-सुभाष मिश्र
एक समय था जब कोरोना महामारी के दिनों में मास्क डर की पहचान बन गया था। हर व्यक्ति के चेहरे पर मास्क था और हर सांस में यह आशंका कि कहीं हवा ही बीमारी न बन जाए। विडंबना यह है कि आज दिल्ली के लोगों के चेहरे पर फिर मास्क है, लेकिन इस बार वजह वायरस नहीं, हवा है। सांस लेना मुश्किल हो गया है। हवा दिखाई देने लगी है—धुंध नहीं, ज़हर।
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा चेतावनी दे रहे हैं कि हालात और बिगड़ सकते हैं। वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के सक्रिय होने से प्रदूषण के फँसने की आशंका है। यानी जो हवा चलनी चाहिए थी, वह बोझ बनकर शहर पर टिक सकती है। सवाल यह नहीं है कि चेतावनी कौन दे रहा है, सवाल यह है कि चेतावनी क्यों बार-बार देनी पड़ रही है और समाधान क्यों नहीं दिख रहा।
जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी, तब भी प्रदूषण बढ़ा। उससे पहले कांग्रेस थी, तब भी बढ़ा। अब भाजपा की सरकार है, तब भी हालात बदतर हैं। यानी समस्या किसी एक पार्टी की नहीं, पूरी राजनीतिक संस्कृति की है, जिसमें पर्यावरण हमेशा विकास के बाद आता है—अगर आता भी है तो।
दिल्ली अकेली नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य, जहाँ लगभग 33 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है, वहाँ भी हवा को लेकर चेतावनी जारी हो रही है। रायपुर जैसे शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार ख़तरनाक स्तर छू रहा है। यह वही छत्तीसगढ़ है जिसे “हरित राज्य” कहा जाता रहा है। अगर यहाँ भी सांस सुरक्षित नहीं, तो यह सिर्फ शहरी नहीं, राष्ट्रीय संकट है।
देश में गाड़ियों की संख्या बेलगाम बढ़ रही है। निर्माण कार्यों पर न तो ठोस रोक है, न दीर्घकालिक योजना। दिल्ली में अब कहा जा रहा है कि निर्माण पर रोक लगेगी, उद्योगों पर कार्रवाई होगी। लेकिन सवाल यह है कि जब दम घुटने लगता है, तभी प्रशासन जागता क्यों है?
पेड़ लगाए जा रहे हैं—यह सच है। लेकिन उससे कहीं ज़्यादा काटे जा रहे हैं—यह भी उतना ही बड़ा सच है। विकास, उद्योग, सड़क, खनन—हर परियोजना के साथ जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से लेकर जगदलपुर और बस्तर तक यह डर गहराता जा रहा है कि विकास के नाम पर प्रकृति की बलि दी जा रही है। बस्तर नक्सलवाद से मुक्त हो जाए—यह ज़रूरी है।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या बस्तर जंगलों से भी मुक्त हो जाएगा?
क्या आदिवासी समाज को एक बार फिर जल–जंगल–ज़मीन की लड़ाई लड़नी पड़ेगी?
दुनिया भर में ग्लेशियर पिघल रहे हैं। मौसम का संतुलन बिगड़ रहा है। ऑक्सीजन, जो जीवनदायिनी है, वह शहरों में दुर्लभ होती जा रही है। बड़े महानगरों में हवा अब संसाधन नहीं, संकट बन चुकी है।
चिंता की बात यह है कि पर्यावरण को लेकर सजगता भाषणों तक सीमित है। चेतावनियाँ हैं, आंकड़े हैं, रिपोर्टें हैं—लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर है। सरकार कोई भी हो, प्रदूषण जारी है। और अगर यही रफ्तार रही, तो जो हाल आज दिल्ली का है, वही कल पूरे देश का हो सकता है।
पर्यावरण कोई वैकल्पिक मुद्दा नहीं है। यह जीवन और मृत्यु का प्रश्न है। अब जरूरत है कि सरकारें चेतावनी देना बंद करें और निर्णायक कदम उठाएँ—वाहनों की संख्या पर नियंत्रण, टिकाऊ सार्वजनिक परिवहन, निर्माण और उद्योगों पर सख़्त पर्यावरणीय नियम, और सबसे ज़रूरी—जंगलों की वास्तविक सुरक्षा।
क्योंकि अगर हवा ही बीमार हो गई, तो विकास की सारी परिभाषाएँ बेकार हो जाएँगी।
प्रसंगवश विनोद कुमार शुक्ल की कविता
शहर से सोचता हूँ
कि जंगल क्या मेरी सोच से भी कट रहा है
जंगल में जंगल नहीं होंगे
तो कहाँ होंगे ?
शहर की सड़कों के किनारे के पेड़ों में होंगे ।रात को सड़क के पेड़ों के नीचे
सोते हुए आदिवासी परिवार के सपने में
एक सल्फी का पेड़
और बस्तर की मैना आती है
पर नींद में स्वप्न देखते
उनकी आँखें फूट गई हैं ।
परिवार का एक बूढ़ा है
और वह अभी भी देख सुन लेता है
पर स्वप्न देखते हुए आज
स्वप्न की एक सूखी टहनी से
उसकी आँख फूट गई ।