कारगिल की बफऱ् आज भी पिघलती है, लेकिन शहीदों का लहू नहीं

-सुभाष मिश्र

कारगिल की पहाडिय़ों पर खड़े होकर एक बात बार-बार मन में आती है। इस देश में बहुत कुछ बदल जाता है। सरकारें बदलती हैं, नीतियाँ बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं लेकिन कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। उनमें सबसे बड़ा नाम है— भारत के सैनिक का बलिदान। कारगिल युद्ध को 27 साल हो गए। एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई। जिन बच्चों का जन्म उस समय भी नहीं हुआ था, वे आज देश चला रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, वोट डाल रहे हैं। लेकिन द्रास की उन पहाडिय़ों पर आज भी 1999 की गोलियों की गूँज महसूस होती है। आज भी हवा जैसे कहती है कि इस मिट्टी में केवल बफऱ् नहीं, शहीदों का खून भी मिला हुआ है।
आज मुझे कारगिल वॉर मेमोरियल जाने का अवसर मिला। वहां जाकर समझ में आता है कि इतिहास किताबों से नहीं, बलिदानों से लिखा जाता है। वहां कोई नेता बड़ा नहीं लगता। कोई अधिकारी बड़ा नहीं लगता। कोई उद्योगपति बड़ा नहीं लगता। सबसे बड़ा दिखता है वह जवान, जिसने अपनी उम्र से पहले अपनी जान देश को दे दी। वहाँ लगे हर नाम के पीछे एक परिवार है। एक मां है, जो आज भी बेटे का इंतज़ार करती होगी। एक पिता है, जिसकी आँखों में गर्व भी है और दर्द भी। एक पत्नी है, जिसने सिंदूर खोकर देश का माथा ऊँचा किया। और ऐसे सैकड़ों परिवार हैं, जिनकी वजह से आज हमारा तिरंगा उसी शान से लहरा रहा है।
कारगिल का युद्ध केवल सीमा का युद्ध नहीं था। वह विश्वास और विश्वासघात का युद्ध था। पाकिस्तान ने दोस्ती का हाथ दिखाया और पीठ पीछे पहाड़ों पर कब्ज़ा करने की साजि़श रच दी। ऊंची चोटियों पर बैठा दुश्मन यह मान बैठा था कि भारत उसे वहां से हटा नहीं पाएगा। लेकिन शायद उसने भारतीय सैनिक को समझने में सबसे बड़ी भूल कर दी। हमारे जवान नीचे से ऊपर चढ़े। बफऱ् पर चढ़े। गोलियों के बीच चढ़े। मौत को सामने देखकर भी चढ़े और आखिरकार तिरंगा वहीं फहराया, जहां दुश्मन ने अपने झंडे गाडऩे का सपना देखा था।
540 से अधिक जवान शहीद हुए। सैकड़ों घायल हुए। लेकिन भारत हार नहीं मानता। कारगिल ने पूरी दुनिया को बता दिया कि भारतीय सेना केवल हथियारों से नहीं लड़ती, वह हौसले से लड़ती है। वह तन से पहले मन से जीतती है। यही कारण है कि कारगिल केवल युद्ध नहीं, भारतीय सैनिक की पहचान बन गया। इन 27 वर्षों में कारगिल भी बदला है। सड़कें बनी हैं। सुरंगें बन रही हैं। संचार बेहतर हुआ है। पर्यटन बढ़ा है। कारगिल वॉर मेमोरियल आज देशभक्ति का सबसे बड़ा तीर्थ बन चुका है। वीर भूमि में जब शहीदों के नाम पढ़ते हैं तो लगता है कि वे कहीं गए ही नहीं। वे आज भी वहीं खड़े हैं। बस वर्दी दिखाई नहीं देती। उनकी आत्मा आज भी सीमा की रक्षा कर रही है। सरकार ने यहां आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया है। यह स्वागत योग्य है। क्योंकि सीमाएँ केवल सैनिकों से नहीं, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर से भी सुरक्षित होती हैं।
आज रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी कारगिल में रहेंगे। शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे। पूरा देश उन्हें याद करेगा लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या हम अपने सैनिकों को केवल विजय दिवस पर ही याद करेंगे? क्या उनकी याद केवल एक दिन की औपचारिकता बनकर रह जाएगी? क्या देशभक्ति केवल सोशल मीडिया की पोस्ट और तिरंगे वाली डीपी तक सीमित रह जाएगी?
