-सुभाष मिश्र
सुंदर दिखने की चाह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। हर व्यक्ति चाहता है कि वह आकर्षक दिखे, उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली लगे और समाज उसे स्वीकार करे। लेकिन आधुनिक समय में यह चाह अब एक विशाल बाजार में बदल चुकी है। और यह बाजार व्यक्ति के जीवन को खतरे में डालकर भी लाभ कमाने के धंधे में धुत्त है। बाजार से नैतिकता खत्म हो चुकी है। बाजार आदमी की इच्छा को जरूरत में बदल चुका है। दुनिया भर में सुंदरता के नाम पर अरबों-खरबों रुपये का कारोबार हो रहा है। कॉस्मेटिक कंपनियां, हेल्थ सप्लीमेंट निर्माता, स्किन क्लिनिक, जिम उद्योग, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और डिजिटल प्लेटफॉर्म मिलकर एक ऐसा वातावरण बना रहे हैं जिसमें लोगों को यह महसूस कराया जा रहा है कि प्राकृतिक रूप पर्याप्त नहीं है। यदि आप गोरे नहीं हैं, पतले नहीं हैं, मसल्स वाले नहीं हैं, चेहरे पर झुर्रियां हैं या शरीर परफेक्ट नहीं है तो मानो आप अधूरे हैं। यही मानसिकता आज सबसे बड़ा संकट बनती जा रही है।
सुंदरता के इस बाजार में अब केवल क्रीम, पाउडर या साबुन नहीं बिक रहे, बल्कि शरीर के भीतर तक हस्तक्षेप करने वाले इंजेक्शन, हार्मोन, स्टेरॉयड और तरह-तरह की दवाइयां भी बेची जा रही हैं। सोशल मीडिया पर हर दिन ऐसे विज्ञापन दिखाई देते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि बिना सर्जरी के चेहरा चमक जाएगा, त्वचा टाइट हो जाएगी, होंठ आकर्षक बन जाएंगे, झुर्रियां गायब हो जाएंगी, स्तनों का आकार बदल जाएगा या कुछ ही दिनों में शरीर मस्कुलर हो जाएगा। लड़कों को हीरो जैसा बॉडी और लड़कियों को गलैमरस लुक देने के नाम पर एक बड़ा लोभी बाजार काम कर रहा है। यह बाजार केवल बाहरी सुंदरता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सेक्स पावर बढ़ाने, जवान दिखने और उम्र को मात देने के दावों तक फैल चुका है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऐसे लोग भी विशेषज्ञ बनकर सलाह दे रहे हैं जिनका चिकित्सा विज्ञान से कोई संबंध नहीं है।
यही कारण है कि अब केंद्र सरकार के अधीन केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ को हस्तक्षेप करना पड़ा है। हाल ही में जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी कॉस्मेटिक उत्पाद का इस्तेमाल इंजेक्शन के रूप में नहीं किया जा सकेगा। यह नियम उपभोक्ताओं के साथ-साथ प्रोफेशनल एस्थेटिक क्लिनिकों पर भी समान रूप से लागू होगा। अर्थात अब सुंदरता के नाम पर त्वचा के भीतर कॉस्मेटिक इंजेक्शन लगाने की अनुमति नहीं होगी। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 तथा उसके बाद हुए संशोधनों के अनुसार कॉस्मेटिक उत्पाद केवल बाहरी उपयोग के लिए होते हैं। उनका उद्देश्य शरीर की सफाई, त्वचा की देखभाल और बाहरी सौंदर्य को बढ़ाना है, न कि चिकित्सा उपचार देना।
