मात्र 45 दिन में तैयार यह फसल!

बढ़ाता है नाईट्रोजन, घटाता है रासायनिक उर्वरक की जरूरत

राजकुमार मल

भाटापारा- नाम है सनई और ढेंचा। काम है खेतीहर भूमि में पोषक तत्व बढ़ाना। एक बार फिर से दोनों को इसलिए याद किया जा रहा है क्योंकि रासायनिक उर्वरक, मिट्टी के जैविक तत्व तेजी से खत्म कर रहे हैं।

खरीफ फसल की तैयारी कर रहे किसानों के लिए जरूरी खबर। मई- जून की अवधि में ऐसी सहायक फसल की खेती की जा सकती है, जो अगली फसल के लिए रासायनिक उर्वरकों की जरूरत खत्म करने का दम रखती है। बड़ी बात यह कि यह दोनों प्रजातियां मानसून के पहले दौर में होने वाली भारी बारिश को सह सकती है।


बढ़ाता है पोषक तत्व

ढेंचा। सभी प्रकार की जलवायु और मिट्टी में समान रूप से बढ़वार लेता है। अंकुरण के बाद सूखा सहन करने की गजब की क्षमता होती है‌। सिर्फ 45 दिन की परिपक्वता अवधि वाले ढेंचा की जड़ों में राईजोबियम नामक जीवाणु होता है। यही जीवाणु, परिपक्वता अवधि के दौरान मिट्टी में नाईट्रोजन की मात्रा बढ़ाते रहता है। यह मात्रा 85 से 100 किलो तक पाई गई है।


बलुई मिट्टी में जोरदार परिणाम

सनई। अंकुरण के पश्चात यह प्रजाति सूखा के अलावा जल-जमाव जैसी स्थिति में भी बेहतर परिणाम देती है। तेज बढ़वार और घनी जड़ वाली यह प्रजाति भी खेतीहर भूमि की मिट्टी में भरपूर नाईट्रोजन पहुंचाती है। बोनी के 40 से 50 दिन के बाद कल्टीवेशन किया जाकर पलटा जाता है। यह प्रक्रिया खरपतवार को दबाती है और 20 से 30 टन हरी खाद देती है।


जहां जरूरत, वहीं बोनी

सनई और ढेंचा जैसी हरी खाद वाली फसल की बोनी उसी खेत में करना होगा जहां की मिट्टी में पोषक तत्व और नाईट्रोजन की मात्रा कम हो रही है। फसल तैयार होने की अवधि में जब तना नर्म हो तब कल्टीवेशन के माध्यम से पौधों को पलटना होगा। नमी और 5 से 6 सेंटीमीटर पानी भरा होने की स्थिति में किया गया यह काम, बेहतर परिणाम देता है क्योंकि अपघटन में कम समय लगता है।

श्रेष्ठ हरी खाद

सनई और ढेंचा को इसलिए श्रेष्ठ हरी खाद माना गया है क्योंकि यह दोनों जरूरी पोषक और जैविक तत्व, फसल तक पहुंचाते हैं। इससे फसल को प्राकृतिक बढ़वार मिलती है और उत्पादन भी बढ़ता है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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