कारगिल के बाद भी पाकिस्तान नहीं बदला। कभी उरी, कभी पुलवामा, कभी पहलगाम। कभी आतंकवादी, कभी घुसपैठिए। चेहरे बदलते रहे, मंशा नहीं बदली। भारत ने भी अपना जवाब बदल दिया। अब देश चुप नहीं रहता। सर्जिकल स्ट्राइक होती है। एयर स्ट्राइक होती है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियान होते हैं। दुनिया को साफ संदेश दिया जाता है कि भारत शांति चाहता है, लेकिन शांति का अर्थ कमजोरी नहीं होता।
भारत युद्ध का समर्थक कभी नहीं रहा। हमारी संस्कृति युद्ध नहीं, बुद्ध की संस्कृति है। गांधी की संस्कृति है। लेकिन जब कोई हमारी सीमा की ओर आंख उठाकर देखता है तो वही भारत दुर्गा भी बनता है। आज दुनिया में युद्ध का माहौल है। रूस और यूक्रेन का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ। पश्चिम एशिया लगातार तनाव में है। ईरान और अमेरिका की तनातनी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है। तेल महँगा होता है। गैस संकट पैदा होता है। महँगाई बढ़ती है। इसलिए युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं होता। लेकिन यदि युद्ध हम पर थोपा जाए तो उसका जवाब देना भी राष्ट्रधर्म है। और यह राष्ट्रधर्म निभा रहे हैं हमारे सैनिक।
कारगिल में खड़े होकर सबसे बड़ा सवाल मन में यही उठा कि क्या हम अपने सैनिकों के प्रति उतने संवेदनशील हैं, जितने होना चाहिए? जब कोई जवान छुट्टी लेकर घर आता है, तब क्या उसे वह सम्मान मिलता है जिसका वह अधिकारी है? क्या रेलवे स्टेशन पर, सरकारी दफ्तर में, अस्पताल में, समाज में उसे प्राथमिकता मिलती है? कई बार जवाब नहीं में मिलता है। हम मंचों से सैनिकों की जय बोलते हैं, लेकिन व्यवहार में भूल जाते हैं कि हमारी सुरक्षित नींद के पीछे किसी सैनिक की जागती हुई रात होती है।
देश को केवल अच्छे हथियारों की नहीं, अच्छे नागरिकों की भी जरूरत है। बच्चों को कारगिल पढ़ाइए। उन्हें बताइए कि आज़ादी मुफ्त नहीं मिली। सीमा पर खड़े जवान की कहानी सुनाइए। उन्हें यह भी बताइए कि सेना नौकरी नहीं, तपस्या है। वर्दी केवल कपड़ा नहीं, जिम्मेदारी है। और तिरंगा केवल झंडा नहीं, करोड़ों भारतीयों का आत्मसम्मान है।
कारगिल की यात्रा से लौटते समय मैं केवल तस्वीरें लेकर नहीं लौट रहा हूँ। मैं एक सवाल लेकर लौट रहा हूँ। क्या हम उन शहीदों के सपनों के भारत का निर्माण कर रहे हैं? यदि नहीं, तो अभी भी समय है। सैनिकों का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। उनके परिवारों के साथ खड़े होने में दिखाई देना चाहिए। उनके त्याग को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में दिखाई देना चाहिए।
कारगिल की बफऱ् हर साल पिघलती है। मौसम बदल जाता है। लेकिन शहीदों का लहू कभी नहीं पिघलता। वह हर भारतीय की रगों में देशभक्ति बनकर दौड़ता रहता है। जब तक हिमालय खड़ा है, जब तक तिरंगा लहरा रहा है, तब तक कारगिल केवल इतिहास नहीं रहेगा। वह हर भारतीय की आत्मा का एक हिस्सा रहेगा। और शायद हर बार यही कहेगा—देश सबसे पहले था, है और हमेशा रहेगा।

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