बढ़ती कंफर्ट इकॉनामी और उसके साइड इफेक्ट

सुभाष मिश्र

कभी एक दौर था जब बाजार तक पहुंचने के लिए इंसान को घर से निकलना पड़ता था। लोग सूची बनाकर किराना खरीदने जाते थे, टैक्सी ढूंढते थे, डॉक्टर के पास लाइन में लगते थे और छोटे-बड़े हर काम के लिए समय निकालना पड़ता था लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। अब बाजार हमारे पास नहीं, बल्कि हमारे मोबाइल तक आ चुका है। एक क्लिक पर खाना, दवा, किराना, टैक्सी, घरेलू मदद, फिजियोथेरेपिस्ट, नर्स, इलेक्ट्रिशियन और यहां तक कि सामान उठाने वाला व्यक्ति भी उपलब्ध है।
भारत तेजी से कंफर्ट इकॉनामी यानी सुविधा आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जहां समय बचाने और आराम पाने के लिए लोग पैसे खर्च करने को तैयार हैं। यह बदलाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों तक पहुंच चुका है। अगर आपकी जेब में पैसा है, इंटरनेट की समझ है और मोबाइल ऐप का इस्तेमाल आता है, तो अब जीवन की अधिकांश जरूरतें घर बैठे पूरी की जा सकती हैं। कोविड महामारी के बाद इस बदलाव ने और गति पकड़ी। लोगों ने महसूस किया कि अस्पताल जाने के बजाय घर में ही इलाज की सुविधाएं मिल सकती हैं। होम हेल्थकेयर सेवाओं ने मरीजों के कमरों को मिनी अस्पताल में बदलना शुरू कर दिया। फिजियोथैरेपिस्ट घर आने लगे, प्रशिक्षित नर्सें उपलब्ध होने लगीं और मेडिकल उपकरण किराए पर मिलने लगे।
यही मॉडल अब हर क्षेत्र में दिखाई देता है। शिक्षा में ऑनलाइन कोचिंग और डिजिटल क्लासरूम ने दूरी की समस्या खत्म कर दी। घरेलू सेवाओं में ऐप आधारित मॉडल ने प्लंबर, ब्यूटीशियन और क्लीनिंग स्टाफ को घर तक पहुंचा दिया। परिवहन में बाइक टैक्सी और कैब सेवाओं ने निजी वाहन की जरूरत कम की। यहां तक कि कई शहरों में निजी सहायता और साथी सेवाएं भी ऐप आधारित हो चुकी हैं।
भारत में ब्लिनकिट, ज़ेप्टो, बिगबास्केट, स्वीगी, ओला, उबर, रैपिडो और अर्बन कंपनी जैसी कंपनियों ने लोगों की जीवनशैली बदल दी है। 10 से 20 मिनट में डिलीवरी देने वाली कंपनियों ने लोगों को इंतजार नहीं, तुरंत सुविधा की आदत डाल दी है। ऐप आधारित ट्रैकिंग, डिजिटल पेमेंट, ओटीपी, लाइव लोकेशन और रेटिंग सिस्टम ने भरोसा पैदा किया है। अब ग्राहक केवल सेवा नहीं खरीद रहा, बल्कि सुविधा और समय खरीद रहा है।
इस व्यवस्था के कई सकारात्मक पहलू भी हैं। सबसे बड़ा फायदा समय की बचत है। नौकरीपेशा और व्यस्त लोगों के लिए यह मॉडल बेहद उपयोगी साबित हुआ है। बारिश, ट्रैफिक और गर्मी में बाहर निकलने की जरूरत कम हुई है। बुजुर्गों, महिलाओं और बीमार लोगों के लिए घर बैठे सेवाएं राहत बनकर आई हैं। डिजिटल इंडिया अभियान को भी इससे गति मिली है। ऑनलाइन भुगतान, जीपीएस ट्रैकिंग और ऐप आधारित सेवाओं ने तकनीक पर लोगों का भरोसा बढ़ाया है। लाखों युवाओं को डिलीवरी, ड्राइविंग और घरेलू सेवाओं के माध्यम से रोजगार मिला है।
कई कंपनियों ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए एसओएस फीचर, लाइव ट्रैकिंग और महिला ड्राइवर जैसी सुविधाएं भी शुरू की हैं, लेकिन हर सुविधा की एक कीमत होती है और यह कीमत सिर्फ पैसे तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा खतरा यह है कि समाज धीरे-धीरे सुविधा का आदी होता जा रहा है। हर छोटी जरूरत के लिए ऐप पर निर्भरता बढ़ रही है। लोग कम चल रहे हैं, कम बाहर निकल रहे हैं और शारीरिक रूप से निष्क्रिय होते जा रहे हैं। सुविधा ने जीवन को आसान जरूर बनाया है, लेकिन कहीं न कहीं मनुष्य को आलसी भी बनाया है।
इस बदलाव का असर छोटे दुकानदारों पर भी पड़ रहा है। मोहल्ले की किराना दुकानें, स्थानीय बाजार और छोटे व्यापारी बड़े ऐप आधारित प्लेटफॉर्म के सामने संघर्ष कर रहे हैं। क्विक कॉमर्स कंपनियां भारी छूट और तेज डिलीवरी देकर ग्राहकों को अपनी ओर खींच रही हैं, जिससे पारंपरिक व्यापार मॉडल कमजोर पड़ रहा है। डिलीवरी कर्मचारियों पर बढ़ता दबाव भी चिंता का विषय है। 10 मिनट डिलीवरी का वादा सुनने में आकर्षक लगता है, लेकिन इसके पीछे सड़कों पर तेज रफ्तार, मानसिक तनाव और दुर्घटनाओं का खतरा छिपा होता है। समय पर डिलीवरी की होड़ में कई कर्मचारी असुरक्षित परिस्थितियों में काम करते हैं।
डेटा और प्राइवेसी का सवाल भी गंभीर है। ये ऐप्स हमारी लोकेशन, खरीदारी की आदतें, बैंकिंग जानकारी और निजी पसंद तक का डेटा इक_ा करते हैं। सुविधा के बदले हम अपनी निजी जानकारी कंपनियों को सौंप रहे हैं। भविष्य में डेटा लीक और निगरानी जैसी समस्याएं और बड़ी चुनौती बन सकती हैं। नई सेवाओं के सामने भरोसे की चुनौती भी है। लोग किसी अनजान व्यक्ति को घर में आने देने से पहले सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं। इसलिए कंपनियों के लिए सिर्फ सेवा देना काफी नहीं होगा, बल्कि भरोसा और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।
इसके अलावा सुविधा आधारित जीवनशैली धीरे-धीरे महंगी भी होती जा रही है। छोटी-छोटी डिलीवरी फीस, सर्ज प्राइस और सुविधा शुल्क मिलकर बड़ा खर्च बन जाते हैं। लोग समय बचाने के बदले अधिक पैसा खर्च कर रहे हैं।

