रेत से तेल नहीं, अब खून निकल रहा

मधुकर दुबे

रायपुर। छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से समृद्ध प्रदेश है। यहां 28 प्रकार के खनिजों का उत्खनन होता है, लेकिन सबसे बड़ा और सबसे बेकाबू खेल रेत का है। नदियों की कोख से निकाली जा रही रेत ने अब सिर्फ पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को भी चुनौती दे दी है। अनुमान है कि प्रदेश में अवैध रेत खनन का कारोबार सालाना दो हजार करोड़ रुपये से अधिक का है। यह ऐसा समानांतर साम्राज्य बन चुका है, जिसकी जड़ें गांवों से लेकर सत्ता के गलियारों तक फैली हुई हैं।


मंगलवार को कोरिया जिले के सोनहत क्षेत्र में भाजपा के पूर्व जनपद पंचायत उपाध्यक्ष भरत सिंह, उनके भाई नागेंद्र सिंह और एक अन्य साथी वीरू सिंह को उनकी फॉर्च्यूनर में जिंदा जलाकर मार दिए जाने की घटना ने एक बार फिर रेत माफियाओं के खूनी नेटवर्क को उजागर कर दिया। शुरुआती तौर पर इस वारदात को रेत खनन के वर्चस्व की लड़ाई से जोड़कर देखा जा रहा है। यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि उस लंबी श्रृंखला की एक और कड़ी है जिसमें रेत के कारोबार ने कई जानें ली हैं।


छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी नदियां—महानदी, पैरी, खारून, शिवनाथ, इंद्रावती और उनकी सहायक धाराएं वर्षों से अवैध खनन की मार झेल रही हैं। दिन में नियमों के तहत सीमित खनन दिखता है, लेकिन रात के अंधेरे में मशीनों से नदी की तलहटी को छलनी किया जाता है। जहां अनुमति है, वहां तय सीमा से कई गुना अधिक उत्खनन होता है और जहां अनुमति नहीं है, वहां भी चोरी-छिपे रेत निकाली जाती है। परिणामस्वरूप कई छोटे-बड़े नाले और नदी घाट अपना अस्तित्व खो चुके हैं, जबकि अनेक जल स्रोत गंभीर संकट में हैं। यही हाल पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश, ओडिशा व आंध्र प्रदेश का भी है।


रेत के इस कारोबार की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन करने वालों को “डकैत” तक करार दिया था और राज्यों को सख्त कानून बनाने की सलाह दी थी। बावजूद इसके जमीनी हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा। कार्रवाई होती है, मशीनें जब्त होती हैं, मुकदमे दर्ज होते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद वही खेल फिर शुरू हो जाता है।


प्रदेश में अवैध खनन का पूरा तंत्र एक संगठित सिंडिकेट की तरह काम करता है। खनन पट्टों की नीलामी चाहे जिसके नाम हो, स्थानीय स्तर पर सक्रिय नेटवर्क के बिना कारोबार चलाना मुश्किल माना जाता है। नदी घाटों से लेकर परिवहन तक हर स्तर पर हिस्सेदारी का आरोप लगता रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों, स्थानीय प्रभावशाली लोगों और विभागीय तंत्र की मिलीभगत के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यही वजह है कि कई बार राजस्व और पुलिस विभाग की कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारें बदलने के बावजूद अवैध खनन क्यों नहीं रुकता? जवाब शायद इसी बात में छिपा है कि सत्ता बदलती है, लेकिन अवैध कमाई का नेटवर्क जस का तस बना रहता है। केवल चेहरे बदलते हैं, सिस्टम नहीं। यही कारण है कि रेत माफिया प्रदेश के कई जिलों में समानांतर ताकत के रूप में उभर चुके हैं।


महासमुंद, रायपुर ग्रामीण, धमतरी, दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव, बालोद, जांजगीर-चांपा और बस्तर संभाग के कई हिस्से अवैध रेत खनन के प्रमुख हॉटस्पॉट माने जाते हैं। यहां नदी घाटों पर कब्जे, अवैध उत्खनन, परिवहन और वसूली को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। खनन माफियाओं का दुस्साहस इतना बढ़ चुका है कि कई बार कार्रवाई करने पहुंची सरकारी टीमों पर भी हमले हुए हैं। कवर्धा में वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों पर हमला कर उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर पीटने की घटना चर्चा में रही। बिलासपुर की अरपा नदी में खनन को लेकर कई बार हिंसक झड़पें हुईं। धमतरी जिले में रेत खनन के दौरान 10 नर कंकाल मिलने की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। हालांकि जांच अभी भी जारी है, लेकिन स्थानीय लोगों ने आशंका जताई थी कि विरोध करने वालों को गायब कर दफनाया गया हो सकता है।


विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में कई नदियों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होगा, भूजल स्तर और नीचे जाएगा तथा जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। लेकिन पर्यावरणीय नुकसान से भी बड़ा खतरा उस समानांतर सत्ता का है, जो रेत के कारोबार के जरिए खड़ी हो रही है।


छत्तीसगढ़ में रेत अब केवल निर्माण सामग्री नहीं रह गई है। यह सत्ता, पैसे, प्रभाव और हिंसा का ऐसा माध्यम बन चुकी है, जिसके लिए गोलियां चल रही हैं, लोग जिंदा जलाए जा रहे हैं और नदियों की कोख उजाड़ी जा रही है। सवाल यह है कि क्या सरकारें इस समानांतर साम्राज्य को खत्म करने का साहस दिखाएंगी, या फिर रेत से निकलता यह खून आने वाले समय में और गहरा होता जाएगा?

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