सचमुच महिलाओं के लिए स्थायी आय के अवसर बन रहे हैं या फिर यह केवल योजनाओं और आंकड़ों का एक आकर्षक नैरेटिव भर है?
दरअसल, कई राज्यों में यह देखा गया है कि महिलाओं को आजीविका के नाम पर मुख्यत: कृषि और उससे जुड़े कार्यों में ही जोड़ा जा रहा है। जबकि भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती पहले से ही छिपी हुई बेरोजगारी का बड़ा क्षेत्र मानी जाती है। जब किसी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या आवश्यकता से अधिक होती है तो वहां उत्पादकता नहीं बढ़ती, केवल श्रम का बंटवारा होता है। ऐसे में यदि महिलाओं को उसी क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो यह आय के नए अवसर पैदा करने की बजाय श्रम का पुनर्वितरण मात्र रह जाता है।
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो महाराष्ट्र में लगभग 22.69 लाख, आंध्र प्रदेश में 17.41 लाख और बिहार में 14.47 लाख महिलाएँ लखपति दीदी के रूप में दर्ज की गई हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में यह संख्या लगभग 4.32 लाख बताई जाती है। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य में स्वयं सहायता समूहों का नेटवर्क सक्रिय है, लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि केवल संख्या बढऩे से आर्थिक सशक्तिकरण की गारंटी नहीं मिलती। असली सवाल यह है कि क्या इन महिलाओं की आय में वास्तव में स्थायी और उल्लेखनीय वृद्धि हुई है?
समस्या यह भी है कि इस योजना के अंतर्गत राज्यवार विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि कितनी महिलाओं को किस प्रकार का कौशल प्रशिक्षण दिया गया, कितनी महिलाओं को ऋण मिला और कितनी महिलाओं ने प्रशिक्षण के आधार पर स्थायी आय का स्रोत विकसित किया। कई स्थानों पर यह देखा गया है कि जो महिलाएं पहले से ही कृषक समुदाय से जुड़ी थीं, उन्हीं को चुनकर प्रशिक्षण दे दिया गया। इस कारण योजना का प्रभाव वास्तविक उद्यमिता के बजाय सीमित दायरे में सिमटता दिखाई देता है।
यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि कौशल विकास का स्तर क्या है। क्या महिलाओं को अत्याधुनिक तकनीक, डिजिटल कौशल, आधुनिक उद्योगों या सेवा क्षेत्र से जोडऩे की दिशा में प्रशिक्षण दिया जा रहा है, या फिर सामान्य स्तर के छोटे-मोटे व्यवसाय आरंभ करने का प्रशिक्षण ही दिया जा रहा है? यदि प्रशिक्षण केवल परंपरागत गतिविधियों तक सीमित है तो इससे आय में बड़ी छलांग लगने की संभावना भी सीमित ही रहती है। चूंकि, इस विषय में ठोस और पारदर्शी आंकड़े सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इस योजना का तथ्यपरक मूल्यांकन भी कठिन हो जाता है।
महिला श्रम भागीदारी के आंकड़े भी इस चर्चा को और जटिल बना देते हैं। हाल के वर्षों में भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2017-18 में यह लगभग 23.3 प्रतिशत थी जो 2023-24 में बढ़कर लगभग 41.7 प्रतिशत तक पहुँच गई है। पहली नजर में यह आंकड़ा उत्साहजनक लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि इस वृद्धि का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और घरेलू उद्यमों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से आया है—जहां अक्सर काम अवैतनिक होता है या बहुत कम आय वाला होता है। पहली बात बिना आंकड़ा न सरकार को कुछ कहना चाहिए न जनता कुछ कहने क़ी स्थिति में होती है
दूसरी बात महिला श्रम बल के, या जीडीपी में महिला श्रम पर जुड़े आंकड़े, जो सरकार के ही हैं, को जब लखपति योजना जैसे कार्यक्रमों से जोड़कर देखते है तो तस्वीर और दावे दोनों उलट नजर आते हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण भी यह बताता है कि महिलाओं का अवैतनिक देखभाल कार्य अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान देता है, लेकिन उसका आर्थिक मूल्यांकन बेहद सीमित है। कई आकलनों के अनुसार यह योगदान सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 3.1 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। यानी महिलाओं का एक बड़ा श्रम क्षेत्र ऐसा है जो दिखाई तो देता है, लेकिन उसकी आर्थिक मान्यता नहीं है। यह ‘अदृश्य श्रमÓ महिलाओं को न तो आय देता है, न संपत्ति का अधिकार और न ही निर्णय लेने की शक्ति।
इस पूरे परिदृश्य में एक और प्रवृत्ति दिखाई देती है—महिलाओं को एक बड़े वोट बैंक के रूप में देखने की। कई राज्यों में चुनावों के दौरान महिलाओं को प्रतिमाह नकद सहायता देने की योजनाएं घोषित की जा रही हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर अन्य राज्यों तक इस तरह की योजनाएँ चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। इससे महिलाओं को तत्काल आर्थिक राहत तो मिलती है, लेकिन यह प्रश्न बना रहता है कि क्या इससे उनका स्थायी आर्थिक सशक्तिकरण संभव है?
सच्चाई यह है कि आर्थिक स्वतंत्रता का आधार नियमित और सम्मानजनक आय होती है। जब तक महिलाओं के पास स्थायी रोजगार के अवसर नहीं होंगे, जब तक उन्हें कौशल, पूंजी, बाजार और तकनीक तक समान पहुंच नहीं मिलेगी, तब तक उनका आर्थिक सशक्तिकरण अधूरा ही रहेगा। केवल सहायता राशि या सीमित स्वरोजग़ार योजनाएँ उन्हें वास्तविक स्वतंत्रता नहीं दे सकतीं। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत की आधी आबादी को उसके श्रम का उचित हिस्सा मिल रहा है? क्या महिलाओं को समान अवसर, समान वेतन और स्थायी रोजगार के पर्याप्त विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं? क्या उन्हें अर्थव्यवस्था के आधुनिक क्षेत्रों—जैसे उद्योग, सेवा क्षेत्र, तकनीक और उद्यमिता—में पर्याप्त जगह मिल रही है?
महिलाओं के सशक्तिकरण का असली अर्थ केवल योजनाओं की संख्या बढ़ाना नहीं है। इसका अर्थ है कि समाज और अर्थव्यवस्था की संरचना ऐसी बने जिसमें महिला केवल श्रम शक्ति का हिस्सा ही न हो, बल्कि निर्णय लेने वाली शक्ति भी बने। जब घर, समाज और अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण फैसलों में महिलाओं की बराबर हिस्सेदारी होगी, तभी सच्चे अर्थों में सशक्तिकरण की प्रक्रिया पूरी होगी।
भारत की अर्थव्यवस्था तब तक पूरी तरह मजबूत नहीं हो सकती जब तक उसकी आधी आबादी की क्षमता का पूरा उपयोग न हो। इसलिए जरूरत केवल योजनाओं की घोषणा की नहीं, बल्कि ऐसी नीतियों की है जो महिलाओं को स्थायी रोजगार, बेहतर कौशल, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक सम्मान दिला सकें। तभी यह कहा जा सकेगा कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल एक नारा नहीं, बल्कि बदलती हुई वास्तविकता है।

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