संघर्ष की अनसुनी दास्तां: जब पेड़ से लटकाया गया था माइक

भारतीय संगीत जगत की महान गायिका आशा भोसले का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। मल्टीपल ऑर्गन फेलियर के कारण उन्होंने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरी फिल्म इंडस्ट्री और प्रशंसकों में शोक की लहर है। दिवंगत लता मंगेशकर की छोटी बहन आशा भोसले ने आठ दशकों तक अपनी आवाज से करोड़ों दिलों पर राज किया।

12 अप्रैल को हुए उनके देहांत के साथ ही भारतीय पार्श्व गायन के एक ऐतिहासिक अध्याय का समापन हो गया है। उन्होंने अपने करियर में 12 हजार से ज्यादा गानों को आवाज दी और कई प्रतिष्ठित सम्मान हासिल किए।

संघर्ष से भरा रहा शुरुआती सफर

आशा भोसले का संगीत सफर बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। उन्होंने महज 10 साल की उम्र में अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया था। यह गाना 1943 में मराठी फिल्म माझा बाल के लिए था। उस दौर की सीमित तकनीक के बीच उन्होंने अपनी पहचान बनाई। उनका पहला हिंदी गाना 1948 में फिल्म चुनरिया के लिए सावन आया था।

पेड़ के नीचे हुई थी पहले गाने की रिकॉर्डिंग

आशा भोसले ने एक बार अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया था कि उनका पहला गाना किसी आधुनिक स्टूडियो में नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे रिकॉर्ड हुआ था। उस समय अंधेरी के मोहन स्टूडियो में जगह की कमी के कारण वह बाहर खड़ी होती थीं और एक पेड़ से माइक लटकाया जाता था।

रिकॉर्डिंग के दौरान आती थीं बाधाएं

उन्होंने बताया था कि रिकॉर्डिंग के दौरान कौओं की आवाज, गुजरती गाड़ियों और ट्रेनों के शोर के कारण कई बार काम रोकना पड़ता था। सुबह 4 बजे तक चलने वाली इन रिकॉर्डिंग्स में आवाज कांपने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आशा जी का मानना था कि उन कठिन परिस्थितियों ने ही उन्हें एक मजबूत कलाकार बनाया। आज उनकी आवाज भले ही खामोश हो गई हो, लेकिन उनके सदाबहार नगमे हमेशा जीवित रहेंगे।

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