नई दिल्ली। अदालत से जमानत मिलने के बाद भी महीनों तक जेल की सलाखों के पीछे बंद रहने वाले कैदियों के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस गंभीर समस्या पर कड़ा संज्ञान लेते हुए एक बेहद अहम आदेश जारी किया है। कोर्ट ने दिल्ली की सभी जेलों के सुपरिटेंडेंट (जेल अधीक्षकों) को निर्देश दिया है कि वे जमानत पाने वाले कैदियों की जल्द रिहाई सुनिश्चित करने के लिए ‘आधार क्यूआर कोड वेरिफिकेशन एप्लीकेशन’ का इस्तेमाल करें। अक्सर देखा जाता है कि कागजी कार्रवाई और जांच-परख के चक्कर में अंडरट्रायल कैदियों को जमानत मिलने के बाद भी हफ्तों जेल में ही गुजारने पड़ते हैं।

जमानतदारों की पहचान में नहीं लगेगा वक्त
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने इस मामले पर 22 मई 2026 को सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि जमानतदारों (श्योरिटी) की पहचान और उनके दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच करने में मौजूदा व्यवस्था में बहुत ज्यादा समय लग जाता है।
अदालत ने पाया कि कई मामलों में जमानत मिलने के बावजूद केवल वेरिफिकेशन के नाम पर कैदियों की रिहाई में 50-50 दिनों की भारी देरी हो जाती है। इस ढर्रे को सुधारने के लिए ही अब दिल्ली भर के जेल अधीक्षकों के लिए आधार क्यूआर कोड आधारित इस नई व्यवस्था का इस्तेमाल करना अनिवार्य होगा।
जल्द होगी रिहाई, कागजी लेटलतीफी से मिलेगी मुक्ति
इस नई व्यवस्था के लागू होने से सबसे बड़ा फायदा उन गरीब और बेसहारा कैदियों को होगा जो जमानत मिलने के बाद भी सरकारी लेटलतीफी का शिकार होते थे। अब जेल प्रशासन जमानतदारों के दस्तावेजों को तुरंत स्कैन कर उनकी असलियत का पता लगा सकेगा। इससे न तो फर्जी जमानतदारों का खतरा रहेगा और न ही जांच के नाम पर वक्त बर्बाद होगा। कोर्ट ने माना है कि तकनीक के इस सही इस्तेमाल से पूरी रिहाई प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और कैदियों के मानवाधिकारों की रक्षा हो सकेगी। राजधानी की सभी जेलों को इस आदेश का तुरंत पालन करने के लिए कह दिया गया है।