बैकफुट पर आई सरकार

-सुभाष मिश्र

कहा जाता है कि सत्ता की असली परीक्षा चुनाव नहीं, बल्कि जनता के असंतोष से होती है। चुनाव तो पांच साल में एक बार आते हैं, लेकिन जनता हर दिन सरकार का मूल्यांकन करती है। पिछले एक दशक में नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान यही रही कि वह अपने निर्णयों से पीछे नहीं हटती। चाहे विपक्ष कितना भी विरोध करे, चाहे सड़क पर कितने भी आंदोलन हों, सरकार अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही। यही कारण था कि यह धारणा भी बन गई थी कि इस सरकार में न फैसले वापस होते हैं और न ही मंत्री इस्तीफा देते हैं।
लेकिन राजनीति में कोई धारणा स्थायी नहीं होती। जब जनमत करवट बदलता है तो सबसे मजबूत सरकारों को भी अपने कदम पीछे खींचने पड़ते हैं। किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन के बाद तीन कृषि कानूनों की वापसी इसका पहला बड़ा उदाहरण था। अब शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं के आक्रोश के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उसी श्रृंखला की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आया है। यह केवल एक मंत्री का जाना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संदेश का प्रतीक है कि सरकार अब हर मुद्दे पर पहले जैसी आक्रामक मुद्रा में नहीं रह सकती।
नीट परीक्षा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आए प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा अनियमितताओं और प्रशासनिक विफलताओं ने उस युवा वर्ग के भीतर गहरा अविश्वास पैदा किया है, जिसे सरकार अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती रही है। करोड़ों युवाओं की मेहनत पर सवाल खड़े हुए। जब भविष्य दांव पर लगे तो आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं रह जाता, वह सामाजिक असंतोष में बदल जाता है।

सरकार की मुश्किल केवल परीक्षा विवाद तक सीमित नहीं रही। सोनम वांगचुक का आंदोलन, लद्दाख के मुद्दे, आंदोलनकारियों पर पुलिस कार्रवाई, छात्रों पर लाठीचार्ज, विपक्ष का सड़क पर उतरना, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खडग़े का प्रधानमंत्री आवास के निकट धरना, इन घटनाओं ने मिलकर सरकार के खिलाफ ऐसा वातावरण तैयार किया जिसमें उसे रक्षात्मक होना पड़ा। वांगचुक के साथ सरकार को वार्ता करनी पड़ी, कुछ मुद्दों पर सहमति बनी और बाकी पर आश्वासन देना पड़ा। लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए, लेकिन जब संवाद दबाव के बाद शुरू हो तो वह सरकार की मजबूरी अधिक दिखाई देता है।
इस पूरे दौर की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि राजनीतिक विमर्श का केंद्र अब टीवी स्टूडियो नहीं, बल्कि सोशल मीडिया बन गया है। मुख्यधारा के मीडिया पर पक्षधरता के आरोपों के बीच युवाओं ने अपना मंच स्वयं तैयार कर लिया। कुछ ही घंटों में हैशटैग राष्ट्रीय बहस बन जाते हैं। व्यंग्य, मीम और डिजिटल अभियान अब राजनीतिक दबाव का नया हथियार है। जिस विषय को टीवी अनदेखा करता है, वहीं सोशल मीडिया पर करोड़ों लोगों तक पहुँच जाता है। यह सूचना क्रांति भारतीय राजनीति का नया अध्याय लिख रही है।

सरकार के लिए चिंता की दूसरी वजह विपक्ष का बदला हुआ तेवर है। लंबे समय तक बिखरा हुआ दिखाई देने वाला विपक्ष अब जनसरोकारों के मुद्दों पर एक साझा राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रहा है। बेरोजगारी, महंगाई, परीक्षा घोटाले, किसानों की समस्याएं, संघीय ढांचे के प्रश्न और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता इन सबको जोड़कर सरकार के खिलाफ व्यापक जनमत बनाने की रणनीति दिखाई दे रही है।

इधर, एक और बदलाव भी स्पष्ट है। पहले सरकारें सोशल मीडिया को केवल प्रचार का माध्यम समझती थी, लेकिन अब वही माध्यम जनमत निर्माण का सबसे प्रभावी मंच बन चुका है। नेपाल में हाल के राजनीतिक बदलावों में युवाओं की निर्णायक भूमिका ने पूरे दक्षिण एशिया की सरकारों को यह संदेश दिया है कि डिजिटल पीढ़ी परंपरागत राजनीतिक समीकरणों से अलग सोचती है। वह नारे से अधिक जवाब मांगती है और प्रचार से अधिक परिणाम देखना चाहती है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।
सरकार के सामने आने वाले समय में उत्तर प्रदेश सहित कई महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव हैं। उसके बाद 2029 का लोकसभा चुनाव होगा। ऐसे समय में केवल संगठन की ताकत या चुनावी प्रबंधन पर्याप्त नहीं होगा। युवाओं का विश्वास, रोजगार, शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता, महंगाई पर नियंत्रण और लोकतांत्रिक संवाद, यही चुनावी मुद्दे बनेंगे।
साथ ही सत्ता पक्ष की वह राजनीतिक रणनीति भी बहस का विषय रही है, जिसमें क्षेत्रीय दलों के सांसदों और विधायकों को अपने साथ जोड़कर विपक्ष को लगातार कमजोर करने का प्रयास किया गया। विपक्ष मुक्त भारत जैसी राजनीतिक अवधारणा ने भी लोकतांत्रिक बहस को जन्म दिया। लेकिन लोकतंत्र में मजबूत सरकार जितनी आवश्यक है, उतना ही मजबूत विपक्ष भी आवश्यक होता है। लोकतंत्र की खूबसूरती सहमति से नहीं, असहमति को सम्मान देने से बनती है।
आज जो परिस्थितियां बनी हैं, वे केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफे या किसी एक आंदोलन का परिणाम नहीं है। यह कई वर्षों से जमा हो रहे असंतोष का राजनीतिक प्रतिफल है। जनता यह संदेश दे रही है कि बहुमत सरकार को अधिकार देता है, लेकिन जवाबदेही से मुक्त नहीं करता।
सरकारें चुनाव जीतकर सत्ता में आती हैं, लेकिन जनविश्वास खोने लगे तो धीरे-धीरे बैकफ़ुट पर पहुंच जाती हैं। लोकतंत्र में अंतत: सबसे बड़ा विपक्ष कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि जागरूक जनता होती है।

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