पर्यावरण पर भी इसका असर साफ दिखाई देता है। हर छोटी डिलीवरी के लिए सड़क पर अतिरिक्त वाहन उतर रहे हैं। प्लास्टिक पैकेजिंग और डिस्पोजेबल सामग्री का उपयोग बढ़ रहा है। तेज सुविधा की यह संस्कृति पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ा रही है।
असल सवाल यह नहीं है कि सुविधा गलत है या सही। सवाल यह है कि क्या हम सुविधा के साथ संतुलन बनाए रख पा रहे हैं? तकनीक ने जीवन आसान बनाया है, लेकिन यदि समाज पूरी तरह ऑन-डिमांड मानसिकता का आदी हो गया तो आत्मनिर्भरता, सामाजिक संपर्क और शारीरिक सक्रियता जैसी चीजें कमजोर पड़ सकती हैं। भारत में कंफर्ट इकॉनमी अभी शुरुआती दौर में है। आने वाले समय में यह और तेज होगी। लेकिन इसकी वास्तविक सफलता केवल तेज डिलीवरी या भारी डिस्काउंट से तय नहीं होगी। असली कसौटी होगी भरोसा, सुरक्षा, पारदर्शिता, श्रमिकों के अधिकार और जिम्मेदार तकनीक। वही कंपनियां लंबे समय तक टिकेंगी जो ग्राहकों को सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षित और संतुलित अनुभव दे पाएंगी।

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