मध्य प्रदेश सरकार का बजट: धर्म ध्वजा फहरानी साधु

-सुभाष मिश्र
मध्यप्रदेश सरकार का 2026-27 का बजट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं है, यह एक राजनीतिक संकेत भी है। वित्तमंत्री के बजट भाषण से लेकर योजनाओं के नाम तक एक स्पष्ट रेखा दिखाई देती है, मुख्यमंत्री की राजनीतिक शैली, जिसमें विकास और सांस्कृतिक प्रतीक साथ-साथ चलते हैं। ‘द्वारिकाÓ, ‘यशोदाÓ और ‘वृंदावनÓ जैसे नाम केवल योजनाओं की पहचान नहीं, बल्कि एक कथा गढऩे का प्रयास हैं। ऐसी कथा जिसमें सरकार अपने विकास मॉडल को सांस्कृतिक भावनात्मक जुड़ाव के साथ प्रस्तुत करती है।
द्वारिका योजना के जरिए शहरों के ढांचे को मजबूत करने के लिए लगभग पाँच हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। आवास, सड़क, नगर निकायों की क्षमता और आधारभूत सुविधाओं पर जोर बताता है कि सरकार तेजी से बढ़ते शहरीकरण को व्यवस्थित करना चाहती है। दूसरी ओर यशोदा दुग्ध प्रदाय योजना में बच्चों के पोषण को केंद्र में रखा गया है। कक्षा आठवीं तक दूध देने का निर्णय शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों को जोड़ता है, लेकिन इसके साथ जुड़ा प्रतीक यह भी बताता है कि सरकार योजनाओं को भावनात्मक भाषा में पेश करना चाहती है।
यही इस बजट की सबसे बड़ी विशेषता है—योजनाएं व्यावहारिक हैं, लेकिन उनकी ब्रांडिंग सांस्कृतिक है। यह मॉडल नया नहीं है। पिछले वर्षों में धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ विकास योजनाओं को जोडऩे की प्रवृत्ति राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत हुई है और मध्यप्रदेश का यह बजट उसी प्रवृत्ति का राज्य स्तर पर विस्तार दिखाई देता है।
सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर लाडली बहना योजना के लिए लगभग 24 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान इस बात का संकेत है कि सरकार प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता वाले मॉडल को जारी रखना चाहती है। किसानों के लिए सोलर पंप, नकद सहायता और सड़क कनेक्टिविटी पर जोर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने की कोशिश है। सिंहस्थ 2028 के लिए बड़ा बजट धार्मिक आयोजन के साथ पर्यटन और इंफ्रास्ट्रक्चर को जोडऩे की रणनीति भी है।
यहीं से बहस शुरू होती है क्या यह बजट विकास का है या धार्मिक नॉरेटिव का। सच यह है कि इसे किसी एक खांचे में रखना आसान नहीं है। योजनाएं वास्तविक हैं, निवेश वास्तविक है, लेकिन प्रतीक राजनीतिक संदेश देते हैं। यह ‘वेलफेयर + सांस्कृतिक ब्रांडिंग का मिश्रित मॉडल है, जिसमें सरकार विकास को पहचान की भाषा में प्रस्तुत करती है।
अलग-अलग वर्गों की प्रतिक्रिया भी इसी तरह मिश्रित है। शहरी वर्ग द्वारिका योजना को निवेश और रोजगार से जोड़कर सकारात्मक देख रहा है। महिलाएं लाडली बहना जैसी योजनाओं की निरंतरता से आश्वस्त हैं। ग्रामीण और किसान वर्ग सड़क और ऊर्जा निवेश को व्यावहारिक लाभ के रूप में देखता है। वहीं विपक्ष स्वास्थ्य, खर्च की प्राथमिकताओं और धार्मिक प्रतीकों के उपयोग पर सवाल उठा रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से यह बजट मोहन यादव की पहचान गढऩे का प्रयास भी है। यह केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि नेतृत्व शैली का संकेत है। मध्यप्रदेश में यादव वोट निर्णायक नहीं हैं, इसलिए इसे केवल सामाजिक समीकरण की राजनीति कहना सही नहीं होगा। अधिक संभावना यह है कि यह व्यापक सांस्कृतिक-वेलफेयर मॉडल का हिस्सा है, जिसमें नेता अपनी वैचारिक और प्रतीकात्मक पहचान स्थापित करता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों के बजट अक्सर केंद्र की व्यापक नीति दिशा—वेलफेयर, इंफ्रास्ट्रक्चर और सांस्कृतिक परियोजनाओं से मेल खाते हैं। इसलिए इसे पूरी तरह व्यक्तिगत प्रयोग नहीं कहा जा सकता, लेकिन योजनाओं की ब्रांडिंग और प्रस्तुति यह जरूर बताती है कि मोहन यादव अपनी अलग राजनीतिक कथा लिखने की कोशिश कर रहे हैं।
आखिरकार इस बजट को दो स्तरों पर समझना होगा। पहला—यह सामाजिक सुरक्षा, शहरी निवेश और ग्रामीण कनेक्टिविटी पर आधारित एक पारंपरिक विकास बजट है। दूसरा—यह सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से राजनीतिक संदेश देने का प्रयास है, जिसमें कृष्ण एक रूपक बनकर उभरते हैं।
राजनीति में प्रतीक गति देते हैं, लेकिन भरोसा जमीन पर काम से बनता है। इसलिए इस बजट की वास्तविक सफलता योजनाओं के नाम से नहीं, उनके असर से तय होगी और यही आने वाले समय में मोहन सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा भी होगी।

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