नक्सलवाद पर सियासत: वैचारिक लड़ाई, जीत के दावे और अधूरी सच्चाइयाँ

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का मुद्दा अब केवल सुरक्षा या विकास का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह गहरे राजनीतिक और वैचारिक टकराव का केंद्र बन चुका है। 31 मार्च 2026 की तय समयसीमा के साथ जब केंद्र सरकार ने नक्सलवाद के लगभग अंत का दावा किया, तो इसके साथ ही सियासत ने भी तेज करवट ले ली। संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का बयान इस पूरे विमर्श का केंद्र बन गया, जहां एक ओर उन्होंने इसे 100 से अधिक वर्षों की वैचारिक लड़ाई का अंत बताया, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और तथाकथित ‘बौद्धिक वर्ग को कठघरे में खड़ा कर दिया।
गृहमंत्री ने नक्सलवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि एक आयातित विचारधारा की लड़ाई करार दिया, जिसकी जड़ें रूस और चीन की कम्युनिस्ट राजनीति से लेकर भारत में वामपंथी आंदोलनों तक फैली हुई हैं। नक्सलबाड़ी आंदोलन से शुरू होकर पीपुल्स वार ग्रुप और माओवादी संगठनों के विलय तक की पूरी यात्रा को उन्होंने एक वैचारिक षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत किया। उनका स्पष्ट संदेश था कि यह आंदोलन गरीबी या विकास की कमी का परिणाम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ एक संगठित वैचारिक चुनौती था।
लेकिन यहीं से बहस का दूसरा पक्ष भी सामने आता है। क्या नक्सलवाद को केवल ‘विचारधारा का आयात कहकर उसकी जटिलता को सीमित कर देना पर्याप्त है? यह सच है कि हिंसा, लेवी वसूली, अपहरण और निर्दोषों की हत्या ने इस आंदोलन के नैतिक आधार को कमजोर किया। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जिन क्षेत्रों में यह आंदोलन पनपा, वहां लंबे समय तक विकास, न्याय और शासन की पहुंच बेहद सीमित रही।
संसद में दिए गए बयान के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्र के दावों को खारिज करते हुए उन्हें ‘राजनीतिक अतिशयोक्तिÓ बताया और खुली बहस की चुनौती दी। उनका कहना है कि बस्तर में जो भी बदलाव आया, वह केवल सुरक्षा कार्रवाई का परिणाम नहीं, बल्कि विश्वास बहाली और विकास की निरंतर प्रक्रिया का नतीजा है।
वहीं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा केंद्र के दावों के साथ मजबूती से खड़े नजर आते हैं। उनके मुताबिक, बस्तर अब निर्णायक रूप से नक्सल प्रभाव से बाहर निकल चुका है और पुनर्वास नीति ने बड़ी संख्या में लोगों को मुख्यधारा में लौटाया है। यह दावा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि क्या यह बदलाव स्थायी है या अभी संक्रमणकाल चल रहा है।
इसी बीच नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत का दृष्टिकोण इस बहस को एक अलग गहराई देता है। उनका कहना है कि नक्सलवाद का सशस्त्र स्वरूप कमजोर हुआ है, लेकिन उसकी विचारधारा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। यह टिप्पणी उस ‘बिटवीन द लाइन सच्चाई को उजागर करती है, जिसे अक्सर राजनीतिक बयानबाजी ढक देती है।
दरअसल, यही वह बिंदु है जहां यह पूरा विमर्श सबसे अधिक जटिल हो जाता है। एक ओर आंकड़े हैं, हजारों आत्मसमर्पण, सैकड़ों मुठभेड़, नक्सल प्रभावित जिलों में भारी कमी। दूसरी ओर वे अनकही कहानियां भी हैं, जंगलों के भीतर की वास्तविकताएं, सुरक्षा अभियानों के दौरान उठे मानवाधिकार के सवाल, और वे रिपोर्टें जिनमें निर्दोषों के प्रभावित होने की बात सामने आई। ये पहलू भले ही राजनीतिक भाषणों में कम दिखाई दें, लेकिन जमीनी सच्चाई का हिस्सा जरूर हैं।
नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई अगर वास्तव में अपने अंतिम चरण में है, तो यह केवल सुरक्षा बलों की जीत नहीं, बल्कि राज्य की उस क्षमता की परीक्षा भी है जिसमें वह अपने सबसे दूरस्थ और वंचित नागरिकों तक न्याय और विकास पहुंचा सके। ‘क्लियर, होल्ड और डेवलप की रणनीति तभी सफल मानी जाएगी, जब ‘होल्ड के बाद ‘ट्रस्ट स्थायी रूप से स्थापित हो।
आज जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल उभरता है, वह यह है कि क्या हम नक्सलवाद के अंत की घोषणा कर रहे हैं, या उसके एक चरण के समाप्त होने की? क्योंकि विचारधाराएं बंदूक के साथ खत्म नहीं होतीं, वे तब खत्म होती हैं जब उनके पीछे खड़े असंतोष और असमानता के कारण समाप्त हो जाते हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इस समय जो गर्मी दिखाई दे रही है, वह केवल आरोप-प्रत्यारोप का परिणाम नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि नक्सलवाद का मुद्दा अभी पूरी तरह अतीत नहीं बना है। सत्ता पक्ष इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में स्थापित करना चाहता है, जबकि विपक्ष इसे अधूरी कहानी बताकर सवाल खड़े कर रहा है।
सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है। बस्तर बदल रहा है, यह स्पष्ट है। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि इस बदलाव को स्थायी बनाने के लिए केवल जीत के दावे पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए जरूरी है पारदर्शिता, जवाबदेही और उन सभी सवालों का सामना करने का साहस, जो आज भी जंगलों के भीतर और समाज के हाशिए पर मौजूद हैं।
नक्सलवाद की लड़ाई अगर सच में खत्म हो रही है, तो यह समय जश्न से ज्यादा आत्ममंथन का होना चाहिए, ताकि आने वाले समय में कोई नया असंतोष, किसी नई विचारधारा के नाम पर, फिर से उसी जमीन पर जन्म न ले सके।

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