-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ विधानसभा का मानसून सत्र ऐसे समय शुरू हुआ है, जब राज्य की राजनीति कई महत्वपूर्ण मुद्दों के मोड़ पर खड़ी है। एक ओर सरकार अपनी विकास योजनाओं, सुशासन और उपलब्धियों का लेखा-जोखा जनता के सामने रखने को तैयार है, तो दूसरी ओर विपक्ष सरकार के फैसलों, प्रशासनिक कार्यशैली और विभिन्न विवादों को लेकर उसे कठघरे में खड़ा करने की रणनीति बना चुका है। ऐसे में यह सत्र केवल विधायी औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की एक बड़ी परीक्षा है।
सत्र की शुरुआत ही राजनीतिक गर्मी के साथ हुई। राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मुद्दा पहले ही दिन सदन में गूंजा। यह मामला केवल किसी मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि आस्था, प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही से भी जुड़ा है। विपक्ष ने इसे सरकार की विफलता के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि सरकार ने तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष रखा। लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है कि हर गंभीर प्रश्न का उत्तर सदन में दिया जाए। लेकिन बहस का उद्देश्य केवल राजनीतिक शोर नहीं, बल्कि समाधान होना चाहिए।
सत्र से पहले भारतीय जनता पार्टी द्वारा मंत्रियों और विधायकों की बैठक कर विभागवार तैयारी कराने का निर्णय स्वागतयोग्य है। विधानसभा में दिया गया हर उत्तर सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनता है। इसलिए तथ्यों के साथ जवाब देना केवल राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक दायित्व भी है। यदि मंत्री पूरी तैयारी के साथ सदन में उपस्थित होते हैं, तो इससे सरकार की विश्वसनीयता बढ़ती है।
उधर कांग्रेस ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह इस सत्र में सरकार को कई मुद्दों पर घेरेगी। नकटी क्षेत्र में विधायक आवास निर्माण के लिए हटाए गए अतिक्रमण, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन, शिक्षा व्यवस्था, किसानों, युवाओं, स्वास्थ्य और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर विपक्ष आक्रामक रहेगा। विपक्ष की भूमिका केवल विरोध करना नहीं, बल्कि जनहित के प्रश्नों को मजबूती से उठाना है। यदि उसके सवाल तथ्यपरक होंगे, तो सरकार को भी गंभीरता से जवाब देना होगा।
सरकार इस सत्र में बस्तर को अपनी उपलब्धियों के प्रमुख उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा, सडक़, शिक्षा और विकास कार्यों में तेजी तथा मुख्यमंत्री के ‘संवाद से समाधान’ अभियान के परिणाम निश्चित रूप से चर्चा का विषय बनेंगे। यदि इन पहलों से वास्तव में आम लोगों का जीवन बदला है, तो यह सरकार की उपलब्धि है। लेकिन इन दावों की वास्तविकता की पड़ताल करना विपक्ष का भी दायित्व है।
लोकतंत्र में प्रश्नकाल सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। सैकड़ों प्रश्नों के माध्यम से विधायक अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याएं सदन तक पहुंचाते हैं। सडक़, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सिंचाई, रोजगार और अधूरी परियोजनाओं जैसे विषय केवल आंकड़े नहीं, बल्कि लाखों लोगों के जीवन से जुड़े प्रश्न हैं। सरकार यदि ईमानदारी से उत्तर देती है और विपक्ष तथ्यपरक ढंग से सवाल उठाता है, तो लोकतंत्र मजबूत होता है।
चिंता की बात तब होती है, जब सदन का बहुमूल्य समय हंगामे और नारेबाजी में नष्ट हो जाता है। लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध का उद्देश्य चर्चा को रोकना नहीं, बल्कि चर्चा को मजबूर करना होना चाहिए। इसी प्रकार सरकार का दायित्व केवल बहुमत के आधार पर निर्णय लेना नहीं, बल्कि विपक्ष के तर्कों को सुनना और उचित सुझावों को स्वीकार करना भी है।
आज जनता पहले से कहीं अधिक जागरूक है। विधानसभा की कार्यवाही अब केवल सदन की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती। डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया के कारण हर प्रश्न, हर उत्तर और हर व्यवहार जनता के सामने होता है। लोग अब यह भी देखते हैं कि किस विधायक ने अपने क्षेत्र की आवाज उठाई, किस मंत्री ने तथ्यात्मक उत्तर दिया और किसने केवल राजनीतिक प्रदर्शन किया।
यह मानसून सत्र सरकार के लिए अपनी नीतियों और उपलब्धियों की परीक्षा है, तो विपक्ष के लिए अपनी विश्वसनीयता साबित करने का अवसर भी। यदि सरकार पारदर्शिता के साथ जवाब देती है और विपक्ष जिम्मेदारी के साथ सवाल पूछता है, तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लेकिन यदि पूरा सत्र केवल आरोप-प्रत्यारोप और हंगामे में बीत गया, तो सबसे बड़ा नुकसान जनता का होगा।
विधानसभा किसी सरकार या विपक्ष की नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता की संस्था है। वहां उठने वाला हर प्रश्न जनता की उम्मीद का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए इस मानसून सत्र से यही अपेक्षा है कि राजनीतिक तापमान चाहे जितना ऊंचा रहे, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादा, तथ्यपरक बहस और जनहित सर्वोच्च प्राथमिकता बने रहें। आखिर लोकतंत्र की असली ताकत शोर में नहीं, जवाबदेही में होती है।