योग की वैश्विक स्वीकार्यता परंपरा से विश्व जीवनशैली तक

-सुभाष मिश्र

21 जून को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं रह गया है। यह उस विचार की वैश्विक स्वीकृति का प्रतीक बन चुका है, जिसकी उत्पत्ति हजारों वर्ष पहले भारत की धरती पर हुई थी। इस वर्ष भी भारत से लेकर अमेरिका, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात और अफ्रीका तक लाखों लोगों ने खुले मैदानों, ऐतिहासिक स्थलों, समुद्र तटों और पर्वतीय क्षेत्रों में सामूहिक योग किया। यह दृश्य केवल किसी स्वास्थ्य अभियान का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि योग अब दुनिया की साझा विरासत बन चुका है।
भारत में योग कभी केवल व्यायाम नहीं रहा। यह शरीर, मन और आत्मा के संतुलन की जीवन पद्धति है। भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले यह समझ लिया था कि स्वस्थ समाज केवल दवाइयों से नहीं, बल्कि अनुशासित जीवनशैली से बनता है। योग उसी अनुशासन का विज्ञान है। आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी यह स्वीकार कर चुका है कि नियमित योग से तनाव, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, अवसाद और अनेक जीवनशैली संबंधी बीमारियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर कहा कि योग केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का माध्यम नहीं, बल्कि मानवता को जोडऩे वाली शक्ति है। उन्होंने एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य की अवधारणा के साथ योग को वैश्विक कल्याण का आधार बताया। वास्तव में पिछले एक दशक में भारत सरकार ने जिस तरह योग को विश्व मंच पर स्थापित किया है, वह सांस्कृतिक कूटनीति का भी सफल उदाहरण है। वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के प्रस्ताव के बाद 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया और तब से हर वर्ष इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई है।
योग की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सादगी है। आज जब स्वास्थ्य सेवाएं लगातार महंगी होती जा रही हैं, अस्पतालों का खर्च आम नागरिक की पहुंच से बाहर होता जा रहा है और हर व्यक्ति महंगे जिम, फिटनेस क्लब या निजी प्रशिक्षकों का खर्च नहीं उठा सकता, तब योग सबसे सुलभ और लोकतांत्रिक स्वास्थ्य पद्धति के रूप में सामने आता है। इसे करने के लिए किसी महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। केवल थोड़ी-सी जगह, कुछ समय और नियमित अभ्यास की जरूरत होती है। यही कारण है कि गांव से लेकर महानगर तक और गरीब से लेकर संपन्न वर्ग तक, हर कोई अपना सकता है। भारत जैसे देश में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां सरकारों के प्रयासों के बावजूद गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं अभी भी हर नागरिक तक समान रूप से नहीं पहुंच सकी हैं। यदि लोग नियमित योग अपनाकर अनेक बीमारियों से बच सकते हैं, तो इससे न केवल उनका जीवन बेहतर होगा बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी बोझ कम होगा। इलाज से अधिक महत्वपूर्ण बीमारी की रोकथाम होती है और योग उसी दिशा में सबसे प्रभावी माध्यमों में से एक है।
आज योग केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं रहा, बल्कि एक बड़ा आर्थिक क्षेत्र भी बन चुका है। योग प्रशिक्षकों, योग संस्थानों, वेलनेस सेंटरों, आयुष चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा, योग पर्यटन, जैविक उत्पादों और आयुर्वेद से जुड़ा विशाल उद्योग विकसित हुआ है। इस परिवर्तन का सबसे चर्चित उदाहरण बाबा रामदेव हैं। एक योग शिक्षक के रूप में शुरुआत करने वाले रामदेव ने योग को जन-जन तक पहुंचाया और बाद में योग, आयुर्वेद तथा स्वदेशी उत्पादों के माध्यम से एक बड़े औद्योगिक समूह की स्थापना की। यह इस बात का उदाहरण है कि यदि परंपरागत ज्ञान को आधुनिक प्रबंधन और जनविश्वास के साथ जोड़ा जाए तो वह रोजगार और अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
हालांकि इसके साथ एक सावधानी भी आवश्यक है। योग का अत्यधिक व्यावसायीकरण उसकी मूल भावना को कमजोर नहीं करना चाहिए। योग केवल महंगे स्टूडियो, ब्रांडेड परिधानों या आकर्षक पैकेजों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसकी आत्मा सादगी, अनुशासन और संतुलन में है। यदि योग केवल बाजार का उत्पाद बनकर रह गया तो उसका मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाएगा।
सकारात्मक बात यह है कि सरकार ने भी योग शिक्षा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। आयुष मंत्रालय की स्थापना, योग अनुसंधान, प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण, विश्वविद्यालयों में योग अध्ययन, स्कूलों में योग अभ्यास तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से इसे व्यापक बनाया गया है। आज देश के अधिकांश राज्यों में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर मुख्यमंत्री, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी, विद्यार्थी, शिक्षक, पुलिस, सेना और आम नागरिक एक साथ योग करते दिखाई देते हैं। यह केवल सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक भागीदारी का संकेत भी है।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में योग को बढ़ावा देना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आज की युवा पीढ़ी मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और लगातार बढ़ते मानसिक दबाव के बीच जीवन जी रही है। तनाव, चिंता, अनिद्रा और अवसाद जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। योग केवल शरीर को नहीं, मन को भी संतुलित करता है। यदि बचपन से ही योग जीवन का हिस्सा बन जाए तो आने वाली पीढ़ी अधिक स्वस्थ, अनुशासित और आत्मविश्वासी बन सकती है।
विश्व स्तर पर भी योग की स्वीकार्यता भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रमाण है। जिस प्रकार जापान ने अपने अनुशासन, दक्षिण कोरिया ने अपनी संस्कृति, चीन ने अपनी पारंपरिक चिकित्सा और अमेरिका ने अपनी तकनीक के माध्यम से वैश्विक पहचान बनाई, उसी प्रकार भारत ने योग के माध्यम से अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा को दुनिया के सामने प्रतिष्ठित किया है। यह केवल सॉफ्ट पावर नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत पहचान का विस्तार है।
फिर भी यह याद रखना होगा कि वर्ष में केवल एक दिन योग करने से समाज स्वस्थ नहीं बन सकता। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रेरणा का अवसर है, लेकिन वास्तविक सफलता तब होगी जब योग हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बने। जिस प्रकार लोग रोज भोजन करते हैं, उसी तरह यदि प्रतिदिन कुछ समय योग और प्राणायाम को दें, तभी इसका वास्तविक लाभ मिलेगा।
योग की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता भारत के लिए गर्व का विषय है। यह उस ज्ञान परंपरा की विजय है जिसने कभी मानव जीवन को प्रकृति, शरीर और चेतना के संतुलन का संदेश दिया था। आज जब पूरी दुनिया तनाव, प्रदूषण, असंतुलित जीवनशैली और बढ़ते चिकित्सा खर्च से जूझ रही है, तब योग केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बनकर उभर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि स्वस्थ समाज अस्पतालों से नहीं, स्वस्थ आदतों से बनता है। यदि भारत अपनी इस प्राचीन धरोहर को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सरल जीवनशैली और सामाजिक चेतना के साथ आगे बढ़ाता रहा तो योग आने वाले वर्षों में केवल भारत की पहचान नहीं रहेगा, बल्कि पूरी मानवता के बेहतर भविष्य का आधार बन सकता है।

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