रेरा: खरीदारों की ढाल या बिल्डरों की यार?

-सुभाष मिश्र

रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के उद्देश्य से बना रियल एस्टेट (Regulation and Development)Act, 2016 एक समय घर खरीदारों के लिए उम्मीद की सबसे ठोस किरण माना गया था। वर्षों तक बिल्डरों की मनमानी, अधूरे प्रोजेक्ट, बदलते नक्शे और कब्जे में अंतहीन देरी से त्रस्त मध्यमवर्ग को लगा था कि अब कानून उसकी तरफ खड़ा होगा। लेकिन 12 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की एक तीखी टिप्पणी ने इस उम्मीद की चमक फीकी कर दी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में कहा कि यदि रेरा डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों को ही संरक्षण दे रहा है और खरीदार निराश हैं, तो ऐसी संस्था को समाप्त कर देना ही बेहतर होगा। यह टिप्पणी केवल एक राज्य या एक मामले तक सीमित नहीं है; यह पूरे देश में रेरा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है। न्यायालय का यह वाक्य दरअसल उस मौन पीड़ा की प्रतिध्वनि है, जिसे हजारों घर खरीदार वर्षों से झेल रहे हैं।
रेरा का मूल उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था—हर प्रोजेक्ट का अनिवार्य पंजीकरण, खरीदारों को तय समय पर कब्जा, देरी पर ब्याज और मुआवजा, तथा बिल्डरों की वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना। कानून में 5 से 10 प्रतिशत तक जुर्माने, रिफंड के साथ ब्याज और यहां तक कि तीन वर्ष तक की सजा के प्रावधान हैं। कागज़ पर यह ढांचा सशक्त दिखता है। पर सवाल वही है—क्या इन प्रावधानों की धार जमीन पर महसूस होती है?
मध्य प्रदेश का उदाहरण लें। Madhya Pradesh Real Estate Regulatory Authority में लागू होने के बाद से लगभग 3,700 शिकायतें दर्ज होने और करीब 3,000 मामलों में निर्णय दिए जाने की बात सामने आती है—लगभग 80 प्रतिशत निस्तारण। पहली नजर में यह उपलब्धि प्रतीत होती है। देरी पर 11 प्रतिशत से अधिक ब्याज सहित रिफंड के आदेश, भारी जुर्माने और प्रोजेक्ट पंजीकरण पर रोक जैसे कदम भी उठाए गए।
लेकिन असली परीक्षा आदेश के बाद शुरू होती है। अनेक मामलों में बिल्डर आदेशों का पालन टालते रहे। खरीदारों को अपने ही हक की राशि वसूलने के लिए फिर अदालतों के चक्कर लगाने पड़े। इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में प्रोजेक्ट देरी, अधूरी सुविधाएं और स्वीकृत नक्शे से अलग निर्माण की शिकायतें आज भी सामान्य हैं। यदि आदेशों के पालन के लिए प्रभावी प्रवर्तन तंत्र न हो, तो रेरा का फैसला केवल कागजी राहत बनकर रह जाता है—एक दस्तावेज, जिसे दिखाकर खरीदार संतोष नहीं, बल्कि अगली कानूनी लड़ाई की तैयारी करता है।
स्थिति छत्तीसगढ़ में भी बहुत अलग नहीं है। Chhattisgarh Real Estate Regulatory Authority में 1,000 से अधिक शिकायतें दर्ज होने और लगभग 70 प्रतिशत मामलों के निस्तारण की बात कही जाती है। रायपुर, भिलाई और बिलासपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में पजेशन में देरी, सीपेज, अतिरिक्त शुल्क और अधूरी सुविधाओं की शिकायतें प्रमुख हैं। कई मामलों में 10 लाख रुपये तक के जुर्माने और ब्याज सहित रिफंड के आदेश दिए गए।
फिर भी खरीदारों का अनुभव यही कहता है कि प्रक्रिया लंबी है, अनुपालन कमजोर है और बिल्डर आदेशों को टालने के रास्ते खोज लेते हैं। कई परियोजनाएं वर्षों तक अधर में लटकी रहती हैं। टाउन प्लानिंग की स्वीकृतियां और जमीनी हकीकत में अंतर आम समस्या है। खरीदार के लिए यह केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि आर्थिक और मानसिक थकावट का सिलसिला है।
दरअसल, समस्या कानून की मंशा में नहीं, उसके क्रियान्वयन में दिखाई देती है। कई राज्यों में रेरा अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति में देरी, अपील ट्रिब्यूनल की अनुपलब्धता, और आदेशों के प्रवर्तन के लिए स्पष्ट, कठोर तंत्र की कमी जैसी व्यावहारिक बाधाएं सामने आई हैं। यदि नियामक संस्था संसाधनों की कमी, प्रशासनिक उदासीनता या राजनीतिक दबाव से जूझेगी तो उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से कमजोर होगा।
घर खरीदना केवल लेन-देन नहीं, जीवन की सबसे बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धताओं में से एक है। एक परिवार अपनी जमा पूंजी, बैंक ऋण और वर्षों की कमाई दांव पर लगाता है। यदि प्रोजेक्ट पांच साल देर से पूरा हो, बैंक की ईएमआई और किराया दोनों देना पड़े, और फिर राहत पाने के लिए वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया में उलझना पड़े—तो कानून का उद्देश्य अधूरा ही माना जाएगा।
ऐसे में समाधान रेरा को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे वास्तविक अर्थों में सशक्त बनाना है। आदेशों के अनुपालन के लिए राजस्व वसूली जैसी सख्त प्रवर्तन व्यवस्था अनिवार्य हो। समयबद्ध अपील और त्वरित निष्पादन तंत्र विकसित किया जाए। परियोजनाओं की रियल-टाइम मॉनिटरिंग और सार्वजनिक डैशबोर्ड पारदर्शिता बढ़ा सकते हैं। एस्क्रो खातों की सख्त निगरानी से बिल्डरों की वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है। सामूहिक शिकायत तंत्र को सरल बनाकर खरीदारों को सामूहिक शक्ति दी जानी चाहिए।
रेरा की स्थापना घर खरीदारों की सुरक्षा के लिए हुई थी, न कि डिफॉल्टरों को राहत देने के लिए। यदि जमीनी हकीकत में उद्देश्य धुंधला पड़ रहा है, तो यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, विश्वास का संकट है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के आंकड़े बताते हैं कि निर्णय दिए जा रहे हैं, पर उन्हें वास्तविक राहत में बदलने की यात्रा अधूरी है।
अंतत: सवाल सीधा है—क्या रेरा खरीदारों का भरोसा पुनस्र्थापित कर पाएगा, या वह एक और ऐसी नियामक संस्था बन जाएगा जहां न्याय आदेशों में दर्ज रहता है और जमीन पर इंतजार जारी रहता है? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी चेतावनी भी है और अवसर भी। अब यह राज्यों और नियामकों पर है कि वे रेरा को सचमुच खरीदारों की ढाल बनाएं या इतिहास उसे बिल्डरों की यारी के रूप में दर्ज कर दें।

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