सीडीएससीओ का यह फैसला केवल तकनीकी आदेश नहीं है, बल्कि उस खतरनाक प्रवृत्ति पर रोक लगाने का भोला प्रयास है जिसमें सुंदरता को स्वास्थ्य से ऊपर रखा जा रहा था। भोला प्रयास इस अर्थ में कि यह सब कार्रवाई तब क्यों की जा रही है जब पानी नाक से ऊपर चढ़ गया है। स्थिति खतरे के निशान से ऊपर हो गई है। ऐसा तो है नहीं कि यह सब विभागों को पहले नहीं पता था। भारत मेंशासकीय व्यवस्था कुछ ऐसी हो गई है कि जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती, किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती है। कितने ही गलत काम होते रहे। कितनी भी अव्यवस्था रहे। कितने ही लोगों की जान जोखिम में रहे, सब कुछ चलता रहता है। जैसे हर विभाग किसी बड़े कांड का, किसी बड़ी दुर्घटना की प्रतीक्षा करता है। आज स्थिति यह है कि बिना चिकित्सकीय सलाह के लोग इंजेक्शन लेते हैं, स्टेरॉयड खाते हैं या अनजान दवाइयों का उपयोग करते हैं। उसका सीधा असर शरीर पर पड़ता है। स्किन एलर्जी, हार्मोनल असंतुलन, त्वचा खराब होना, किडनी और लीवर पर असर, बाल झडऩा, असमय झुर्रियां आना और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। जिम में मसल्स बनाने वाले अनेक युवाओं के स्वास्थ्य पर इसका गंभीर प्रतिकूल प्रभाव देखा गया है। त्वचा विशेषज्ञ बताते हैं कि आज लोग चेहरे की चमक, शरीर की बनावट और उम्र छिपाने के लिए अत्यधिक आक्रामक उपाय अपना रहे हैं। शरीर कोई आजम को जोखिम में डालकर कॉस्मेटिक का उपयोग कर रहे हैं। इंजेक्शन ले रहे हैं।
दरअसल आधुनिक बाजार मनुष्य के आत्मविश्वास को निशाना बनाता है। पहले हीन भावना पैदा की जाती है और फिर समाधान बेचा जाता है। गोरेपन की क्रीम से लेकर वजन घटाने वाली दवाइयों तक, हर उत्पाद यही संदेश देता है कि प्राकृतिक रूप पर्याप्त नहीं है। यही कारण है कि भारत में भ्रामक विज्ञापनों के अनेक चर्चित मामले सामने आए हैं।
सबसे दुखद स्थिति यह है कि इनपर कानूनी कार्रवायाँ न के बराबर होती है। ऐसा भी नहीं है कि यह संबंधित विभाग, पुलिस या प्रशासन की जानकारी के बगैर होता है। सबको मालूम है क्या हो रहा है लेकिन भारतीय बाजार यह भी जानता है कि विभागों में लेनदेन के बाद कितना भी बड़ा कथित अनैतिक व्यापार किया जा सकता है। लोगों की धारणाओं को ऐसी दुर्घटनाओं से बल मिला है कि भारत के सरकारी विभागों में रिश्वत देने के लिए आग्रह नहीं करना पड़ता है बल्कि वे तैयार बैठे रहते हैं। बल्कि रिश्वत देने के लिए दबाव भी डालते हैं। यहां सरकारी मशीनरी को खरीदने के लिए कोशिश नहीं करती पड़ती क्योंकि वह बिकने के लिए उतावली है। ऐसी अफवाहें और धारणाएं खूब फैल रही हैं।
सबसे बड़ा मामला पतंजलि आयुर्वेद और कोविड-19 से जुड़े दावों का रहा। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि कंपनी गंभीर बीमारियों के इलाज और एलोपैथी को बदनाम करने वाले अपुष्ट दावे कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई और कंपनी को सार्वजनिक माफी तक मांगनी पड़ी। यह मामला केवल एक कंपनी का नहीं था, बल्कि उस प्रवृत्ति का प्रतीक था जिसमें वैज्ञानिक प्रमाणों से अधिक मार्केटिंग को महत्व दिया जाने लगा।
इसी तरह यूपीएससी, नीट और जेईई जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कई कोचिंग संस्थानों पर भी कार्रवाई हुई। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण यानी सीसीपीए ने पाया कि अनेक संस्थान 100 प्रतिशत सफलता दर और टॉप रैंक के भ्रामक दावे कर रहे थे। कई जगह उन छात्रों की तस्वीरों का उपयोग किया गया जिन्होंने वहां नियमित कोचिंग तक नहीं ली थी। मोशन एजुकेशन और सीएलसी सीकर जैसे संस्थानों पर भारी जुर्माना लगाया गया। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी मार्केटिंग का यह छल युवाओं और अभिभावकों की भावनाओं के साथ खेलता रहा।
