राजपाट — प्रफुल्ल पारे

मलाई की जगह मेहनत

मेहनत और धीरज का फल मीठा होता है, ऐसा कहा जाता है। अब भाजपा के उन बहुत से नेताओं, कार्यकर्ताओं को देख लीजिए जिन्होंने ढाई साल तक धैर्य रखा, तब जाकर उन्हें निगम, मंडल, प्राधिकरणों में पद मिला। वैसे तो राजनीति में लाल-पीली बत्ती का चलन कम करने की सैद्धांतिक बात तो होती रहती है, इसके बावजूद बत्ती का मोह किसे नहीं होता। देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर जिन नेताओं को बत्ती मिली और उन्हें लगा कि अब मलाई भी मिलेगी, लेकिन उन्हे भाजपा संगठन ने अभी से विधानसभावार जिम्मेदारी देकर पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का पूरा प्रोग्राम दे दिया है। मलाई की आस लगाए बैठे इन नेताओं को तो एसी कमरों में बैठकर पावर का सुख भोगना था परन्तु क्या करें अब वे सब छत्तीसगढ़ की भीषण गर्मी में फील्ड की खाक छानते फिर रहे हैं। आखिरकार रिपोर्ट कार्ड का मामला जो ठहरा। जरा सी ढिलाई भविष्य के सारे सपने चूर कर सकती है। इस डर से बहुत से नेता पसीने से चूर-चूर होने को मजबूर हैं। ये हाल तो उनका है जिन्हें बत्ती मिल गई है, लेकिन अभी भी सरकार में दर्जनों पद ऐसे हैं जिनमें नियुक्ति बाकी है। मतलब बत्ती की रक्षा करना है तो काम करो और बत्ती चाहिए तो भी काम करो। भारतीय जनता पार्टी का संगठन इतनी आसानी से मलाई खाने नहीं देता। हालांकि कि भाजपा के कई नेता कार्यकर्ता सरकार में खाली पड़े पदों को पाने के लिए एड़ी चोटी का जोर भी लगा रहे हैं, लेकिन सत्य तो यही है संगठन की बाधा दौड़ को तो पार करना ही पड़ेगा।

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है

प्रदेश में तबादलों का मौसम आ गया है। तबादले किसी उद्योग से कम नहीं होते और लगभग सभी विभागों में यह मौसम बहार लेकर आता है। लेकिन सबसे ज्यादा मैन पावर रखने वाले स्कूल शिक्षा विभाग में तबादला उद्योग खूब फलता फूलता रहा है, पर इस साल महंगाई की मार को देखते हुए तबादले के रेट पिछले सालों की तुलना में कुछ ज्यादा ही बढ़े हुए है। वैश्विक ऊर्जा, गैस, पेट्रोल डीजल संकट का प्रभाव स्कूल शिक्षा विभाग के तबादला रेट पर साफ दिखाई दे रहा है। टीचर के तबादले कभी 50 हजार से एक लाख में आसानी से हो जाते थे, अब 3-4 लाख में हो रहे है। लेक्चरर के लिए 6-8 लाख, प्राचार्य के तबादले के लिए 10 लाख और मलाईदार पदों के लिए अवसर के अनुसार रेट है। शिक्षा विभाग में विकसित बिचौलिया पद्धति से जुड़े लोग जिन्हें मंत्री का खास कहा जाता है, फोन करके डिमांड कर रहे हैं। मंत्री जी भी बड़े पैमाने पर शिक्षकों के तबादले करने की मंशा से लिस्ट तैयार किये बैठे थे, किन्तु मुख्यमंत्री ने उनकी मंशा पर पानी फेर कर केवल कुछ हजार तबादलों के लिए ही सहमति दी। जिन लोगों के तबादले नहीं भी होना है, उनके मोबाइल की घंटियां भी बज रही है। कहा जा रहा है आपका नाम है आकर मिलो और जिनके नाम सूची में हैं उनसे पहले ही पूरा पेमेंट करने के लिए कहा जा रहा है। पारदर्शी शासन तंत्र की इस व्यवस्था की जानकारी ब्लाक से लेकर राजधानी तक के सारे शिक्षक समुदाय को है। तबादले पर ऐसे मोल भाव हो रहे हैं कि सब्जी या मछली बाजार भी शर्मा जाए। पर मजे की बात यह कि संगठन के जरिए सत्ता में आये मंत्री जी को, उनके संगठन और हाईकमान को यह कैसे पता नहीं होगा। इन हालातों पर सत्तर के दशक में लिखे मजरूह सुल्तानपुरी के इस गीत को सुन लीजियेगा … ‘पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है,जाने न जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है।

