-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ अब केवल खनिज, वन और सांस्कृतिक विविधता का प्रदेश भर नहीं रह गया है; वह तेजी से खेलों के मानचित्र पर अपनी अलग पहचान गढ़ने की दिशा में बढ़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह राज्य सरकार ने खेल अधोसंरचना, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन पर जोर दिया है, उसने एक नई बहस को जन्म दिया है क्या छत्तीसगढ़ वास्तव में “खेलगढ़” बन सकता है?
इस सवाल का उत्तर सीधा नहीं है, लेकिन संकेत निश्चित रूप से सकारात्मक हैं। नवा रायपुर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, आधुनिक हॉकी और स्विमिंग सुविधाएं, निर्माणाधीन बैडमिंटन अकादमी और विभिन्न जिलों में बन रहे स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स यह बताते हैं कि सरकार केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि ज़मीन पर ढांचा खड़ा करने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि BCCI ने यहां अंतरराष्ट्रीय मैचों के आयोजन का निर्णय लिया, जहां भारत दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड जैसी टीमों के साथ वनडे और टी20 मैच खेला। IPL 2026 के लिए RCB ने छत्तीसगढ़ को अपना होम ग्राउंड बनाया है और 10 और 13 मई को दो मैच नवा रायपुर के अंतरराष्ट्रीय मैदान में खेले जाएंगे। यह सिर्फ मैच नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की खेल विश्वसनीयता की परीक्षा भी होगी।
खिलाड़ियों को दी जा रही प्रोत्साहन राशि ओलंपिक स्वर्ण के लिए 3 करोड़ रुपये सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि एक संदेश है कि खेल अब करियर का वैध और सम्मानजनक विकल्प है। यही कारण है कि आकर्षी कश्यप जैसे खिलाड़ी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमक रहे हैं। अतीत में राजेश चौहान और सबा अंजुम ने जो नींव रखी थी, आज उसे शशांक सिंह और रेणुका यादव जैसे नए चेहरे आगे बढ़ा रहे हैं।
बस्तर ओलंपिक और सरगुजा ओलंपिक ने आदिवासी अंचलों में खेल संस्कृति को नई ऊर्जा दी है। इन आयोजनों ने ग्रामीण प्रतिभाओं को न केवल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों से जोड़ा, बल्कि पारंपरिक खेलों को भी सम्मानजनक मंच प्रदान कर स्थानीय विरासत को सहेजने का काम किया। दूर-दराज़ के गांवों से निकले खिलाड़ियों में इन प्रतियोगिताओं ने नया आत्मविश्वास जगाया और खेलों के प्रति व्यापक उत्साह पैदा किया। इन आयोजनों की खास बात यह रही कि शुभारंभ और समापन समारोह में बाइचुंग भूटिया, गीता फोगट और मैरी कॉम जैसे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की मौजूदगी ने प्रतिभागियों का मनोबल कई गुना बढ़ा दिया।
लेकिन छत्तीसगढ़ की खेल कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू उसका “ग्रामीण और आदिवासी आयाम” है। बस्तर ओलंपिक में 1.65 लाख से अधिक प्रतिभागियों की भागीदारी केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस सामाजिक बदलाव का संकेत है जहां खेल अब बंदूक की जगह ले रहा है। जब सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गज दंतेवाड़ा पहुंचकर युवाओं को प्रोत्साहित करते हैं, तो यह केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि मुख्यधारा से जुड़ने का प्रतीक बन जाता है। नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में खेल का यह हस्तक्षेप सामाजिक स्थिरता का भी माध्यम बन रहा है।
राज्य में स्पोर्टस अथॉरिटी ऑफ इंडिया और “खेलो इंडिया” जैसी योजनाओं के साथ मिलकर जो अकादमिक ढांचा तैयार किया गया है रायपुर, बिलासपुर और शिवतराई के प्रशिक्षण केंद्र वह प्रतिभाओं को शुरुआती स्तर से ही पोषण दे रहा है। यही वजह है कि खेलो इंडिया यूथ गेम्स और नेशनल गेम्स में पदकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह उभार संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित निवेश का परिणाम है।
फिर भी, इस पूरे उत्साह के बीच कुछ जरूरी सवाल भी खड़े होते हैं। क्या यह विकास टिकाऊ है या केवल बड़े आयोजनों तक सीमित रह जाएगा? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में बने “खेलो इंडिया लघु केंद्र” लंबे समय तक प्रशिक्षकों, संसाधनों और निरंतरता के साथ चल पाएंगे? क्या खिलाड़ियों के लिए करियर की स्पष्ट राह खेल से नौकरी, स्थायित्व और सामाजिक सुरक्षा भी उतनी ही मजबूत है जितनी कि स्टेडियम की इमारतें?
छत्तीसगढ़ के पास एक अनूठा अवसर है वह खेलों को केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना सकता है। आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक खेलों को शामिल करना, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाना इस दिशा में मजबूत कदम हैं। लेकिन “खेलगढ़” बनने के लिए केवल अधोसंरचना और पुरस्कार पर्याप्त नहीं होंगे; इसके लिए दीर्घकालिक नीति, पारदर्शी चयन प्रणाली, गुणवत्तापूर्ण कोचिंग और खिलाड़ियों के समग्र विकास की जरूरत होगी।
आज छत्तीसगढ़ उस मोड़ पर खड़ा है जहां से वह या तो एक “इवेंट-आधारित खेल राज्य” बन सकता है या फिर एक “प्रतिभा-आधारित खेल शक्ति”। अंतर सिर्फ नीतियों की निरंतरता और क्रियान्वयन की ईमानदारी का है।
यदि सरकार अपने मौजूदा प्रयासों को स्थायित्व, पारदर्शिता और जमीनी मजबूती के साथ आगे बढ़ाती है, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ केवल भारत के खेल मानचित्र पर नहीं, बल्कि वैश्विक खेल जगत में भी एक मजबूत पहचान के साथ उभरेगा। तब “खेलगढ़” कोई सवाल नहीं, बल्कि एक स्थापित सच्चाई होगा।