जनसंख्या की राजनीति : क्या भारत एक नए उत्तर-दक्षिण संघर्ष की ओर बढ़ रहा है?

– सुभाष मिश्र

भारत ने दशकों तक अपने नागरिकों को एक ही बात समझाई-हम दो, हमारे दो। छोटे परिवार को आदर्श बताया गया, नसबंदी अभियान चलाए गए, जनसंख्या नियंत्रण को विकास की शर्त माना गया, लेकिन अब देश के कुछ हिस्सों से बिल्कुल उलटी आवाज उठ रही है। ज्यादा बच्चे पैदा करने की बात हो रही है। सवाल केवल जनसंख्या का नहीं, बल्कि सत्ता, संसद और भविष्य की राजनीति का है।-
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू का तीसरे और चौथे बच्चे पर प्रोत्साहन देने वाला बयान यूं ही नहीं आया। वह भारतीय राजनीति के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं और बिना दूरगामी राजनीतिक गणित के कोई बात नहीं कहते। उनके बयान के पीछे जो चिंता है, वह आने वाले वर्षों में भारत की सबसे बड़ी संघीय बहस बन सकती है-परिसीमन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की लड़ाई।
भारत में लोकसभा सीटों का बंटवारा आबादी के आधार पर होता है। 2026 के बाद परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। इसका सीधा मतलब यह है कि जिन राज्यों की आबादी ज्यादा होगी, संसद में उनकी सीटें भी ज्यादा हो सकती है। यहीं से दक्षिण भारत की बेचैनी शुरू होती है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य सुधार के जरिए जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। वहां प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच चुकी है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आबादी लगातार तेजी से बढ़ी है।

ऐसे में दक्षिण भारत का सवाल सीधा है-क्या हमने जनसंख्या नियंत्रण करके गलती की? उनका तर्क है कि केंद्र सरकार ने दशकों तक परिवार नियोजन को राष्ट्रीय नीति बनाया। दक्षिणी राज्यों ने उस नीति को गंभीरता से लागू किया। अब यदि भविष्य में सीटें केवल आबादी के आधार पर बढ़ेंगी, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों को राजनीतिक लाभ मिलेगा और जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रित की, उनका प्रभाव घट जाएगा। यानी जिन्होंने सरकारी नीति का पालन किया, वही राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। यहीं से यह बहस खतरनाक मोड़ लेती दिखाई देती है।

भारत की राजनीति पहले ही भाषा, क्षेत्र और पहचान की रेखाओं में बंटी हुई है। उत्तर-दक्षिण का सांस्कृतिक अंतर कोई नई बात नहीं। लेकिन अब जनसंख्या और संसद की सीटों को लेकर यह भावना गहराती है कि उत्तर भारत हमारी राजनीतिक ताकत छीन रहा है या दक्षिण भारत खुद को अलग समझता है तो यह संघीय ढांचे के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। यही वजह है कि चंद्रबाबू नायडू का बयान केवल एक जनसंख्या नीति नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीतिक चेतावनी जैसा दिखता है।

यह चिंता पूरी तरह निराधार भी नहीं है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन चुका है। दुनिया की केवल 2.4 प्रतिशत जमीन पर दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी रहती है। शहरों में ट्रैफिक दम तोड़ रहा है, पानी का संकट बढ़ रहा है, रोजगार सीमित हैं, अस्पतालों पर दबाव है और खेती की जमीन लगातार घट रही है। ऐसे देश में यदि राजनीतिक कारणों से ज्यादा बच्चों को प्रोत्साहन देने की होड़ शुरू हो गई, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। हालांकि, दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग यह भी कहता है कि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में भविष्य में वृद्ध आबादी का संकट खड़ा हो सकता है। जन्मदर लगातार गिरने से काम करने वाली युवा आबादी कम होगी और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। जापान और यूरोप के कई देशों में यह समस्या पहले से दिखाई दे रही है, लेकिन भारत अभी उस स्थिति में नहीं पहुंचा जहां जनसंख्या बढ़ाने को राष्ट्रीय आवश्यकता कहा जाए। यहां अभी भी सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और रोजगार सृजन है।

असल समस्या यह है कि भारत ने जनसंख्या नीति को केवल सामाजिक मुद्दा समझा, जबकि अब यह सीधे राजनीतिक शक्ति से जुड़ गई है। परिसीमन के बाद यदि उत्तर भारत की सीटें बहुत तेजी से बढ़ती हैं और दक्षिण का प्रभाव घटता है, तो क्षेत्रीय असंतोष बढ़ सकता है। यही वह बिंदु है जहां भविष्य में साउथ इंडिया बनाम नॉर्थ इंडिया की राजनीति खतरनाक रूप ले सकती है। भारत की एकता केवल संविधान से नहीं, बल्कि संतुलित प्रतिनिधित्व की भावना से भी चलती है, इसलिए समाधान केवल ज्यादा बच्चे या कम बच्चे नहीं है। समाधान संतुलित परिसीमन मॉडल में है।

संसद में प्रतिनिधित्व तय करते समय केवल आबादी ही नहीं, बल्कि जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे मानकों को भी महत्व देना होगा। दक्षिण भारत को यह भरोसा देना जरूरी है कि जनसंख्या नियंत्रण की सफलता उसकी राजनीतिक सजा नहीं बनेगी। साथ ही उत्तर भारत के बड़े राज्यों के नागरिकों को भी बराबर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यही संघवाद की असली परीक्षा होगी। भारत को इस बहस में बेहद सावधानी से आगे बढऩा होगा। क्योंकि अगर आने वाले समय में राजनीतिक दल जनसंख्या को वोट और सीटों के गणित से जोड़कर देखने लगे, तो देश एक नई प्रतिस्पर्धा में फंस सकता है -ज्यादा बच्चे पैदा करो, ज्यादा राजनीतिक ताकत पाओ। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत होगा।

भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां जनसंख्या केवल आंकड़ा नहीं रही। वह सत्ता का गणित बन चुकी है और जब जनसंख्या राजनीति का हथियार बनने लगे, तब यह केवल परिवार का नहीं, पूरे राष्ट्र के भविष्य का सवाल बन जाता है।

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