पापुलर कल्चर की भेंट चढ़ता चक्रधर समारोह

छत्तीसगढ़ का रायगढ़ अपने कत्थक घराना और कला-संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां के राजा चक्रधर सिंह जो कला, संगीत, साहित्य के मर्मज्ञ थे और कत्थक नृत्य के जानकार थे, उनकी स्मृति में चालीस सालों से गणेश चतुर्थी के अवसर पर चक्रधर समारोह का आयोजन किया जाता है। जन पहल पर प्रारंभ यह तीन दिवसीय समारोह कत्थक नृत्य और रंगमंच को समर्पित था। बाद में पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश की सरकार ने उस्ताद अल्लाहद्दीन संगीत नाट्य अकादमी द्वारा इसका स्थानीय कलाकारों, साहित्यकारों की भागीदारी से इसका आयोजन कराती थी। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यह समारोह पापुलर कल्चर की भेंट चढ़कर दस दिवसीय हो गया। समारोह में सिनेमा से लेकर सेलिब्रिटी कहे जाने वाले लोगों की एंट्री हो गई। पापुलर कल्चर का नया मंच कवि सम्मेलन भी इससे जुड़ गया। जिसमें लोकप्रिय मंचीय कवियों को बुलाया जाने लगा। समारोह में प्रभावशाली और जुगाड़ लोगों की एंट्री हो गई जिसके कारण धीरे-धीरे इसकी गरिमा प्रभावित होने लगी। एक गंभीर सांस्कृतिक समारोह सरकारी बाबुओं की सोच की भेंट चढ़ गया। स्थानीय लोगों और कलाकारों की उपेक्षा भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगी। चक्रधर समारोह छत्तीसगढ़ का एकमात्र ऐसा समारोह है जो किसी कला मर्मज्ञ व्यक्ति के नाम पर आयोजित होता है।
शास्त्रीय संगीत, कत्थक, नृत्य रंगमंच जिस तरह की एकाग्रता, साधना और गंभीरता की अपेक्षा करता है वह यहां से धीरे-धीरे नदारद हो रहे हैं। यह समारोह भीड़ जुटाने वाले कार्यक्रमों का समारोह बन गया। पहले यहां देशभर के ख्यातिनाम नृतक, संगीत के जानकार आते थे। नृत्य-संगीत से जुड़े विषय पर सेमीनार होता था। चक्रधर समारोह का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है। प्रसिद्ध संगीतज्ञ कुमार गंधर्व और हिंदी के पहले छायावादी कवि मधुकर पांडेय रायगढ़ से ही थे। राजा चक्रधर एक कुशल तबला वादक एवं संगीत व नृत्य में भी निपुण थे। उनके प्रयासों और प्रोत्साहन के फलस्वरूप ही यहां संगीत तथा नृत्य की नई शैली विकसित हुई। स्वतंत्रता पूर्व से ही गणेशोत्सव के समय यहां सांस्कृतिक आयोजन की एक समृद्ध परंपरा विकसित हुई, जिसने धीरे-धीरे एक बड़े आयोजन का रूप ले लिया। यह आयोजन इतना वृहद था कि राजा चक्रधर जी के देहावसान के बाद उनकी याद में ‘चक्रधर समारोहÓ के नाम से यहां के संस्कृतिकर्मियों तथा कलासाधकों ने वर्ष 1985 से दस दिवसीय सांस्कृतिक उत्सव की शुरुआत की। जिसके माध्यम से देश के सांस्कृतिक मानचित्र में छत्तीसगढ़ को स्थापित करने में बड़ी मदद मिली।
रायगढ़ रियासत में देश के प्रख्यात संगीतज्ञों का नियमित आना-जाना होता था। पारखी संगीतज्ञों के सानिध्य में रहने की वजह से गहरी शास्त्रीय संगीत के प्रति अभिरुचि जागी। 