दिल्ली की जेलों में बंद कैदियों के लिए एक बड़ी राहत वाली खबर सामने आई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने राजधानी में ओपन जेल स्थापित करने को लेकर राज्य सरकार को दो महीने के भीतर ठोस और विस्तृत योजना तैयार करने का अल्टीमेटम दिया है। मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने साफ किया कि सरकार को सबसे पहले उन पात्र कैदियों की पहचान करनी होगी जिन्हें इन संस्थानों में शिफ्ट किया जा सकता है। अदालत का मानना है कि जेल का मकसद केवल सजा देना नहीं बल्कि कैदियों का सुधार और पुनर्वास भी होना चाहिए ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सख्त रुख और निगरानी समिति का गठन
अदालत ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश देते हुए दिल्ली सरकार के गृह सचिव को तत्काल कार्रवाई का संदेश भेजा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत हर राज्य में एक निगरानी समिति बनाना अनिवार्य है जो ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन के प्रबंधन का जिम्मा संभालेगी। हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से एक विस्तृत हलफनामा भी मांगा है जिसमें फरवरी में आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब तक उठाए गए कदमों का पूरा ब्योरा देना होगा। इस प्रक्रिया में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका अहम होगी जो तय मानकों के आधार पर कैदियों के चयन की रणनीति बनाएगी।
क्या है ओपन जेल का कॉन्सेप्ट और कैसे बदलेगी कैदियों की जिंदगी
मैदानी हकीकत यह है कि ओपन या सेमी-ओपन जेलों में कैदियों पर सुरक्षा के कड़े प्रतिबंध कम होते हैं और उन्हें दिन के वक्त बाहर जाकर काम करने की छूट मिलती है। इससे कैदी न केवल समाज से जुड़े रहते हैं बल्कि उनके मानसिक तनाव में भी बड़ी कमी आती है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई तक सरकार को अपना ड्राफ्ट पेश करना होगा। यह कदम जेल सुधार की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव माना जा रहा है जिससे पात्र कैदी सजा काटने के साथ-साथ खुद को रोजगार और सामाजिक मर्यादाओं के लिए तैयार कर सकेंगे।