सब कुछ लुटाकर होश में आए तो क्या?

-सुभाष मिश्र

उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए।
— दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार का यह शेर आज देश की परीक्षा व्यवस्था पर उठे संकट के बीच असहज ढंग से प्रासंगिक हो उठता है। वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने और भर्ती प्रक्रियाओं में गड़बडिय़ों से आहत देश के करोड़ों युवाओं से अब फिर कहा जा रहा है कि वे नई व्यवस्था पर भरोसा करें। सवाल यह नहीं है कि सरकार सुधार चाहती है या नहीं। सवाल यह है कि जिस व्यवस्था ने बार-बार युवाओं के सपनों को चोट पहुंचाई, क्या वह केवल नई टास्क फोर्स और नए कानून के सहारे अपना खोया विश्वास इतनी आसानी से वापस पा लेगी?

देश के करोड़ों युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि उनके संघर्ष, सपनों और आत्मसम्मान का सबसे बड़ा आधार हैं। कोई छात्र वर्षों तक तैयारी करता है, परिवार अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करता है और जीवन के सबसे ऊर्जावान वर्ष एक अवसर की प्रतीक्षा में बीत जाते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता ही संदेह के घेरे में आ जाए तो केवल एक परीक्षा नहीं, पूरी व्यवस्था कटघरे में खड़ी हो जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में लगभग हर बड़ी प्रतियोगी परीक्षा किसी न किसी विवाद में रही। कभी पेपर लीक, कभी सॉल्वर गैंग, कभी फर्जी अभ्यर्थी, कभी परीक्षा निरस्त और कभी परिणामों पर सवाल। लाखों अभ्यर्थियों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया, अदालतों का दरवाजा खटखटाया और सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ा व्यक्त की। अंतत: यह मामला इतना गंभीर हुआ कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को भी अपना पद छोडऩा पड़ा। यह केवल एक मंत्री का इस्तीफा नहीं था, बल्कि इस स्वीकारोक्ति का संकेत भी था कि परीक्षा व्यवस्था में कुछ बहुत गंभीर टूट चुका है।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंफोसिस के सह-संस्थापक और आधार परियोजना के प्रमुख वास्तुकार नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में छह सदस्यीय उच्चस्तरीय टास्क फोर्स गठित की है। इसमें पूर्व इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामकोटी, पूर्व शिक्षा सचिव अनिता करवाल और वरिष्ठ प्रशासक अमृत लाल मीणा जैसे अनुभवी विशेषज्ञ शामिल हैं। इसके साथ ही पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक-2026 भी लाया जा रहा है, जिसमें परीक्षा माफिया के लिए कठोर दंड, त्वरित जांच और फास्ट-ट्रैक न्यायालयों की व्यवस्था का प्रस्ताव है।
यह पहल निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। नंदन नीलेकणी ने आधार और यूपीआई जैसे विश्वस्तरीय डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किए हैं। यदि उनकी विशेषज्ञता से परीक्षा प्रणाली को लीक-प्रूफ, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाया जा सके तो यह देश के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ब्लॉकचेन, डिजिटल एन्क्रिप्शन और सुरक्षित लॉजिस्टिक्स जैसी तकनीकें निश्चित रूप से व्यवस्था को अधिक मजबूत बना सकती हैं, लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न तकनीक नहीं, भरोसे का है।
देश की नई पीढ़ी, जिसे हम जेन-ज़ी कहते हैं, घोषणाओं से अधिक परिणामों पर विश्वास करती है। उसका प्रश्न सीधा है—जब वर्षों से छात्र परीक्षा में धांधलियों की शिकायत कर रहे थे, तब सरकार ने इतने बड़े सुधारों की पहल पहले क्यों नहीं की? जब लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर था, तब व्यवस्था इतनी देर तक मौन क्यों रही? यह स्थिति कुछ-कुछ तीन कृषि कानूनों के समय जैसी दिखाई देती है। सरकार लगातार किसानों को भरोसा दिलाती रही कि कानून उनके हित में हैं, लेकिन किसान आश्वस्त नहीं हुए। अंतत: सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। आज परीक्षा व्यवस्था को लेकर भी सरकार युवाओं से भरोसा मांग रही है, लेकिन भरोसा आदेश से नहीं मिलता, उसे अर्जित करना पड़ता है।
सरकारी कामकाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अक्सर संकट के बाद जागता है। समितियां बनती हैं, रिपोर्टें आती हैं, सिफारिशें होती हैं और फिर फाइलों की लंबी यात्रा शुरू हो जाती है। इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए। यदि टास्क फोर्स की सिफारिशें भी वर्षों तक अमल का इंतजार करती रहीं, तो यह पहल भी केवल एक और सरकारी दस्तावेज बनकर रह जाएगी।
यह भी याद रखना होगा कि समस्या केवल पेपर लीक की नहीं है। वर्षों में परीक्षा माफिया एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। इसमें तकनीकी विशेषज्ञ, कोचिंग नेटवर्क, प्रिंटिंग, परिवहन, स्थानीय तंत्र और भ्रष्ट प्रशासनिक तत्वों की मिलीभगत के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। यदि केवल तकनीक बदल दी जाएगी लेकिन जवाबदेही नहीं बदलेगी तो नई व्यवस्था भी पुराने रोग से मुक्त नहीं हो पाएगी।
परीक्षा लोकतंत्र में समान अवसर का सबसे बड़ा माध्यम है। यदि किसी गरीब किसान का बेटा, मजदूर की बेटी या छोटे कस्बे का प्रतिभाशाली छात्र यह महसूस करने लगे कि उसकी मेहनत से अधिक कीमत पैसे और पहुंच की है, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था का संकट नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था के नैतिक आधार पर भी प्रश्नचिन्ह है।
सरकार ने देर से ही सही, एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि विश्वास टूटने में एक क्षण लगता है और उसे वापस पाने में वर्षों लग जाते हैं। अब युवाओं को भाषण नहीं, निष्पक्ष परीक्षाएं चाहिए;

आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए, समितियां नहीं, जवाबदेही चाहिए,
इसीलिए आज फिर दुष्यंत कुमार का वही शेर मन में गूंजता है—
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए।

देश के युवा व्यवस्था के विरोधी नहीं हैं। वे केवल इतना चाहते हैं कि उनकी मेहनत पर किसी माफिया, किसी भ्रष्ट अधिकारी या किसी लापरवाही की छाया न पड़े। सरकार यदि वास्तव में उनका विश्वास वापस जीतना चाहती है तो उसे यह साबित करना होगा कि यह टास्क फोर्स केवल संकट टालने का उपाय नहीं, बल्कि परीक्षा व्यवस्था में स्थायी और ईमानदार सुधार की शुरुआत है। अन्यथा इतिहास फिर वही सवाल पूछेगा-सब कुछ लुटाकर होश में आए तो क्या?

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