बस्तर की मिठास : क्या इस बार वनवासियों तक पहुंचेगा लाभ?

बस्तर की मिठास : क्या इस बार वनवासियों तक पहुंचेगा लाभ?

-सुभाष मिश्र
बस्तर की पहचान लंबे समय तक नक्सल हिंसा, भय और उपेक्षा से जुड़ी रही, लेकिन अब वही बस्तर विकास, आत्मनिर्भरता और उम्मीद की नई कहानी लिखने की कोशिश कर रहा है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हालिया बस्तर दौरे ने इसी बदलते दौर की तस्वीर सामने रखी, जहां सुरक्षा के साथ-साथ वनवासियों के आर्थिक अधिकार, महिलाओं की भागीदारी और स्थानीय संसाधनों के न्यायपूर्ण लाभ की बात केंद्र में दिखाई दी। बस्तर की इमली को ‘मीठी’ बताने वाली टिप्पणी केवल स्वाद का जिक्र नहीं, बल्कि उस बदलाव का प्रतीक है जिसमें जंगल की संपदा का असली लाभ आदिवासी समाज तक पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। अब सवाल यही है कि क्या यह बदलाव केवल घोषणाओं तक सीमित रहेगा या सचमुच बस्तर के वनवासियों के जीवन में मिठास घोल पाएगा।

बस्तर की इमली अब खट्टी नहीं, मीठी होगी—बस शर्त इतनी कि उसका असली स्वाद वनवासियों को मिले। केंद्रीय गृहमंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का बस्तर दौरा केवल एक सरकारी कार्यक्रम भर नहीं था, बल्कि यह उस बदलते बस्तर की तस्वीर भी था जो कभी नक्सल हिंसा, भय और उपेक्षा की पहचान बन गया था। नेतानार में शहीद वीर गुंडाधूर सेवा डेरा (जन सुविधा केंद्र) के उद्घाटन, महिला स्व सहायता समूहों से संवाद, इमली प्रसंस्करण केंद्र के निरीक्षण और शहीद जवानों के परिवारों से मुलाकात के जरिए एक संदेश देने की कोशिश हुई कि अब बस्तर केवल सुरक्षा अभियान का विषय नहीं, बल्कि विकास, सम्मान और आत्मनिर्भरता की नई कहानी बनने जा रहा है। जब अमित शाह ने बस्तर की इमली का स्वाद चखते हुए कहा कि ‘यहां की इमली खट्टी नहीं, मीठी है’, तो यह सिर्फ स्वाद की टिप्पणी नहीं थी, बल्कि उस उम्मीद का प्रतीक थी कि अब बस्तर की वन उपज का असली लाभ यहां के वनवासियों और आदिवासी परिवारों तक पहुँचे।

दरअसल, दशकों तक बस्तर की पहचान उसकी प्राकृतिक संपदा रही, लेकिन इसका सबसे कम लाभ उन्हीं लोगों को मिला जिनकी जिंदगी जल, जंगल और जमीन पर टिकी हुई थी। इमली, तेंदूपत्ता, चिरौंजी, हर्रा, महुआ और कई औषधीय वन उत्पादों का बड़ा बाजार बना, मगर बीच में मौजूद बिचौलियों ने आदिवासियों की मेहनत का अधिकांश हिस्सा हड़प लिया। गांवों में रहने वाला संग्रहकर्ता बेहद कम कीमत पर अपनी उपज बेचने को मजबूर रहा, जबकि वही उत्पाद शहरों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कई गुना दाम पर बिकते रहे। ऐसे में यदि सहकारिता मॉडल, स्व सहायता समूह और स्थानीय प्रसंस्करण केंद्र वास्तव में मजबूत किए जाते हैं, तो बस्तर की ‘मीठी इमली’ का स्वाद पहली बार वनवासियों की जिंदगी में भी मिठास ला सकता है। शर्त यही है कि व्यवस्था ऐसी बने जिसमें बाजार तक सीधी पहुंच हो, न्यूनतम समर्थन मूल्य मजबूत हो और लाभ की सबसे बड़ी हिस्सेदारी स्थानीय समुदायों को मिले, न कि बिचौलियों को।

