अब तक मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व में जारी जंग के चलते दुनिया भर के अर्थशास्त्री लगातार यह चेतावनी दे रहे थे कि यह संघर्ष महंगाई को आसमान पर पहुंचा देगा। ऐसा हुआ भी, होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) के बंद होने से दुनिया भर में तेल और गैस का गहरा संकट पैदा हो गया था। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ने से माल ढुलाई की लागत (Transportation Cost) बढ़ गई और महंगाई ने ऊंची छलांग लगा दी। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते (US-Iran Peace Deal) के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भरभराकर क्रैश हो गई हैं। जो ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल के पार चल रहा था, वह अब फिसलकर 77 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। इस गिरावट से तेल का संकट तो टल गया है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि देश में महंगाई का असली खलनायक अब कच्चा तेल नहीं, बल्कि कुछ और है।
कच्चे तेल की तेजी ने बिगाड़ा था देश का गणित, थोक महंगाई दर नौ फीसदी के पार
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल का असर भारत के घरेलू बाजारों पर साफ देखने को मिला था। देश में खुदरा महंगाई दर (Retail Inflation) मई के महीने में बढ़कर 3.93 फीसदी हो गई, जो इससे पिछले महीने यानी अप्रैल में 3.48 फीसदी पर थी। इस बढ़ोतरी में खाने-पीने की चीजों और ईंधन की महंगी कीमतों ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। वहीं दूसरी ओर, थोक महंगाई दर (Wholesale Inflation) भी मई में उछलकर 9.68 फीसदी के ऊंचे स्तर तक पहुंच गई थी। कच्चे तेल के इसी वैश्विक संकट को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी वित्तीय वर्ष 2027 के लिए अपने महंगाई दर के अनुमान को 4.6 फीसदी से बढ़ाकर सीधे 5.1 फीसदी कर दिया था।
अब तेल नहीं, मानसून बढ़ाएगा देश की चिंता; आधी खेती आज भी बारिश के भरोसे
कच्चे तेल के दामों में आई इस बड़ी राहत के बाद भी एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत के लिए महंगाई का सबसे बड़ा जोखिम अब हमारे घर के बेहद करीब उभर रहा है। इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट (Chief Economist) डॉ. मनोरंजन शर्मा के अनुसार, आज देश में महंगाई का सबसे बड़ा खतरा तेल नहीं, बल्कि कमजोर मानसून है। उन्होंने साफ किया कि भारत में महंगाई के आकलन में ईंधन की तुलना में खाद्य पदार्थों यानी खाने-पीने की चीजों की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा होती है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी सिंचाई के लिए पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर है। ऐसे में अगर बारिश कम होती है, तो अनाज, दालों, सब्जियों, फलों और तिलहन के उत्पादन में भारी कमी आ सकती है, जिससे सीधे तौर पर घरेलू बजट गड़बड़ा जाएगा।
कच्चे तेल से भी ज्यादा खतरनाक है कम बारिश, जेब पर पड़ेगा सीधा असर
सीधे शब्दों में समझें तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने से मुख्य रूप से केवल ट्रांसपोर्टेशन यानी माल ढुलाई प्रभावित होती है, जबकि कम बारिश का सीधा हमला उन रोजमर्रा की जरूरी चीजों पर होता है जिन्हें एक आम परिवार रोज खरीदता है। कमजोर मानसून, खासकर अल नीनो (El Nino) की स्थिति में, खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों के कारण घर के खर्चों को बहुत ज्यादा बढ़ा देता है। कम बारिश की वजह से सब्जियों, दालों, खाद्य तेलों और दूध की महंगाई दर अक्सर दोहरे अंकों (Double Digits) में पहुंच जाती है। एक अनुमान के मुताबिक, कम बारिश के चलते सब्जी बाजार और किराना स्टोर पर कीमतें बढ़ने से एक मध्यम वर्गीय शहरी परिवार का मासिक खर्च 1,000 रुपये से लेकर 3,000 रुपये तक बढ़ सकता है। इसमें सबसे ज्यादा मार गरीब परिवारों पर पड़ती है, क्योंकि उनकी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ भोजन पर खर्च होता है।