बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर छत्तीसगढ़

बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर छत्तीसगढ़

-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ राज्य जब वर्ष 2000 में अस्तित्व में आया था, तब यह केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था, बल्कि एक नए विकास मॉडल की शुरुआत थी। छोटे राज्यों के पक्ष में भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा तर्क यही था कि छोटे राज्य अपनी स्थानीय आवश्यकताओं को बेहतर समझते हैं और विकास की गति तेज होती है। आज छत्तीसगढ़ उस तर्क की एक महत्वपूर्ण मिसाल बनकर सामने खड़ा है।

राज्य निर्माण के समय स्वास्थ्य सुविधाओं की तस्वीर बहुत सीमित थी। पूरे प्रदेश का भार मुख्यत: रायपुर के एकमात्र बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज पर था। बस्तर, सरगुजा, कोरिया, जशपुर, दंतेवाड़ा या कबीरधाम जैसे दूरस्थ जिलों के मरीजों को गंभीर बीमारी की स्थिति में सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था। यह केवल इलाज की समस्या नहीं थी, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी भी थी।
पिछले पच्चीस वर्षों में इस तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है। रायपुर में एम्स की स्थापना हुई, बिलासपुर में सुपर स्पेशलिटी संस्थानों का विकास हुआ। सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों का विस्तार हुआ। नर्सिंग और डेंटल कॉलेजों की संख्या बढ़ी तथा जिला अस्पतालों को आधुनिक सुविधाओं से जोडऩे का प्रयास किया गया। आज प्रदेश में सरकारी और निजी मिलाकर लगभग 15 मेडिकल कॉलेज संचालित हैं, जिनमें लगभग 2,300 से अधिक एमबीबीएस सीटें उपलब्ध हैं।

अब राज्य सरकार ने दंतेवाड़ा, मनेन्द्रगढ़, जशपुर (कुनकुरी), जांजगीर-चांपा और कबीरधाम में पांच नए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इन कॉलेजों को लेकर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) से आवश्यक स्वीकृतियों और मानकों की चुनौतियां भी सामने आई हैं, जिन्हें समयबद्ध ढंग से पूरा करना आवश्यक है। केवल मेडिकल कॉलेज खोल देना स्वास्थ्य क्रांति नहीं कहलाता। असली चुनौती उन कॉलेजों में योग्य प्रोफेसरों, विशेषज्ञ चिकित्सकों और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। प्रदेश के अनेक जिला अस्पतालों में हृदय रोग विशेषज्ञ, न्यूरो सर्जन, एनेस्थेटिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और अन्य विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बनी हुई है। कई डॉक्टर दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में लंबे समय तक सेवा देने से बचते हैं। सरकार लगातार संविदा नियुक्तियां निकालती है, लेकिन पद अपेक्षित संख्या में नहीं भर पाते। यही कारण है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सबसे बड़ी आवश्यकता केवल भवन निर्माण नहीं, बल्कि मानव संसाधन निर्माण है। डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, लैब टेक्नीशियन और विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक मजबूत श्रृंखला तैयार किए बिना स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती।

छत्तीसगढ़ की भौगोलिक परिस्थितियां भी इस चुनौती को और कठिन बनाती हैं। प्रदेश का लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है और बड़ी आबादी दूरस्थ एवं आदिवासी अंचलों में निवास करती है। ऐसे क्षेत्रों में सडक़, संचार और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किसी भी सरकार के लिए कठिन कार्य रहा है। इसके बावजूद पिछले वर्षों में सडक़ संपर्क, एंबुलेंस नेटवर्क, स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों तथा टेलीमेडिसिन जैसी व्यवस्थाओं का विस्तार हुआ है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का प्रयास तेज हुआ है। दरअसल, स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च केवल खर्च नहीं बल्कि सबसे बड़ा निवेश होता है। स्वस्थ नागरिक ही बेहतर शिक्षा प्राप्त करता है, बेहतर रोजगार पैदा करता है और राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देता है। यदि किसी परिवार की आधी आय इलाज में चली जाए तो विकास के सारे दावे खोखले हो जाते हैं।

छत्तीसगढ़ ने उद्योग, कृषि, सडक़, बिजली और सिंचाई के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। अब समय है कि स्वास्थ्य को भी विकास की केंद्रीय धुरी बनाया जाए। नए मेडिकल कॉलेजों के साथ सुपर स्पेशलिटी सेवाएं, मेडिकल रिसर्च, नर्सिंग शिक्षा, डिजिटल हेल्थ और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को समान प्राथमिकता दी जानी चाहिए। छोटे राज्य बनने का उद्देश्य केवल नया सचिवालय बनाना नहीं था, बल्कि आम आदमी तक बेहतर शासन पहुंचाना था। यदि दंतेवाड़ा का मरीज इलाज के लिए रायपुर न आए, बल्कि उसे अपने जिले में ही विशेषज्ञ उपचार मिल जाए; यदि जशपुर की बेटी डॉक्टर बनकर अपने जिले में सेवा दे। यदि बस्तर का आदिवासी आधुनिक चिकित्सा और संवेदनशील स्वास्थ्य सेवा दोनों प्राप्त कर सक, तभी राज्य निर्माण का सपना पूर्ण माना जाएगा।
छत्तीसगढ़ ने विकास की लंबी यात्रा तय की है। अब अगला पड़ाव स्पष्ट होना चाहिए, बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर छत्तीसगढ़, क्योंकि किसी भी विकसित राज्य की पहचान केवल ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि स्वस्थ नागरिकों से होती है।

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