जंग की आग और जनभावना का ज्वार

-सुभाष मिश्र
मिडिल ईस्ट की जंग अब केवल मिसाइलों और ड्रोन की लड़ाई नहीं रह गई है, यह जनभावनाओं की भी जंग बन चुकी है। अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद जिस तरह ईरान में सत्ता और सियासत का नया अध्याय खुला है, उसी तरह पूरी दुनिया में आक्रोश और असुरक्षा की भावना भी तेज हुई है। भारत, पाकिस्तान और कई अन्य देशों में सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं। अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारे लग रहे हैं। यह केवल राजनीतिक संगठनों की लामबंदी नहीं है, बल्कि आम नागरिकों के भीतर उपजा असंतोष है, जिसे बच्चों की मौतों और मानवीय त्रासदी ने और तीखा बना दिया है।
इस युद्ध में जिन मासूम बच्चों की जान गई, उनके दृश्य और तस्वीरें लोगों के दिलों को झकझोर रही हैं। युद्ध जब सीमाओं से निकलकर घरों, स्कूलों और अस्पतालों तक पहुँचता है, तब वह केवल सामरिक कार्रवाई नहीं रह जाता, वह मानवता पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। यही कारण है कि बुद्धिजीवी वर्ग, लेखक, कलाकार और पूर्व राजनयिक खुलकर अपनी बात रख रहे हैं। केवल जावेद अख्तर ही नहीं, बल्कि अनेक शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक नेता इस संघर्ष के तरीके और उसके परिणामों पर सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा का अधिकार अपनी जगह है, पर निर्दोष नागरिकों की कीमत पर चलने वाली रणनीति अंततः विश्व शांति को और दूर ले जाती है।
भारत में प्रदर्शन कर रहे लोगों की भावना बहुआयामी है। एक ओर मानवीय संवेदना है—मासूमों की मौत पर दुख और आक्रोश। दूसरी ओर यह चिंता भी है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है तो उसका असर तेल की कीमतों, रोज़गार, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पाकिस्तान में भी शिया समुदाय सहित कई समूहों ने खुलकर विरोध दर्ज कराया है। कई जगहों पर प्रदर्शन उग्र भी हुए। यह बताता है कि यह संघर्ष केवल भू-राजनीति का विषय नहीं, बल्कि पहचान और भावनात्मक जुड़ाव का भी विषय बन चुका है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की आक्रामक रणनीति को उनके समर्थक निर्णायक नेतृत्व बताते हैं, पर आलोचकों की नजर में यह कदम क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहरा कर सकता है। युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान को बड़ा झटका लगा, लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे संघर्ष अक्सर जल्दी खत्म नहीं होते। ईरान के भीतर सत्ता परिवर्तन और बाहरी दबाव की स्थिति इस आग को लंबा खींच सकती है।
जनभावना के पीछे एक और कारण है—असमानता का एहसास। जब दुनिया देखती है कि सैन्य ताकत और संसाधनों में भारी अंतर है, तो सहानुभूति स्वाभाविक रूप से कमजोर पक्ष की ओर झुकती है। यही मनोविज्ञान सड़कों पर उतरते लोगों के भीतर भी काम करता है। उन्हें लगता है कि यह केवल दो देशों का युद्ध नहीं, बल्कि ताकत के प्रदर्शन की राजनीति है, जिसमें आम इंसान पिस रहा है।
आज जरूरत है कि युद्ध की भाषा को विराम देकर संवाद की भाषा को आगे बढ़ाया जाए। यदि यह टकराव और फैला तो केवल पश्चिम एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया इसकी कीमत चुकाएगी। तेल बाजार से लेकर कूटनीतिक रिश्तों तक, सब पर इसका असर दिखेगा।
यह संपादकीय किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि उस मानवीय पीड़ा की तरफ इशारा है जो हर युद्ध के पीछे छूट जाती है। प्रदर्शन कर रहे लोग केवल राजनीति नहीं कर रहे, वे एक संदेश दे रहे हैं—कि दुनिया को स्थायी शांति चाहिए, न कि अंतहीन प्रतिशोध। सवाल यह है कि क्या सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग इस संदेश को सुनेंगे?

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