-सुभाष मिश्र
“ सामयिक संदर्भ “ पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी
मातादीन कहीं भी हो सकते हैं । यह एक सिस्टम है जिसमें निर्दोष लोगों को , खिलाफत करने वालों को सबक सीखने की गरज से पुलिसिया प्रकरण बनाये जाते हैं । आजकल मातादीन खैरागढ़ संगीत कला विश्वविद्यालय के परिसर के आसपास देखे गये हैं ।
बक़ौल हरिशंकर परसाई “ मातादीन चाँद पर “
“विज्ञान ने हमेशा इंस्पेक्टर मातादीन से मात खाई है। फ़िंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है—छुरे पर पाए गए निशान मुलजिम की अँगुलियों के नहीं हैं। पर मातादीन उसे सज़ा दिला ही देते हैं।
मातादीन कहते हैं ये वैज्ञानिक केस का पूरा इंवेस्टिगेशन नहीं करते। उन्होंने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया, वहाँ जीवन नहीं है। मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देखकर आया हूँ। वहाँ मनुष्य जाति है।
यह बात सही है क्योंकि अँधेरे पक्ष के मातादीन माहिर माने जाते हैं।”
यह हरिशंकर परसाई की कालजयी रचना हैं मातादीन चाँद पर का एक अंश है ।अपनी व्यंग्य स्थितियों और नाटकीयता की वजह से नाटक करने वालों के लिए यह रचना हमेशा पसंदीदा रही है । कुछ कहानियाँ , निबंध इतने वुनावट में बढ़िया होते हैं की वो किसी मूल नाट्य रचना भी ज़्यादा मंचित होकर रंगकर्मियों और दर्शकों की सदाबहार फ़ेवरेट हो जाती हैं , शायद इसकी वजह वे स्थितियाँ होती होगी जो साठ – सत्तर साल भी वैसी की वैसी हैं जैसी हरिशंकर परसाई के समय थी ।
इप्टा मध्यप्रदेश के अध्यक्ष , विवेचना जबलपुर के वरिष्ठ रंगकर्मि हिमांशु राय के पिताजी कामरेड शंभु नारायण राय की पुलिस द्वारा बनाए गये प्रकरण और अदालती कार्यवाही पर परसाई जी ने दो व्यंग्य रचना लिखी एक थी मातादीन चाँद पर और एक काना येचक ताना ।
हिमांशु राय ने अनेक अवसरों पर इसका ज़िक्र किया और बताया की “
ऐसे लिखा गया ’इन्सपेक्टर मातादीन चांद पर’
हिमाँशु राय ( लेख का संक्षेप अंश )
आज 21 मई है। आज से 51 साल पहले 21 मई 1968 को आमनपुर मदनमहल जबलपुर स्थित हमारे घर के सामने दोपहर को बलवा हो गया था। कोर्ट का आर्डर लेकर जमीन मालिक पुलिस और सरकारी अमला लेकर झुग्गी झोपड़ी वालों से जमीन खाली कराने आया था। सबकुछ अचानक घटा। पुलिस का एक सिपाही घायल हो गया। वो रास्ते में पड़ा था। मेरे पिता का शेषनारायण राय उस समय घर पर थे। परिवार के हम सब लोग ननिहाल गये हुए थे। वो बाहर निकले। देखा पुलिस वाला घायल पड़ा है। पड़ोस के लोगों से उसे पानी लेकर उसे पिलाया। एक रिक्शे में रखकर उसे मेडिकल काॅलेज भिजवाया। धीरे धीरे कर पुलिस वाले और बाकी लोग घटना स्थल पर वापस लौटे। शाम को पिताजी को पुलिस ने आग्रह किया किया कि थाने में चलकर बयान दे दीजिए। पिताजी बयान देने गये। वहां बयान नहीं लिया गया। और न घर जाने दिया गया। उन्हें थाने में बैठा लिया गया। दूसरे दिन वो सिपाही मर गया। इसी दौरान पुलिस ने पूरी योजना का निर्माण कर लिया। का शेषनारायण राय उस पुलिस वाले की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लिए गए।
कम्युनिष्ट पार्टी के एक और बहुत सक्रिय कार्यकर्ता का शंकर सिंह धीमान जो घटना स्थल से दूर एक सहकारी संस्था में नौकरी करते थे वे भी गिरफ्तार कर लिए गए। सोशलिस्ट पार्टी के नेता डा के एल दुबे भी गिरफ्तार कर लिए गए। बस्ती में रहने वाले 30 लोग गिरफ्तार कर लिए्र गए। इसे आमनपुर कांड का नाम दिया गया।
परसाई जी की विख्यात कहानी ’इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ आमनपुर कांड पर है। उस कहानी में चांद की फैंटेसी को छोड़कर एक एक वाक्य सही है और घटा है। उस कहानी का भला आदमी का शेषनारायण राय हैं। आमनपुर कांड पर परसाई जी ने दो रचनाएं लिखीं। एक ’इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ जो पूरी तरह पुलिस की कारगुजारियों पर है और दूसरी ’एक काना ऐचक ताना जो पूरी तरह अदालती कार्यवाहियों पर है।