ब्यूटी और हेल्थ सप्लीमेंट उद्योग तो लंबे समय से विवादों में रहा है। गोरा बनाने वाली क्रीमों ने वर्षों तक समाज में रंगभेद और हीन भावना को बढ़ावा दिया। ’30 दिन में वजन कमÓ, ‘7 दिन में चमकदार त्वचाÓ या ‘एक महीने में नया शरीरÓ जैसे दावे बिना वैज्ञानिक आधार के किए जाते रहे। सरकारें सोती रहीं। विज्ञापन मानक परिषद यानी एएससीआई ने ऐसे अनेक विज्ञापनों को भ्रामक बताकर कर्तव्य से छुट्टी पाली। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यह कारोबार और तेजी से फैल गया है, क्योंकि अब प्रचार पर नियंत्रण कठिन हो गया है।
ऑटोमोबाइल कंपनियों द्वारा माइलेज के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे भी उपभोक्ता अदालतों तक पहुंचे। वहीं कोविड-19 महामारी के दौरान कुछ पेंट, साबुन और आरओ कंपनियों ने वायरस से सुरक्षा के दावे कर लोगों के डर का व्यापार किया। वैज्ञानिक प्रमाण न होने के बावजूद उत्पादों को चमत्कारी बताने का प्रयास किया गया। यह दिखाता है कि बाजार अवसर देखता है, संवेदनाएं नहीं।
आज स्थिति यह है कि सोशल मीडिया पर डॉक्टरों से ज्यादा डिजिटल विशेषज्ञ दिखाई देते हैं। कोई बिना डिग्री के त्वचा रोग का इलाज बता रहा है, कोई सेक्स पावर बढ़ाने की गारंटी दे रहा है, कोई इंजेक्शन और सप्लीमेंट बेच रहा है। 70-80 साल की उम्र में भी जवान ताकत लौटाने के दावे खुलेआम किए जा रहे हैं। लाखों लोग इन दावों के प्रभाव में आकर अपने शरीर के साथ प्रयोग कर रहे हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि युवा पीढ़ी इस बात पर भरोसा करने लगी है।
ऐसे में कानूनी हस्तक्षेप आवश्यक हो गया था। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के अंतर्गत केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण को भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई का अधिकार दिया गया है। झूठे विज्ञापन देने वाली कंपनियों पर 10 लाख से 50 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, ऐसे विज्ञापनों का समर्थन करने वाली सेलिब्रिटीज पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। लेकिन यह सब कार्रवाई एकाध बार उदाहरण के लिए होती है और फिर सब कुछ सेट हो जाता है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अब यह अनिवार्य किया है कि किसी भी विज्ञापन के प्रसारण से पहले कंपनी को स्व-घोषणा देनी होगी कि उसका दावा भ्रामक नहीं है।
लेकिन सवाल केवल कानून का नहीं है। असली चुनौती शासकीय व्यवस्था की जिम्मेदारी की है। यदि समाज बाहरी दिखावे को ही सफलता और आत्मविश्वास का पैमाना बना देगा तो यह बाजार कभी खत्म नहीं होगा। बाजार तो समाज का मनोविज्ञान इसी तरह से तैयार करता है। इस मनोविज्ञान को और बाजार की लोभी हरकतों को बंद करने के लिए सरकार को कड़ी कार्रवाइयां करनी चाहिए ।
लोगों भी को यह समझना होगा कि हर चमक स्वास्थ्य नहीं होती और हर दावा विज्ञान नहीं होता। सुंदरता यदि स्वास्थ्य छीनने लगे, आत्मसम्मान को बाजार का बंधक बना दे और शरीर को प्रयोगशाला बना दे, तो यह सौंदर्य नहीं बल्कि शोषण है। सरकार की सख्ती की जरूरत अब बढ़ गई है।