राजकुमार मल
भाटापारा- प्रति किलो कीमत में 20 से 50 रुपए का इजाफा। फिर भी खूब डिमांड में हैं प्लास्टिक की ब्लैक एवं ट्रांसपेरेंट पन्नियां क्योंकि बारिश से बचाव के लिए उपाय जरूरी है।
प्लास्टिक के दाने में कमजोर आयात का असर अब प्लास्टिक की पन्नियों पर भी देखा जाने लगा है। किलो पीछे 20 से 50 रुपए की तेजी, आगे और बनी रहने की आशंका इसलिए व्यक्त की जा रही है क्योंकि मांग के अनुरूप प्लास्टिक के दानों की आपूर्ति ऐसी इकाइयों को नहीं हो पा रही है, जो बारिश से बचाव के लिए तिरपाल बनातीं हैं।
तेज, फिर भी खूब
120 से 150 रुपए किलो पर मिलने वाली पारदर्शी पन्नी में नई कीमत 150 से 200 रुपए किलो बोली जा रही है। इसी तरह काली पन्नी 50 से 120 रुपए किलो की जगह 70 से 150 रुपए किलो पर जा पहुंची है। किलो पीछे 20 से 30 रुपए की बढ़ोतरी के बावजूद मांग इसलिए जोरदार है क्योंकि कच्चे- पक्के घरों की दीवारों और छतों को बारिश के पानी से बचाना जरूरी है। इसके अलावा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण कार्य भी खूब हो रहे हैं।
यह पहले ही तेज
रेत, ईंट, गिट्टी, मिट्टी, भूसा, सीमेंट और ऐसी सामग्रियां, जो परिवहन के दौरान सेहत और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकतीं हैं, को ढंक कर ले जाने की नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की अनिवार्यता के बाद तिरपाल की मांग में रिकॉर्ड 30 से 40 फ़ीसदी वृद्धि हुई है।फलत: तिरपाल बनाने वाली ईकाइयां अभी भी प्लास्टिक के दाने के लिए आयात पर निर्भर हैं लेकिन चौतरफा मांग की वजह से इन इकाइयों को भी शॉर्टेज जैसी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए तिरपाल की कीमतों में भी रिकॉर्ड तेजी आ चुकी है।
धारणा, और तेजी की
तिरपाल, प्लास्टिक पन्नियों के साथ प्लास्टिक पैकेजिंग प्रोडक्ट कंपनियों का जैसा दबाव प्लास्टिक के दानें पर देखा जा रहा है, उसे देखते हुए आने वाले दिनों में कीमत में और भी वृद्धि की धारणा बनी हुई है क्योंकि खाड़ी युद्ध की वजह से प्लास्टिक के दाने का आयात अभी भी बंद है। ऐसे में रिसाइकल प्लास्टिक पर भी दबाव महसूस किया जा रहा है। बताते चलें कि इसकी भी उपलब्धता मांग के अनुरूप नहीं है।