काकरोच पत्रकार पार्टी

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने किसी एक प्रकरण में पत्रकारों, आरटीआई कार्यकर्ताओं और एनजीओ के नाम से की जा रही हरकत को लेकर उनकी तुलना परजीवी और काकरोच से क्या कर दी पूरे देश में बवाल मच गया। सोशल मीडिया पर तो ऑनलाईन रातो-रात काकरोच जनता पार्टी का गठन हो गया। पूरा शोशल मीडिया दीवाना हुआ पड़ा है। लाखों लोगों ने ऑनलाइन पार्टी ज्वाइन कर ली और यह पार्टी इतनी बड़ी हो गई कि इसने विश्व की सबसे बड़ी पार्टी कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी को भी पीछे छोड़ दिया। अब इसकी देखा देखी राज्यों में भी ऑनलाइन काकरोच जनता पार्टी का गठन होने लगा है। बहरहाल, ऑनलाइन पार्टी बनाकर सब्सक्राइबर बढाकर इंटरनेट पर पर राजनीति नहीं होती। इसके लिए लिए जमीन पर ख़ाक छाननी पड़ती है। डिजिटल क्रांति के बाद रंग में आई ‘मीडिया की भीड़ में शामिल बहुत सारे लोगों ने अलग-अलग नाम से पत्रकार संगठन भी बना लिए है। जिनका पत्रकारिता, लेखन से रोजमर्रा का कोई सीधा संबंध नहीं है, ऐसे बहुत लोग पत्रकार संगठन के पदाधिकारी बनकर वही सब कर रहे हैं,जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की थी। अब तो गंभीर पत्रकारिता से जुड़े लोग सोच रहे हैं कि अब अलग-अलग जगह पत्रकार कॉकरोच पार्टी भी बन जानी चाहिए।

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर ए नीमकश को

प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम को बैक डेट से पूर्णकालिक नियुक्ति देने के बाद उनकी स्थिति पर मिर्जा ग़ालिब का यह शेर खूब याद आ रहा है कि ‘कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर ए नीमकश को, ये खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता। राज्य में अरुण देव गौतम की डीजीपी के पद पर नियुक्ति पिछले साल फरवरी 2025 में भारी मशक्कत के बाद हुई वह भी प्रभार पर। तब से डीजीपी अपनी पूर्णकालिक नियुक्ति का इन्तजार करते रहे और आखिर में सरकार ने उन्हें डीजीपी तो बनाया लेकिन लगभग चौदह माह पुरानी तारीख से। मतलब गौतम अब आठ माह बाद रिटायर जाएंगे। अगर सरकार उन्हें यह नियुक्ति आज की तारीख से देती तो श्री गौतम मई 2028 तक डीजीपी होते। सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के मुताबिक डीजीपी का कार्यकाल दो साल का होना चाहिए। इसके पहले डीजीपी रहे अशोक जुनेजा को यह लाभ सरकार ने दिया। जबकि वे भी लगभग बारह महीने तक प्रभार पर रहे। दरअसल सरकार ने ये एक अच्छा तरीका निकाला है कि प्रभार पर काम लेते रहो तो अंकुश बना रहेगा। लेकिन अरुण देव गौतम के लिए यह खलिश तीर ए नीमकश को उजागर कर रही है।

‘चले थे हरि भजन को और कॉटन लगे कपास

खेती किसानी से जुड़े एक विभाग के मंत्री अपने वरिष्ठ अधिकारी से कुछ ज्यादा ही परेशान थे और वह बार-बार उसे बदलने का आग्रह भी किया भी करते थे। फिर तलाश शुरू हुई ऐसे अधिकारी की जो मंत्री जी का कहना भी सुने और विभाग में होने वाले सांस्कृतिक आदान-प्रदान का हिस्सा भी बने।
इस चक्कर में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने अपना तबादला इस विभाग में करा लिया इस उम्मीद से कि कमाई बहुत अच्छी होगी, लेकिन बताते हैं कि मामला अब उल्टा पड़ गया है। सभी को पता है की मध्य पूर्व में युद्ध के चलते देश में रासायनिक खाद का संकट खड़ा हो गया है जिसका असर प्रदेश पर भी पड़ रहा है। अभी संकट से निपटने के लिए सरकार ने यूरिया और डीएपी में कटौती करके हरी खाद (प्राकृतिक उर्वरक )को अधिक से अधिक इस्तेमाल करने पर जोर देना शुरू कर दिया है। अब मानसून के आते ही जब धान की बोनी होगी तब खाद की मांग बढ़ेगी और हंगामा भी स्वाभाविक है होगा ही, लेकिन फिलहाल बड़ी उम्मीद लेकर आए इस अधिकारी के साथ तो यही हुआ कि ‘चले थे हरि भजन को और कॉटन लगे कपासÓ।

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