चुनाव का खेला और विचारधारा की गिरती कीमत

-सुभाष मिश्र

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव को लोकतांत्रिक उत्सव कहा जाता है। लेकिन समय के साथ यह उत्सव कई बार एक ऐसे राजनीतिक खेल में बदलता दिखाई देता है, जिसमें सिद्धांतों और विचारधाराओं से अधिक महत्व तत्काल राजनीतिक लाभ और सत्ता के समीकरणों को मिलने लगता है। इन दिनों राज्यसभा चुनावों के दौरान बिहार, ओडिशा और हरियाणा से जिस प्रकार की खबरें सामने आ रही हैं, विधायकों के गायब होने की चर्चा, क्रॉस वोटिंग की आशंकाएं, खरीद-फरोख्त के आरोप—वे भारतीय राजनीति के इसी बदलते चरित्र की ओर संकेत करती हैं।
राज्यसभा के चुनाव सामान्यत: प्रत्यक्ष जनता के मतदान से नहीं बल्कि विधायकों के मत से होते हैं, इसलिए यहां दलगत अनुशासन और पार्टी निष्ठा की परीक्षा होती है। लेकिन व्यवहार में अक्सर यह देखा गया है कि मतदान के समय कई विधायक या तो अचानक अनुपस्थित हो जाते हैं या पार्टी लाइन से अलग जाकर मतदान करते हैं। यही कारण है कि लगभग हर चुनाव में क्रॉस वोटिंग, हॉर्स ट्रेडिंग और विधायकों की ‘सुरक्षा’ के लिए उन्हें दूसरे राज्यों के होटलों में रखने जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। हरियाणा में कांग्रेस द्वारा अपने विधायकों को हिमाचल प्रदेश भेजने की खबर हो या बिहार में कुछ विधायकों के संपर्क से बाहर होने की चर्चा—ये घटनाएं लोकतांत्रिक राजनीति की एक असहज सच्चाई को उजागर करती हैं।
असल समस्या यह है कि भारतीय राजनीति में विचारधारा और संगठनात्मक प्रतिबद्धता का महत्व धीरे-धीरे कम होता गया है। राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक सीमाएं धुंधली हो चुकी हैं। आज जिस नेता को किसी एक पार्टी का कट्टर विरोधी माना जाता है, वही नेता कुछ समय बाद दूसरी पार्टी का प्रमुख चेहरा बन जाता है। यही कारण है कि चुनावों के दौरान टिकट न मिलने पर नेताओं का दल बदलना या दूसरे दलों में शामिल हो जाना एक सामान्य घटना बन गई है।
दल-बदल को रोकने के लिए 1985 में लागू किया गया दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) भी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सका। समय के साथ नेताओं और दलों ने इस कानून की सीमाओं को समझ लिया और उससे बचने के कई रास्ते भी निकाल लिए। कई बार पूरा समूह दल बदल लेता है, कई बार विधायक इस्तीफा देकर फिर दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ते हैं, और कई बार मतदान के दौरान अनुपस्थित रहकर या क्रॉस वोटिंग करके राजनीतिक समीकरण बदल दिए जाते हैं।
बीते वर्षों में हमने कई राज्यों में ऐसी घटनाएं देखी हैं। मध्यप्रदेश में पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गिरना, राजस्थान और हरियाणा में राजनीतिक अस्थिरता के दौर, या दिल्ली की राजनीति में विधायकों के दल बदल की चर्चाएं—ये सब उसी प्रवृत्ति के उदाहरण हैं जिसमें सत्ता की गणित विचारधारा से बड़ी हो जाती है।
अब जब पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, तो यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक ‘खेला और भी तेज होगा। जहां बहुमत स्पष्ट नहीं होगा, वहां विधायकों की कीमत अचानक बढ़ जाती है और राजनीतिक सौदेबाजी का दौर शुरू हो जाता है। इसे ही आम भाषा में ‘हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाता है।
पश्चिम बंगाल में यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बचाने का संघर्ष नहीं होगा, बल्कि वहां राजनीतिक ध्रुवीकरण का भी बड़ा परीक्षण होगा। जातीय, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक समीकरणों के साथ-साथ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति भी अपने चरम पर होगी। टिकट वितरण से नाराज नेता दल बदलेंगे, कुछ निर्दलीय मैदान में उतरेंगे और कुछ चुनाव के बाद नई राजनीतिक स्थितियां पैदा करेंगे।
यह स्थिति केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं है। चाहे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय दल—लगभग सभी के भीतर ऐसी प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं। यही कारण है कि कई बार वे दल भी, जो खुद को विचारधारा आधारित बताते हैं, दूसरे दलों से आए नेताओं को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि राजनीति में सिद्धांतों की तुलना में चुनावी गणित अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह स्थिति चिंताजनक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों का अस्तित्व केवल सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि एक विचार, एक नीति और एक दिशा देने के लिए होता है। यदि दलों के भीतर विचारधारा की प्रतिबद्धता कमजोर होगी तो राजनीति केवल अवसरवाद का मंच बनकर रह जाएगी। इसलिए आवश्यकता केवल कानूनों को और कठोर बनाने की नहीं है, बल्कि राजनीतिक संस्कृति को भी मजबूत करने की है। जब तक राजनीतिक दल अपने भीतर वैचारिक प्रतिबद्धता, संगठनात्मक अनुशासन और पारदर्शिता को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक चुनावी राजनीति में यह ‘खेला चलता रहेगा।
भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि चुनाव केवल सत्ता के लिए संघर्ष न बनें, बल्कि नीति और सिद्धांतों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो चुनावी प्रक्रिया भले ही नियमित रूप से चलती रहे, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा लगातार कमजोर होती जाएगी।

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