दूसरी ओर, बस्तर को नक्सल हिंसा से बाहर निकालने की प्रक्रिया में जिन जवानों और स्थानीय परिवारों ने बलिदान दिया, उन्हें सम्मान और भरोसा देना भी उतना ही जरूरी है। जगदलपुर की अमर वाटिका में शहीदों को श्रद्धांजलि और उनके परिजनों से आत्मीय मुलाकात केवल संवेदना का प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना भी था कि बस्तर की शांति बहुत बड़ी कीमत देकर हासिल हुई है। हालांकि चुनौतियां अब भी खत्म नहीं हुई हैं कई इलाकों में लैंडमाइन का खतरा, नक्सली नेटवर्क के अवशेष और विकास को लेकर अविश्वास अभी भी मौजूद हैं। इसलिए बस्तर में स्थायी शांति तभी संभव होगी जब विकास केवल सडक़ों और भवनों तक सीमित न रहे, बल्कि आदिवासी समाज की भागीदारी, सम्मान और आर्थिक अधिकारों के साथ आगे बढ़े। यदि ऐसा हुआ, तो सचमुच बस्तर की इमली केवल स्वाद में नहीं, बल्कि वहां के लोगों के जीवन में भी मीठी साबित होगी।

इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि बस्तर का बदलाव केवल सुरक्षा अभियानों से स्थायी नहीं बनेगा। लंबे समय तक यहां के दूरस्थ गांव शासन और व्यवस्था से कटे रहे, जिसके कारण नक्सली संगठनों ने खुद को ‘वैकल्पिक व्यवस्था’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। अब जब नेतानार जैसे गांवों में आधार कार्ड, बैंकिंग सुविधा, ई-केवाईसी, प्रमाण पत्र, सिलाई प्रशिक्षण और महिला स्व सहायता समूहों के माध्यम से सरकार सीधे लोगों के दरवाजे तक पहुंच रही है, तो यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। ग्रामीणों को पहली बार यह महसूस होना जरूरी है कि सरकार केवल सुरक्षा बलों के कैंप तक सीमित नहीं, बल्कि उनके जीवन को आसान बनाने वाली व्यवस्था भी है। डिजिटल सेवाओं और स्थानीय रोजगार के जरिए यदि गांव आत्मनिर्भर बनते हैं, तो यह नक्सलवाद की उस जमीन को कमजोर करेगा जो वर्षों तक उपेक्षा और अलगाव की भावना पर खड़ी रही।
बस्तर के भविष्य की सबसे बड़ी कुंजी वहां की युवा पीढ़ी और महिलाएं हैं। यदि स्व सहायता समूहों, वन उपज प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, कृषि आधारित उद्योग और स्थानीय उद्यमों को मजबूत बाजार उपलब्ध कराया गया, तो बस्तर देश के सबसे बड़े आदिवासी आर्थिक मॉडल के रूप में उभर सकता है। आज जरूरत केवल योजनाओं की घोषणा की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि हर योजना का लाभ अंतिम गांव और अंतिम परिवार तक पारदर्शिता के साथ पहुंचे। बस्तर को ‘रेड कॉरिडोर’ से ‘ग्रोथ कॉरिडोर’ बनाने की चर्चा वर्षों से होती रही है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ तभी होगा जब वहां का युवा रोजगार के लिए बंदूक नहीं, बल्कि कौशल और बाजार पर भरोसा करे। तभी बस्तर की इमली का स्वाद सचमुच मीठा कहलाएगा, क्योंकि उसकी मिठास दिल्ली या बड़े कारोबारियों तक नहीं, बल्कि सीधे उन वनवासियों के जीवन में दिखाई देगी जिनकी मेहनत से यह धरती समृद्ध है।

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