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जब दूसरे दिन 22 मई को पुलिस वाला मर गया तो पुलिस ने शंकर सिंह धीमान और डा के एल दुबे के अलावा शायद 21 लोगों पर दफा 302 के अंतर्गत हत्या का केस चलाया गया। यह केस जो 21 मई 1968 को चालू हुआ वो 20 दिसंबर 1968 को पहले पड़ाव पर पहंुचा। जब का शेषनारायण राय, का शंकर सिंह धीमान व 9 अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
इस केस का दूसरा पड़ाव 30 अप्रैल 1969 को आया जब हाईकोर्ट ने का राय व का धीमान को ससम्मान बरी किया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि सेशंस कोर्ट ने इन लोगों को सजा देकर मानवता के प्रति बहुत बड़ी गलती की है। और इस तरह 11 महीने जेल में रहने के बाद 30 अप्रैल को पिताजी घर वापस पंहुचे। शाम को जेल से रिहाई हुई। सैकड़ों लोग जेल के दरवाजे पर खडे+ थे। फूलमालाएं लिए। का शेषनारायण राय की जय जयकार हो रही थी। ये केस पूरी पार्टी और पिताजी के दोस्तों ने लड़ा था।।
हरिशंकर परसाई की पुलिस तंत्र की सच्चाई बयान करने वाली इस कालजयी रचना इंस्पेक्टर मातादीन चाँद के
जबलपुर में मंचन के दौरान पुलिस ने नाराज़ होकर रंगकर्मि सीताराम सोनी को गिरफ़्तार किया था । सीधी में रंगकर्मि नीरज कुंदेर की प्रशासनिक नाराज़गी के चलते पिछले साल हुई गिरफ़्तारी और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में कलाकारों को झूठे मामलों में फँसाने की घटनाएँ मातादीनों की याद दिलाते हैं । ये मातादीन इन दिनों छत्तीसगढ़ की कला और सांस्कृतिक नगरी खैरागढ़ के इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के आसपास देखे जा रहे हैं । किसी को फँसाने के लिए ज़रूरी है कि
“देखो, आदमी मारा गया है, तो यह पक्का है किसी ने उसे ज़रूर मारा। कोई क़ातिल है। किसी को सज़ा होनी है। सवाल है—किसको सज़ा होनी है? पुलिस के लिए यह सवाल इतना महत्त्व नहीं रखता जितना यह सवाल कि जुर्म किस पर साबित हो सकता है या किस पर साबित होना चाहिए। क़त्ल हुआ है, तो किसी मनुष्य को सज़ा होगी ही। मारनेवाले को होती है, या बेक़सूर को—यह अपने सोचने की बात नहीं है। मनुष्य-मनुष्य सब बराबर हैं। सबमें उसी परमात्मा का अंश है। हम भेदभाव नहीं करते। यह पुलिस का मानवतावाद है।
दूसरा सवाल है, किस पर जुर्म साबित होना चाहिए। इसका निर्णय इन बातों से होगा—(1) क्या वह आदमी पुलिस के रास्ते में आता है? (2) क्या उसे सज़ा दिलाने से ऊपर के लोग ख़ुश होंगे?
मातादीन को बताया गया कि वह आदमी भला है, पर पुलिस अन्याय करे तो विरोध करता है। जहाँ तक ऊपर के लोगों का सवाल है—वह वर्तमान सरकार की विरोधी राजनीति वाला है।
मातादीन ने टेबिल ठोंककर कहा—फ़र्स्ट क्लास केस। पक्का एविडेंस। और ऊपर का सपोट।”
एक कलाकार , प्रोफेसर की इतनी हिम्मत की वह पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर ले । यदि उपर का सपोर्ट हो तो फिर छेड़खानी , अश्लीलता की कहानी के मातादीन नये सिरे से भी इस तरह बनाकर पेश कर सकते जिससे सौ परसेंट सजा हो ।
मातादीनों के व्ववहार , उनकी पसंद ना पसंद पर गोदी मीडिया के लोग बार -बार हुज़ूर के दरबार में सलाम बजाते हुए कह रहे हैं –
जैसा जी चाहो बजाओ इस सभा में
हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं ।
गीत संगीत नृत्य नाटकों के संवादों की अनुगूँज वाले विश्वविद्यालय के कथित बुद्धिजीवियों के बीच सब कुछ जानकर सन्नाटा फैला हुआ है । इनके लिए भी परसाई कह गये हैं – हमारे देश का बुद्धिजीवी शेर है पर वो सियार की बारात के आगे बैंड बजाता है ।
अवतार सिंह संधु पाश की कविता है –
खतरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना, बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना, बुरा तो है
पर सबसे खतरनाक नहीं होता
कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना, बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना, बुरा तो है
मुट्ठियां भींचकर बस वक्त निकाल लेना, बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे खतरनाक होता है