कॉलोनी विवादों पर सरकार का बड़ा कदम, हैंडओवर-मेंटेनेंस के लिए बनेगा नया कानून, बिल्डर-रहवासी विवाद बनेंगे नए अधिनियम

रायपुर : छत्तीसगढ़ में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ आवासीय कॉलोनियों और हाउसिंग सोसायटियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ ही कॉलोनियों के हैंडओवर, रखरखाव और मूलभूत सुविधाओं के संचालन को लेकर विवाद भी बढ़ते जा रहे हैं। कई जगहों पर डेवलपर, रहवासी कल्याण संघ (आरडब्ल्यूए) और स्थानीय निकायों के बीच टकराव की स्थिति बन रही है। इन बढ़ते विवादों पर अंकुश लगाने और कॉलोनियों के प्रबंधन को कानूनी आधार देने के लिए अब राज्य सरकार सक्रिय हो गई है।

नगर तथा ग्राम निवेश विभाग ने प्रदेश में संचालित रहवासी कल्याण संघों (रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन) के गठन, संचालन, अधिकारों और दायित्वों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के लिए एक समग्र कानून तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस संबंध में विभाग ने विभिन्न पक्षों से सुझाव लेने के लिए 15 जून को नवा रायपुर स्थित इंद्रावती भवन में बैठक बुलाई है। माना जा रहा है कि बैठक के आधार पर एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार किया जाएगा, जो कॉलोनियों के हैंडओवर और रखरखाव से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवादों का स्थायी समाधान देने का प्रयास करेगा।

दरअसल, प्रदेश की अनेक आवासीय कॉलोनियों और टाउनशिप में सबसे बड़ा विवाद हैंडओवर प्रक्रिया को लेकर सामने आता है। डेवलपर परियोजना पूरी होने का दावा करते हैं, जबकि रहवासी अधूरी सड़कों, खराब सीवरेज व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट, पेयजल आपूर्ति, पार्कों के विकास और सुरक्षा व्यवस्था जैसी कमियों का हवाला देकर हैंडओवर का विरोध करते हैं। दूसरी ओर स्थानीय निकाय भी तब तक जिम्मेदारी लेने से बचते हैं जब तक सभी अधोसंरचनात्मक कार्य निर्धारित मानकों के अनुसार पूरे न हो जाएं।

रायपुर, नवा रायपुर, भिलाई, दुर्ग, बिलासपुर और कोरबा जैसे शहरों में कई आवासीय परियोजनाओं में इस प्रकार के विवाद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। रायपुर और नवा रायपुर की कई बड़ी टाउनशिप में रहवासियों ने मेंटेनेंस शुल्क, कॉमन एरिया के रखरखाव, सुरक्षा सेवाओं और सुविधाओं के संचालन को लेकर डेवलपरों के खिलाफ आवाज उठाई है। कुछ मामलों में रहवासी संघों और बिल्डरों के बीच विवाद न्यायालयों और उपभोक्ता मंचों तक भी पहुंचे हैं।

भिलाई और दुर्ग क्षेत्र की कई निजी कॉलोनियों में सड़क, नाली, पेयजल और स्ट्रीट लाइट जैसी सुविधाओं के अधूरे रहने के बावजूद हैंडओवर के प्रयासों को लेकर विवाद सामने आए हैं। वहीं बिलासपुर और कोरबा में भी कई आवासीय परियोजनाओं में रहवासी संघों ने आरोप लगाया कि डेवलपरों ने परियोजना के समय किए गए वादों के अनुरूप सुविधाएं विकसित नहीं कीं, जबकि रखरखाव शुल्क लगातार वसूला जाता रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में कॉलोनियों और रहवासी संघों के संचालन को लेकर स्पष्ट और एकीकृत कानूनी व्यवस्था का अभाव है। अलग-अलग नियमों और विभागीय प्रावधानों के कारण कई बार जिम्मेदारियों को लेकर भ्रम की स्थिति बन जाती है। यही कारण है कि हैंडओवर, मेंटेनेंस, कॉमन एरिया के स्वामित्व, सुरक्षा व्यवस्था, पार्कों के रखरखाव, जलापूर्ति और अन्य सुविधाओं के संचालन जैसे मुद्दे विवाद का कारण बनते हैं।

प्रस्तावित कानून के जरिए सरकार इन सभी पहलुओं को एक ही ढांचे में लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत रहवासी कल्याण संघों के गठन की प्रक्रिया, उनकी वैधानिक मान्यता, वित्तीय अधिकार, डेवलपरों की जिम्मेदारियां, हैंडओवर की समयसीमा, अधोसंरचना की गुणवत्ता और स्थानीय निकायों की भूमिका को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जा सकता है। साथ ही विवादों के त्वरित समाधान के लिए विशेष प्रावधान भी शामिल किए जाने की संभावना है।

नगर तथा ग्राम निवेश विभाग का मानना है कि नया कानूनी ढांचा लागू होने के बाद कॉलोनियों के विकास और संचालन में पारदर्शिता बढ़ेगी। इससे डेवलपरों की जवाबदेही तय होगी, रहवासियों के अधिकार सुरक्षित होंगे और स्थानीय निकायों को भी स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल सकेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि कॉलोनी और सोसायटी प्रबंधन से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवादों को कम करने में मदद मिलेगी।

प्रदेश में तेजी से विकसित हो रही नई टाउनशिप और आवासीय परियोजनाओं को देखते हुए यह पहल भविष्य की शहरी व्यवस्थाओं के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि प्रस्तावित कानून प्रभावी रूप से लागू होता है तो कॉलोनियों के हैंडओवर, रखरखाव और प्रबंधन को लेकर उत्पन्न होने वाले विवादों में कमी आने के साथ-साथ नागरिकों को बेहतर और जवाबदेह शहरी सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी।

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