कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति से इस समय की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। तृणमूल कांग्रेस की दिग्गज नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बेहद करीबी मानी जाने वालीं चंद्रिमा भट्टाचार्य ने शनिवार को अचानक पार्टी के राज्य अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्हें ठीक एक महीने पहले 3 जून को ही पार्टी ने इस बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पर बैठाया था। लेकिन मात्र 30 दिनों के भीतर ही उन्होंने पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को एक चिट्ठी लिखकर अध्यक्ष पद के साथ-साथ पार्टी की सभी संगठनात्मक जिम्मेदारियों से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है।
पार्टी के बैंक खातों और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी भी छोड़ी
चंद्रिमा भट्टाचार्य का यह इस्तीफा केवल एक पद छोड़ना नहीं है, बल्कि उन्होंने पार्टी के भीतर अपने सभी प्रशासनिक अधिकारों को भी त्याग दिया है। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के बैंक खातों से जुड़े अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता यानी चेक साइन करने के अधिकार और चुनाव आयोग के सामने पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाली मुख्य जिम्मेदारी से भी अपना नाम वापस ले लिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता खेमे के लिए यह इस्तीफा इस साल का सबसे बड़ा संगठनात्मक संकट बन सकता है क्योंकि चंद्रिमा लंबे समय से पार्टी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में से एक रही हैं।
बेटे की ‘बगावत’ बनी इस्तीफे की सबसे बड़ी वजह
इस बेहद चौंकाने वाले इस्तीफे के पीछे की मुख्य वजह चंद्रिमा भट्टाचार्य के बेटे सौरव बसु का एक राजनीतिक कदम माना जा रहा है। दरअसल उनके पुत्र सौरव बसु हाल ही में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले पार्टी के एक बागी यानी विद्रोही गुट में शामिल हो गए हैं। बेटे के इस कदम के बाद से ही पार्टी के भीतर चंद्रिमा की वफादारी पर सवाल उठने लगे थे। इसी बात से आहत होकर उन्होंने पद छोड़ने का फैसला किया। विरोधी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर तीखा तंज कसते हुए तृणमूल कांग्रेस को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी करार दिया है।
विश्वसनीयता पर सवाल उठने के बाद वापसी का रास्ता बंद
अपना पद छोड़ने के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए चंद्रिमा भट्टाचार्य ने अपना दर्द बयां किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें किसी भी नेता या सहकर्मी से कोई निजी शिकायत नहीं है। लेकिन जिस तरह से हाल के दिनों में उनके काम करने के तरीके और पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा पर उंगलियां उठाई गईं, उसके बाद उनके लिए पद पर बने रहना आत्मसम्मान के खिलाफ था। उन्होंने दो टूक कहा कि जब किसी की विश्वसनीयता और भरोसे पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएं, तो उस माहौल में काम नहीं किया जा सकता और अब पार्टी के पदों पर उनकी वापसी का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है।