अंधविश्वास, सत्ता और संगठित शोषण का त्रिकोण—जब विश्वास बन जाता है हथियार

-सुभाष मिश्र

भारत में आस्था केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना का आधार रही है। लेकिन जब यही आस्था विवेक से कटकर अंधविश्वास में बदल जाती है, तो वह शोषण और अपराध का सबसे आसान माध्यम बन जाती है। आज ‘बाबा, ‘तांत्रिक, ‘पीर और ‘फेथ हीलर के नाम पर एक ऐसा समानांतर तंत्र विकसित हो चुका है, जो लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाकर न केवल आर्थिक, बल्कि शारीरिक और मानसिक शोषण तक पहुंच रहा है।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में संतों और आध्यात्मिक मार्गदर्शकों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इसी परंपरा के समानांतर एक खतरनाक ‘बाबा संस्कृतिÓ उभरती दिख रही है, जिसमें आध्यात्मिकता के नाम पर संगठित अपराध फल-फूल रहा है। यह प्रवृत्ति अब छिटपुट घटनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक पैटर्न के रूप में सामने आ रही है, जहां आस्था को साधन बनाकर अपराध का तंत्र खड़ा किया जा रहा है।
हाल के घटनाक्रम इस संकट की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। महाराष्ट्र में बाबा अशोक खरात से जुड़े शोषण और ठगी के मामले सामने आए, तो उत्तर प्रदेश में बाबा नारायण साकार हरि के आयोजन के दौरान हुई भगदड़ ने यह दिखा दिया कि अंधभक्ति किस तरह जानलेवा बन सकती है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उस मानसिकता का परिणाम है जिसमें सवाल पूछने की जगह आंख मूंदकर विश्वास किया जाता है। बिहार में राजनीतिक गलियारों तक तांत्रिक अनुष्ठानों की खबरें यह संकेत देती हैं कि यह समस्या केवल समाज के निचले तबकों तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता के केंद्रों में भी अपनी जड़ें जमा चुकी है।
इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए नरेंद्र दाभोलकर की हत्या का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2013 में पुणे में हुई यह घटना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि वैज्ञानिक सोच और तार्किकता पर सीधा हमला थी। महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति के माध्यम से दाभोलकर ने वर्षों तक अंधविश्वास के खिलाफ अभियान चलाया। उनका स्पष्ट मानना था कि धर्म और आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन उसके नाम पर होने वाले शोषण को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अगर हम देश के चर्चित मामलों पर नजर डालें, तो कई ऐसे नाम सामने आते हैं जिन्होंने ‘आध्यात्मिक गुरुÓ की आड़ में अपराध का नेटवर्क खड़ा किया। गुरमीत राम रहीम सिंह, आशाराम बापू, नारायण साईं, नित्यानंद और बाबा रामपाल जैसे मामलों ने यह उजागर किया है कि किस तरह आश्रमों के भीतर एक समानांतर सत्ता संरचना विकसित हो जाती है, जहां कानून और व्यवस्था का प्रवेश तक कठिन हो जाता है। इन मामलों में कार्रवाई के बाद कई बार हिंसा और अराजकता भी देखने को मिली, जो इस समस्या के सामाजिक और राजनीतिक आयाम को और गहरा करती है।
यह समझना भी जरूरी है कि यह संकट किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। केरल में फ्रेंको मुलक्कल पर लगे आरोप हों या पादरी रॉबिन वडाककुमचेरी का मामला, धार्मिक संस्थाओं के भीतर शोषण के उदाहरण हर समुदाय में मौजूद हैं। इसी तरह ‘फेथ हीलिंगÓ या झाड़-फूंक के नाम पर अलग-अलग राज्यों में लगातार मामले सामने आते रहे हैं। मुस्लिम समाज में भी ‘पीरÓ और ‘मौलवीÓ के नाम पर महिलाओं और बच्चों के शोषण की घटनाएं सामने आती हैं, और मौलाना कलीम सिद्दकी से जुड़े विवाद इस बात का संकेत देते हैं कि धार्मिक प्रभाव का दुरुपयोग किस तरह विभिन्न रूपों में सामने आ सकता है।
इन सभी उदाहरणों को जोड़कर देखें तो एक समान पैटर्न स्पष्ट दिखाई देता है। सबसे पहले व्यक्ति की व्यक्तिगत समस्या—बीमारी, आर्थिक संकट, पारिवारिक तनाव या मानसिक अस्थिरता को पहचानकर उसे ‘चमत्कार और ‘ईश्वरीय शक्ति का भरोसा दिया जाता है। धीरे-धीरे यह भरोसा निर्भरता में बदल जाता है, और अंतत: उसी निर्भरता का उपयोग शोषण, ब्लैकमेलिंग या आर्थिक दोहन के लिए किया जाता है। यह एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें पीडि़त व्यक्ति को इस तरह फंसा लिया जाता है कि वह विरोध करने की स्थिति में ही नहीं रह जाता।
इस समस्या की जड़ें समाज की बुनियादी कमजोरियों में छिपी हैं। शिक्षा की कमी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव और धार्मिक मामलों में सवाल न उठाने की प्रवृत्ति इसे लगातार पोषित करती है। जब समाज का एक बड़ा वर्ग तर्क के बजाय चमत्कार पर भरोसा करने लगता है, तो ऐसे तथाकथित ‘गुरुओंÓ के लिए जमीन तैयार हो जाती है। यही कारण है कि बार-बार खुलासे और सजा के बावजूद यह प्रवृत्ति समाप्त नहीं होती, बल्कि नए चेहरों और नए रूपों में फिर सामने आ जाती है।
ऐसे में यह सवाल केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी है। क्या हम आस्था और अंधविश्वास के बीच फर्क कर पा रहे हैं? क्या हम किसी भी ‘चमत्कारÓ के दावे पर सवाल उठाने का साहस रखते हैं? या फिर हम अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान के लालच में खुद को किसी भी व्यक्ति के हाथों सौंप देते हैं?
समाधान स्पष्ट है, लेकिन उसके लिए सामूहिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि कोई भी व्यक्ति भगवान नहीं हो सकता। धार्मिक आस्था के साथ विवेक और वैज्ञानिक सोच को जोडऩा होगा। किसी भी संस्था या गुरु के प्रति अंधभक्ति के बजाय पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करनी होगी। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए शोषण के हर मामले में त्वरित और कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
साथ ही, शिक्षा व्यवस्था में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच को बढ़ावा देना होगा। सामाजिक और धार्मिक नेताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे आस्था को विवेक से जोडऩे का संदेश दें, न कि अंधविश्वास को बढ़ावा दें। मीडिया की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है उसे केवल सनसनी फैलाने के बजाय इस मुद्दे पर लगातार जागरूकता पैदा करनी होगी।
भारत को अपनी संत परंपरा पर गर्व है, लेकिन उसी परंपरा की आड़ में पनप रहे इस ‘बाबा उद्योगÓ को पहचानना और चुनौती देना आज की सबसे बड़ी सामाजिक जरूरत बन गई है। आस्था तब तक शक्ति है, जब तक वह विवेक और मानवीय मूल्यों से जुड़ी है। जैसे ही वह अंधविश्वास में बदलती है, वही समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है।

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