दुनिया को पूँजीपति चला रहे हैं भ्रम या सच्चाई

-सुभाष मिश्र

लोकतंत्र को अमीरों की जरूरत है या नहीं, यह सवाल आज पूरी दुनिया में नई तरह से उठ रहा है। दुनिया में अमीरी और गरीबी की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। बहुत सारे देशों में कुछ खास पूंजीपति, कुछ बड़े कॉरपोरेट घराने और बहुराष्ट्रीय कंपनियां आर्थिक शक्ति के केंद्र बन गई हैं। अगर हम मौजूदा समय के युद्धों, अंतरराष्ट्रीय तनावों और वैश्विक राजनीति को भी देखें तो अक्सर यह चर्चा होती है कि हथियार उद्योग, तेल कारोबार और बड़े वित्तीय हितों का इन घटनाओं पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव रहता है। यह कहना अतिशयोक्ति हो सकती है कि वे पूरी दुनिया को चलाते हैं, लेकिन इतना जरूर है कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका बेहद प्रभावशाली हो गई है।
अमेरिका जैसे देशों में बड़े उद्योगपति और कॉरपोरेट समूह खुलकर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चंदा देते हैं। वहां चुनावी फंडिंग की व्यवस्था अपेक्षाकृत पारदर्शी है और यह पता चल जाता है कि किसने कितना धन दिया। स्वाभाविक है कि जो व्यक्ति या संस्था किसी राजनीतिक व्यवस्था को वित्तीय सहायता देती है, वह अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं के अनुरूप नीतियों की अपेक्षा भी रखती है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप खुद एक बहुत बड़े बिजनेसमैन और पूंजीपति हैं। ट्रंप का प्रगति रूप से कारोबार 60000 करोड़ रुपए से अधिक का है और कहा जाता है कि जो बेटी, दामाद या अन्य रिश्तेदारों के नाम से होगा या जो छुपाया जा रहा होगा। वह वह कारोबार की राशि तो गिनी नहीं जा सकती है। इसी कारण अमेरिका के आर्थिक नीतियां व्यवसाय केंद्रित हैं।
ट्रंप लगातार विदेश नीति और आर्थिक नीति बदलते रहते हैं। लोग उनका नासमझ या सनकी मानते या कहते हैं लेकिन ऐसा नहीं है। उनकी अमेरिकी विदेश नीति और आर्थिक नीतियां उनके बिजनेस के हिसाब से तय होती हैं। कहते हैं कि वह एक बहुत चालाक और धूर्त बिजनेसमैन है। उसके लिए देश से ज्यादा अपना बिजनेस पहले है। ईरान जैसे सामान्य समझे जाने वाले देश को डराने-धमकाने की कोशिश में अमेरिका की आर्थिक स्थिति खराब हो गई है। वह इस युद्ध में लगभग 10 लाख करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। हालांकि अमेरिका में एलन मस्क और जैफ बेजॉस जैसे बड़े पूंजीपति भी हैं। लेकिन अमेरिका शुरू से ही पूंजीवादी देश रहा है लेकिन अब उसके पूंजीवादी चेहरे के क्रूरता खुलकर सामने आई है। अब यह बात पूरी दुनिया जानती है कि ईरान पर अमेरिका का हमला तेल के व्यवसाय पर कब्जे की कूटनीति और नीयत थी और इसके दुष्परिणाम पूरी दुनिया को आर्थिक परिस्थितियों में भुगतने पड़े। भारत ही नहीं दुनिया के अधिकांश देश महंगाई की चपेट में आ गए हैं। ट्रंप का अपने ही देश के भीतर विरोध बढ़ा है और आखिरकार उसकी ईरान के आगे घुटने टेकने पड़े हैं। ऐसा सिर्फ अमेरिका में ही नहीं हो रहा है। चीन और रूस भी उद्योगपतियों के कब्जे में आते जा रहे हैं। दुनिया के अधिकांश देशों को पूंजीपति चला रहे हैं। यह बात पूरी दुनिया के आर्थिक सर्कल में एक जुमले की तरह है। पूंजीपति राजनीतिक दलों को बड़ी राशि चुनाव के समय देते हैं और चुनाव जीतने के बाद अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए उन पर दबाव बनाते हैं और उन राजनीतिक पार्टियों की यह मजबूरी हो जाती है कि वह उद्योगपतियों के हित में आमजन के हितों के खिलाफ जाकर भी निर्णय लेते हैं। इजरायल, ईरान, इराक, रूस, बड़े उदाहरण हैं और अब तो भारत पर भी आरोप लग रहे हैं। हालांकि भारत की राजनीतिक और आर्थिक संरचना अमेरिका से अलग है, फिर भी यह सवाल लगातार बना रहता है कि आर्थिक शक्ति और राजनीतिक शक्ति का संबंध कितना गहरा है।
आज दुनिया के कई देशों में यह स्थिति दिखाई देती है कि एक ओर कुछ लोग अपार संपत्ति के मालिक हैं और दूसरी ओर बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है। भारत में ही करोड़ों लोगों को मुफ्त या रियायती राशन की जरूरत पड़ रही है। यह व्यवस्था जरूरतमंद लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन साथ ही यह भी संकेत देती है कि समाज का एक बड़ा वर्ग अभी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। दूसरी तरफ दुनिया के सबसे अमीर लोगों के लिए निजी विमान, निजी द्वीप और अंतरिक्ष पर्यटन जैसी चीजें भी संभव हो रही हैं। यह अंतर केवल आय का नहीं, बल्कि अवसरों और जीवन-स्तर का भी अंतर है।
आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, लेकिन आर्थिक असमानता का प्रश्न अभी भी उतना ही प्रासंगिक है। एक गरीब व्यक्ति के लिए आज भी अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और सम्मानजनक रोजगार प्राप्त करना आसान नहीं है। यदि कोई परिवार अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला दे, स्वास्थ्य का ध्यान रख सके और सम्मानपूर्वक जीवन जी सके, तो वह भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। दूसरी ओर संपन्न वर्ग के लिए अवसरों की कोई कमी नहीं दिखाई देती।
इसी पृष्ठभूमि में लोकतंत्र और अमीरों की भूमिका पर बहस शुरू होती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि लोकतंत्र को अमीरों की जरूरत होती है। अमेरिकी विद्वान जॉन ओ. मैकगिनीस ने अपनी पुस्तक व्हाय डेमोक्रेसी नीड्स द रिच में तर्क दिया है कि संपन्न लोग समाज में स्थिरता लाते हैं। वे उद्योग स्थापित करते हैं, रोजगार पैदा करते हैं, नवाचार को बढ़ावा देते हैं और शिक्षा, कला तथा सामाजिक संस्थाओं के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराते हैं। कई बड़े उद्योगपतियों ने विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और शोध संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस दृष्टि से देखा जाए तो संपत्ति का निर्माण समाज के विकास का एक आवश्यक तत्व है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। जब संपत्ति कुछ हाथों में अत्यधिक केंद्रित हो जाती है, तब लोकतंत्र के सामने चुनौती खड़ी होती है। लोकतंत्र का आधार राजनीतिक समानता है, जबकि अत्यधिक आर्थिक असमानता धीरे-धीरे प्रभाव की असमानता में बदल सकती है, जिसके पास अधिक धन है, उसकी आवाज अधिक दूर तक पहुंचती है। वह मीडिया, प्रचार, लॉबिंग और विभिन्न माध्यमों से नीतियों को प्रभावित करता है। ऐसे में आम नागरिक को यह महसूस होने लगता है कि उसकी राजनीतिक शक्ति सीमित होती जा रही है।
अमेरिका में भी शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों के खिलाफ आंदोलन हुए हैं। वहां अमीरों पर अधिक कर लगाने की मांग उठती रही है। दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के प्रमुख निवेशकों में शामिल वॉरेन बफेट भी कई बार यह कह चुके हैं कि अमीरों को अधिक कर देना चाहिए। उनका मानना है कि समाज में अवसरों का विस्तार तभी संभव है जब संपत्ति का लाभ व्यापक रूप से लोगों तक पहुंचे।
भारत में भी कर व्यवस्था को लेकर बहस होती है। नौकरीपेशा वर्ग का कर अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जबकि कहा जाता है कि उद्योगपति सबसे ज्यादा कर चोरी करते हैं, क्योंकि उनकी कमाई सामने नजर नहीं आती है। इसलिए यह प्रश्न उठता है कि क्या आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंच रहा है या नहीं।
किसी भी समाज को उद्योगपतियों, निवेशकों और उद्यमियों की जरूरत होती है, क्योंकि वे आर्थिक गतिविधियों को गति देते हैं। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि लोकतंत्र की संस्थाएं मजबूत रहें, कर व्यवस्था न्यायपूर्ण हो, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं सबके लिए लगभग मुफ्त हों और विकास के अवसर सिर्फ अमीरों के लिए नहीं बल्कि सबके लिए रहें। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि लोकतंत्र को अमीरों की जरूरत है या नहीं। असली सवाल यह है कि लोकतंत्र आर्थिक शक्ति और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन कैसे बनाए। यदि यह संतुलन बना रहता है तो अमीरी भी समाज के लिए उपयोगी बन सकती है और लोकतंत्र भी मजबूत रह सकता है। लेकिन यदि यह संतुलन बिगड़ जाता है तो असमानता बढ़ती है, असंतोष पैदा होता है और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं।

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