महंगाई की मार और बेबस सरकार

-सुभाष मिश्र

देश में एक बार फिर महंगाई सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनती जा रही है। पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी, घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों का दबाव, खाने-पीने की वस्तुओं की महंगाई और रोजगार की अनिश्चितता ने आम परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है। ऐसे समय में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में सरकारें अब महंगाई नियंत्रित करने में सक्षम रह गई हैं, या फिर वैश्विक पूंजी, युद्ध और बाजार की शक्तियां लोकतांत्रिक सरकारों से ज्यादा ताकतवर हो चुकी हैं?
पिछले कुछ वर्षों में भारत ही नहीं, पूरी दुनिया ने यह महसूस किया है कि अब किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह उसके अपने नियंत्रण में नहीं रह गई। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जिस प्रकार तेल और गैस बाजार प्रभावित हुए थे, उसी तरह अब अमेरिका-ईरान-इजरायल तनाव ने पश्चिम एशिया को फिर अस्थिर बना दिया है। दुनिया का बड़ा हिस्सा अभी भी खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर है। भारत लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल का सीधा असर भारतीय रसोई और भारतीय सड़कों पर दिखाई देता है।
सरकारें अक्सर जनता से ‘त्यागÓ और ‘संयमÓ की अपील करती हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या लगातार बढ़ती महंगाई के बीच केवल जनता ही बलिदान देती रहे? जब पेट्रोल-डीजल महंगा होता है तो उसका असर केवल वाहन चलाने वालों पर नहीं पड़ता, बल्कि परिवहन लागत बढऩे से सब्जी, दूध, अनाज, दवा, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की हर वस्तु महंगी हो जाती है। यानी 3 रुपए का ईंधन मूल्य वृद्धि वास्तव में पूरे बाजार में कई गुना महंगाई का कारण बनती है।
राजनीतिक विडंबना यह है कि जो दल विपक्ष में रहते हुए पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि पर सड़क पर उतरते थे, सत्ता में आने के बाद वही वैश्विक परिस्थितियों का हवाला देने लगते हैं। भाजपा ने कांग्रेस शासन के दौरान महंगाई को बड़ा जनांदोलन बनाया था। आज कांग्रेस वही आरोप भाजपा पर लगा रही है। लेकिन आम आदमी के लिए यह राजनीतिक बहस अब अर्थहीन होती जा रही है, क्योंकि उसकी चिंता केवल इतनी है कि महीने का राशन कैसे चलेगा, बच्चों की फीस कैसे भरी जाएगी और बचत कैसे बचेगी।
यह भी सच है कि वर्तमान समय में सरकारों की सीमाएं बढ़ी हैं। वैश्विक कॉर्पोरेट कंपनियां, तेल उत्पादक देश, अंतरराष्ट्रीय बाजार और निवेशक अब अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। कई बार लोकतांत्रिक सरकारें भी उन्हीं आर्थिक ताकतों के दबाव में निर्णय लेने को मजबूर दिखाई देती हैं। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में जनता का भरोसा राजनीतिक दलों से कम होता जा रहा है। लोग महसूस कर रहे हैं कि सत्ता बदलती है, लेकिन महंगाई और आर्थिक असुरक्षा बनी रहती है।
भारत में स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि यहां बड़ी आबादी निम्न और मध्यम वर्ग की है। यह वर्ग न तो सरकारी सब्सिडी पर पूरी तरह निर्भर रह सकता है और न ही बढ़ती कीमतों को आसानी से झेल सकता है। महिलाओं के लिए सोना केवल आभूषण नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा और बचत का प्रतीक रहा है। यदि सोना लगातार महंगा होता है तो उसका असर केवल बाजार पर नहीं बल्कि भारतीय परिवारों की मानसिक सुरक्षा पर भी पड़ता है। ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवारों में संकट के समय सबसे पहले सोना ही गिरवी रखा जाता है। ऐसे में सोने की कीमतों का बढऩा भी आर्थिक चिंता का संकेत है।
प्रधानमंत्री की अपीलें, आत्मनिर्भरता के नारे और चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के दावे तब तक अधूरे लगेंगे, जब तक आम आदमी अपने जीवन में आर्थिक राहत महसूस नहीं करेगा। किसी देश की अर्थव्यवस्था केवल जीडीपी के आंकड़ों से महान नहीं बनती; उसकी असली ताकत उसके नागरिकों की क्रय शक्ति, रोजगार और जीवन स्तर से तय होती है। यदि विकास के साथ-साथ जनता की जेब कमजोर होती जाए, तो आर्थिक उपलब्धियां केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाती हैं।
आज सबसे बड़ी जरूरत राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति बनाने की है। भारत को ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, स्थानीय उत्पादन, सार्वजनिक परिवहन और रोजगार आधारित विकास मॉडल पर गंभीरता से काम करना होगा। केवल चुनावी नारों और भावनात्मक मुद्दों से आर्थिक संकट का समाधान नहीं निकलेगा। धर्म, जाति और वैचारिक लड़ाइयों के बीच यदि रसोई की आग कमजोर पडऩे लगे, तो लोकतंत्र का असली संकट वहीं से शुरू होता है।
महंगाई केवल आर्थिक विषय नहीं है, यह सामाजिक स्थिरता, पारिवारिक सुरक्षा और राजनीतिक विश्वास का भी प्रश्न है। यदि सरकारें इस दर्द को नहीं समझेंगी, तो जनता धीरे-धीरे व्यवस्था से निराश होती जाएगी। और जब जनता की उम्मीदें टूटती हैं, तब सबसे बड़ा संकट केवल बाजार में नहीं बल्कि लोकतंत्र में पैदा होता है।

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