-सुभाष मिश्र
मुहूर्त, बाज़ार और विस्तारित होते त्यौहार पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि यह केवल धार्मिक आस्था का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक व्यवहार, अर्थव्यवस्था और जनजीवन से जुड़ा विषय बन चुका है। भारतीय समाज में त्यौहार सदियों से एक स्वाभाविक लय में मनाए जाते रहे हैं। होलिका दहन की रात के बाद अगले दिन रंग खेलना, दीपावली की अमावस्या को लक्ष्मी पूजन, दशहरा के दिन रावण दहन—इन सबकी एक सहज परंपरा रही है। कभी-कभार पंचांगों में तिथि के अंतर के कारण मतभेद होते थे, पर वे सीमित दायरे में रहते थे। अब स्थिति बदलती दिख रही है। पिछले कुछ वर्षों में बार-बार ऐसा देखने को मिला है कि होली एक दिन जलाई जा रही है और रंग दूसरे या तीसरे दिन खेले जा रहे हैं; जन्माष्टमी दो अलग-अलग तिथियों पर मनाई जा रही है; करवा चौथ और दीपावली की तिथियों को लेकर अलग-अलग पंचांग अलग राय दे रहे हैं। यह कहा जाता है कि अमुक दिन “शुद्ध मुहूर्त” है, अमुक घड़ी “अत्यंत शुभ” है, अन्यथा दोष लग जाएगा।
तिथि-गणना की जटिलता अपनी जगह है, पर अब यह मतभेद केवल खगोल-गणना का विषय नहीं रह गया, बल्कि सार्वजनिक प्रचार का माध्यम बन चुका है। टीवी चैनलों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों और यूट्यूब ज्योतिषियों के माध्यम से “सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त” की घोषणा बड़े पैमाने पर की जाती है। यही वह बिंदु है जहाँ आस्था और बाजार का गठजोड़ दिखाई देता है। यदि किसी पर्व को दो दिन का घोषित कर दिया जाए तो स्वाभाविक है कि खरीदारी, सजावट, उपहार और आयोजनों की अवधि बढ़ेगी। अवसर जितना लंबा, उपभोग उतना अधिक—यह बाजार का सीधा सिद्धांत है।
अक्षय तृतीया इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। इसे “अक्षय फल देने वाला दिन” बताकर सोना खरीदने का महाउत्सव बना दिया गया। ज्वेलरी उद्योग के लिए यह वर्ष के सबसे बड़े बिक्री अवसरों में गिना जाने लगा। इसी तरह धनतेरस पर बर्तन से लेकर वाहन और संपत्ति तक खरीदने का चलन विज्ञापनों और ऑफरों के जरिए व्यापक किया गया। “आज खरीदेंगे तो लक्ष्मी आएंगी”—यह संदेश उपभोक्ता के मन में इस तरह बैठाया गया कि धार्मिक अनुष्ठान और उपभोग एक-दूसरे के पूरक बन गए। बैंक विशेष योजनाएँ लाते हैं, रियल एस्टेट कंपनियाँ ‘शुभारंभ’ करती हैं, और बड़े ब्रांड उसी दिन छूट की घोषणाएँ करते हैं। ज्योतिषीय सलाह अनजाने में उपभोक्ता संकेत बन जाती है।
इसका दूसरा पहलू भी है। जब त्योहारों की अवधि दो-तीन दिनों में फैलती है, तो उसका असर सरकारी कामकाज, न्यायालयों, स्कूलों और उद्योगों पर पड़ता है। दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिकों के लिए हर अतिरिक्त अवकाश आय का नुकसान है। मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह अतिरिक्त आनंद का अवसर हो सकता है, पर दिहाड़ी मजदूर के लिए यह दुविधा है—उत्सव मनाए या रोज़ी कमाए। इसी प्रकार विवाह के “शुभ मुहूर्त” कुछ विशेष महीनों में सीमित कर दिए जाते हैं, जिससे विवाह उद्योग—हॉल, कैटरिंग, गहने, वस्त्र—कुछ महीनों में चरम पर और बाकी समय ठहराव में रहता है। पर क्या केवल मुहूर्त तय कर देने से वैवाहिक जीवन सफल हो जाता है? अनुभव बताता है कि कुंडली मिलान के बाद भी विवाह असफल होते हैं। इससे स्पष्ट है कि सामाजिक और मानसिक परिपक्वता अधिक महत्वपूर्ण है, न कि केवल ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति।
यह बहस आस्था के विरोध की नहीं है, बल्कि विवेक की है। विज्ञान ने समय-गणना, खगोल और अंतरिक्ष की जटिलताओं को समझा है; उपग्रह अंतरिक्ष में घूम रहे हैं, मंगल तक मिशन पहुँच चुके हैं। फिर भी यदि हर निर्णय को राहुकाल, दोष और अमंगल से बांध दिया जाए तो समाज एक बौद्धिक द्वंद्व में फँस जाता है। आस्था यदि मन की शांति देती है तो उसका सम्मान होना चाहिए, पर जब वही आस्था भय, भ्रम और अनावश्यक आर्थिक दबाव का माध्यम बन जाए तो प्रश्न उठाना भी आवश्यक है।
त्योहार समाज को जोड़ने के लिए होते हैं, न कि उसे तिथियों के मतभेद और उपभोग की होड़ में उलझाने के लिए। बाजार अपना काम करेगा—वह अवसर खोजेगा और उसे भुनाएगा। पर समाज का दायित्व है कि वह परंपरा और विवेक के बीच संतुलन बनाए। मुहूर्त यदि श्रद्धा का विषय है तो उसे व्यक्तिगत आस्था तक सीमित रखा जाए; उसे सामूहिक भ्रम और आर्थिक दबाव का औजार न बनने दिया जाए। त्योहारों का विस्तार तभी सार्थक है जब वह सामूहिक आनंद बढ़ाए, न कि अनावश्यक विभाजन और बोझ पैदा करे। अब समय है कि इस विषय पर खुली, तार्किक और संतुलित चर्चा हो, ताकि आस्था भी बनी रहे और समाज का विवेक भी सुरक्षित रहे।