1924 में राज्याभिषेक के बाद अपनी परोपकारी नीति एवं मृदुभाषिता से रायगढ़ रियासत में शीघ्र अत्यन्त लोकप्रिय हो गए। कला पारखी के साथ विभिन्न भाषाओं के चलते रायगढ़ कत्थक घराना की नींव रखी। राजा चक्रधर सिंह ने कत्थक नृत्य की लखनऊ और जयपुर घरानों की शैलियों को मिलाकर रायगढ़ घराने की स्थापना की। उन्होंने कत्थक के लखनऊ और जयपुर घराने से जुड़े गुरुओं को रायगढ़ बुलाया, जिससे कत्थक की एक नई रायगढ़ शैली का विकास हुआ। उन्होंने जयपुर, बनारस और लखनऊ कत्थक घराना की तर्ज में रायगढ़ कत्थक घराना बनाकर कत्थक नृत्य की एक नई शैली विकसित की। जिसकी वजह से उन्हें संगीत सम्राट की उपाधि से विभूषित होकर रायगढ़ रियासत व छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित किये। राजा चक्रधर सिंह ने संगीत से संबंधित विश्व का सबसे विशाल 37 किलो वजनी साहित्य लिखा है। इन्हें संगीत सम्राट नहीं विश्व संगीत सम्राट की उपाधि प्राप्त है। इंगलैंड में इनके नाम पर फिल्म बन चुकी है। 7 अक्टूबर 1947 को रायगढ़ में आपका देहावसान हुआ।
इस समय छत्तीसगढ़ में इस बार चक्रधर समारोह को लेकर छत्तीसगढ़ में सियासी बवाल मच गया है। आम आदमी पार्टी ने भाजपा सरकार पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर के अपमान का आरोप लगाते हुए बड़ा आंदोलन छेडऩे का ऐलान किया है। पार्टी ने घोषणा की है कि पूरे प्रदेश के जिला मुख्यालयों में भाजपा मंत्री ओपी चौधरी और कवि कुमार विश्वास का पुतला दहन किया जाएगा। आप प्रदेश अध्यक्ष गोपाल साहू ने कहा कि 1985 से शुरु हुआ चक्रधर समारोह छत्तीगढ़ की सांस्कृतिक पहचान है, लेकिन मौजूदा सरकार ने इसे राजनीतिक दिखावे का मंच बना दिया है। उनका आरोप है कि इस बार समारोह में स्थानीय कवियों और कलाकारों की उपेक्षा कर बाहरी व्यक्तियों को तरजीह दी। गोपाल साहू ने कहा कुमार विश्वास अपनी शर्तों पर आते हैं और यह भी तय करते हैं कि समारोह में किसे बुलाना है। सवाल यह है कि क्या कुमार विश्वास भाजपा सरकार में मंत्री हैं या भाजपा के ब्रांड एंबेसडर।
छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय गायक और प्लेबैक सिंगर नितिन दुबे का कार्यक्रम बजट की कमी के कारण रद्द कर दिया गया। इस घटना ने छत्तीसगढ़ के कला जगत में रोष पैदा कर दिया है और स्थानीय कलाकारों के प्रति सरकारी उदासीनता पर सवाल खड़े किए हैं।
नितिन दुबे का नाम और फोटो समारोह के लिए छपे बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बोर्डिंग्स और आमंत्रण पत्रों पर प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था। कार्यक्रम से ठीक पहले उन्हें कथित तौर पर यह बताया गया कि बजट के अभाव में उन्हें अपनी प्रस्तुति के लिए आधी दरों पर काम करना होगा, अन्यथा उनका कार्यक्रम रद्द कर दिया जाएगा। जब नितिन दुबे ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तो उनका कार्यक्रम रद्द कर दिया गया।
छत्तीसगढ़ में यह घटना एक बहस का विषय बन गई है कि क्या छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को बढ़ावा देने वाले आयोजनों में स्थानीय कलाकारों को उचित सम्मान और पारिश्रमिक या अवसर मिल रहा है? जो समारोह कभी शास्त्रीय और स्थानीय कला को प्रोत्साहित करने के लिए जाना जाता था, अब व्यावसायिक ग्लैमर की ओर बढ़ गया है। इस तरह के विवाद पहले भी राज्योत्सव में फिल्मी कलाकारों को मुंबई से बुलाने पर भी विवाद हो चुका है।
यह समारोह इसी सोच और अनुशासन के साथ कत्थक नृत्य, रंगमंच को लेकर प्रारंभ किया गया था। लोकप्रियता के चक्कर में अब यह एक तरह की खिचड़ी समारोह में तब्दील होता जा रहा है। जिस तरह संस्कृति के नाम पर भजन संध्या होने लगी है, उसी तरह अब कत्थक घराने का यह आयोजन पापुलर एलिमेंट की भेंट चढ़ गया है।

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