जब कुलपति ने साहित्य को ‘अनुशासन’ सिखाया और साहित्यकार प्रतिरोध भूलकर चुप रहे

-सुभाष मिश्रसाहित्य अकादमी और गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त आयोजन में वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़...

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जेएनयू, नारे और राष्ट्र: अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम लोकतांत्रिक विवेक

-सुभाष मिश्रभारत के लोकतंत्र में विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने वाले संस्थान नहीं होते, बल्कि वे उस बौद्धिक च...

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एसआईआर: मतदाता सूची का शुद्धिकरण या लोकतंत्र की परीक्षा?

-सुभाष मिश्रउत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की ड्राफ्ट मतदाता सूची सामने आते ही लोकतंत्र के सबसे बुनियादी आधार—मतदाता—पर ही सवाल खड़े हो गए ह...

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