श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की राजनीति से इस समय की एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपनी सरकार के मंत्रिमंडल में जल्द ही बड़ा फेरबदल और विस्तार करने का साफ इशारा कर दिया है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद से ही सत्ताधारी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर भारी हलचल शुरू हो गई है। मंत्री पद पाने के लिए कई विधायकों ने पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर अपनी पैरवी लगानी शुरू कर दी है। कोई अपनी वरिष्ठता और पुराने अनुभव का हवाला दे रहा है, तो कोई क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर कैबिनेट में जगह मांग रहा है।
जुलाई के आखिरी हफ्ते में हो सकता है बड़ा फैसला
अक्टूबर 2024 में सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार किया है कि कैबिनेट विस्तार की पूरी तैयारी की जा चुकी है। उन्होंने बताया कि यह फेरबदल संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले या सत्र के दौरान किसी भी समय किया जा सकता है। अंदरूनी सूत्रों की मानें तो यह पूरी कवायद जुलाई 2026 के अंतिम सप्ताह में पूरी कर ली जाएगी। फिलहाल उमर अब्दुल्ला सरकार में मुख्यमंत्री को मिलाकर कुल 6 मंत्री शामिल हैं, जबकि नियमों के हिसाब से अभी 3 कैबिनेट मंत्रियों के पद खाली पड़े हैं।
एक बड़े समुदाय को साधने के लिए नए चेहरे पर दांव
राजनीतिक गलियारों में इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि मुख्यमंत्री इस बार केवल खाली पड़े पदों को भरेंगे नहीं, बल्कि कुछ मौजूदा मंत्रियों को हटाकर फेरबदल भी कर सकते हैं। इस संभावित विस्तार में कश्मीर के शिया समुदाय को प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद सबसे ज्यादा है, क्योंकि वर्तमान सरकार में इस समाज का एक भी नेता मंत्री नहीं है। सूत्रों के मुताबिक श्रीनगर की जडीबल सीट से विधायक तनवीर सादिक को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। इससे श्रीनगर शहर को भी सरकार में जगह मिल जाएगी और शिया समाज का एक नया चेहरा भी सामने आ सकेगा।
सहयोगी दल कांग्रेस के फैसले से फंसा हुआ है पेंच
इस पूरे फेरबदल में मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सहयोगी पार्टी कांग्रेस को लेकर है। विधानसभा में कांग्रेस के पास 6 विधायक हैं, लेकिन पार्टी ने पहले ही एक शर्त रख दी है। कांग्रेस का कहना है कि जब तक जम्मू-कश्मीर को दोबारा पूरी तरह से राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक वह सरकार में शामिल नहीं होगी। कांग्रेस के इस कड़े रुख की वजह से मुख्यमंत्री के सामने एक अजीब राजनीतिक स्थिति पैदा हो गई है। अगर कांग्रेस अपने इस फैसले पर अड़ी रहती है, तो खाली पड़े सभी पदों पर केवल नेशनल कॉन्फ्रेंस या सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायकों को ही मौका दिया जाएगा।