-सुभाष मिश्र
यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में उठ रहा विवाद दरअसल किसी एक नीति या कैंपस व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की गहरी मानसिक विभाजन रेखा को उजागर करता है। भारत में विवाद अक्सर जाति, धर्म, भाषा या आरक्षण के नाम पर उभरते हैं, लेकिन असली कारण वही पुरानी दर्दनाक यादें और संवादहीन इतिहास है। यूजीसी ने ‘समानता और भेदभाव निरोध को लेकर नियम बनाए, तो सवर्ण समाज के हिस्से को यह डर सताने लगा कि इससे उनके अवसरों पर आघात होगा। विरोध के स्वर इंदौर, भोपाल और रायपुर जैसे शहरों में गूंजे, जहाँ सामान्य वर्ग के युवा यह महसूस करने लगे कि नियम कहीं उनके खिलाफ ‘उपयोगी हथियार बन सकते हैं। दूसरी ओर, सामाजिक रूप से वंचित वर्गों में यह भावना गहराई कि संविधान ने जो संरक्षण दिया है, उसमें कटौती या विरोध क्यों किया जा रहा है। संख्या बल में अधिक होने के बावजूद यदि वे आज भी असुरक्षित महसूस करते हैं, तो यह भी अपने आप में कठोर सच्चाई है। यही टकराव भारतीय समाज की स्थायी विडंबना बन चुका है। एक वर्ग को लगता है कि उसका हक छीना जा रहा है, तो दूसरे को लगता है कि अब जाकर उसे उसका हक मिला है। दोनों अपने अनुभवों के आधार पर बोलते हैं, लेकिन संवाद की जगह संदेह ले लेता है। राजनीति इस संदेह को और गहरा करती है, क्योंकि जाति और जातीय समीकरण भारतीय राजनीति का सबसे प्रभावी औजार रहे हैं। जब बेरोजग़ारी, शिक्षा की गिरती गुणवत्ता, खाली पड़े प्रोफेसर के पद और युवाओं के भविष्य जैसे प्रश्न सामने आते हैं, तो उन्हें हल करने के बजाय समाज को आपस में उलझा देना अधिक आसान माना जाता है।
अब इस बहाने उठ रहे विरोधों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के इन नियमों पर रोक लगा दी है और कहा कि मौजूदा नियमों की भाषा अस्पष्ट है तथा दुरुपयोग की आशंका पैदा कर सकती है। इसलिए नियमों को फिर से तैयार करने की आवश्यकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फिलहाल 2012 के नियम लागू रहेंगे और 2026 के विवादित प्रावधानों को तब तक लागू नहीं किया जाएगा जब तक उन्हें संशोधित नहीं किया जाता। यह कदम केंद्र सरकार के लिए सेटबैक और विरोध कर रहे छात्रों के लिए राहत जैसा माना जा रहा है, क्योंकि शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि अगर इन नियमों को बिना समीक्षा लागू कर दिया गया तो समाज में विभाजन और बढ़ सकता है।
यह निर्णय यही संकेत देता है कि विवाद केवल नीति का नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना के गहरे तनाव का है। कानून में भेदभाव रोकने की कोशिशें हों या समावेशन बढ़ाने के प्रयास। जब तक लोग एक-दूसरे की वास्तविक परिस्थितियों और पीड़ाओं को समझने की बजाय केवल स्वहित और पहचान के नाम पर संघर्ष करेंगे, तब तक हर नया नियम एक नया विवाद बन जाएगा। यूजीसी का विवाद भी इसी का प्रतीक है। एक तरफ यह प्रयास है कि शिक्षा में भेदभाव कम हो, दूसरी तरफ लोगों को डर है कि कहीं नियम उनके हितों के खिलाफ न बन जाए। यहां समस्या केवल तकनीकी या कानूनी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सोच की असुरक्षा है।
जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि असली संकट जातिगत पहचान नहीं बल्कि अवसरों की कमी, बेरोजग़ारी और संवादहीनता है, तब तक हर नया नियम विवाद का विषय बनेगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि मनुष्य की गरिमा और सम्मान ही सबसे बड़ा सिद्धांत है, और नियम उसी दृष्टि से बनाए जाने चाहिए। तभी समाज में वह सामंजस्य बन पाएगा, जो नियमों और नीतियों की मूल मंशा है। भेदभाव से ऊपर उठकर सबको समान अवसर और सम्मान देना।