-सुभाष मिश्र
दिल्ली की शराब नीति से जुड़े मामलों में लंबी जांच, गिरफ्तारियां और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बाद जब अदालतें कई आरोपियों को राहत देती हैं या सबूतों की कमजोरी पर सवाल उठाती हैं, तो बहस केवल एक केस तक सीमित नहीं रहती। यह बहस उस बड़े सवाल में बदल जाती है कि क्या भारत की राजनीति में आरोप ही सजा बनते जा रहे हैं। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे नेताओं पर कार्रवाई, जेल और बाद में न्यायिक राहत—इस पूरे क्रम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि जांच एजेंसियों, न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिक नैरेटिव के बीच संतुलन कहां है।
आम आदमी पार्टी एक आंदोलन से निकली राजनीतिक शक्ति थी, जिसने ईमानदारी, पारदर्शिता, सूचना के अधिकार और लोकपाल जैसे मुद्दों पर राजनीति की नई भाषा दी। युवाओं और शहरी मध्यवर्ग में यह विश्वास बना कि राजनीति का एक वैकल्पिक मॉडल संभव है। लेकिन जैसे-जैसे जांच शुरू हुई और गिरफ्तारी हुई, सार्वजनिक विमर्श का केंद्र आरोप बन गए। राजनीति में यह एक स्थापित वास्तविकता है कि आरोप लगते ही छवि प्रभावित होती है, जबकि दोष सिद्ध होने की प्रक्रिया वर्षों चलती है। इस अंतराल में चुनाव हो जाते हैं, नेतृत्व कमजोर होता है और दल की विश्वसनीयता पर स्थायी असर पड़ता है।
यहीं जांच एजेंसियों की भूमिका पर बहस तेज होती है। भारत में आर्थिक अपराध और राजनीतिक मामलों की जांच करने वाली प्रमुख संस्थाओं केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय के आंकड़े यह बताते हैं कि कार्रवाई और अंतिम सजा के बीच बड़ा अंतर है। सीबीआई का समग्र conviction rate परंपरागत रूप से ऊंचा बताया जाता है (अक्सर 65-70फीसदी के आसपास), लेकिन यह आंकड़ा मुख्यत: पुराने और नियमित आपराधिक मामलों से प्रभावित होता है। हाई-प्रोफाइल राजनीतिक और आर्थिक मामलों में यह दर काफी कम और लंबी अवधि वाली होती है। ईडी के मामलों में स्थिति और जटिल है, बड़ी संख्या में छापे, पूछताछ और गिरफ्तारी होती है, लेकिन अंतिम सजा के मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है क्योंकि वित्तीय अपराधों में कानूनी प्रमाण और ट्रायल लंबा चलता है।
यही वह बिंदु है जहां ‘एजेंसियां बनाम लोकतंत्र का नैरेटिव जन्म लेता है। विपक्ष का आरोप रहता है कि एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक दबाव के लिए होता है। सत्ता पक्ष कहता है कि भ्रष्टाचार पर कार्रवाई अनिवार्य है और अदालतें स्वतंत्र हैं। वास्तविकता यह है कि दोनों बातें एक साथ मौजूद हो सकती हैं। जांच जरूरी भी है और जांच की निष्पक्षता पर भरोसा उतना ही जरूरी है। लोकतंत्र में एजेंसियों की विश्वसनीयता ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि सार्वजनिक धारणा बन जाए कि कार्रवाई चयनात्मक है, तो संस्थागत भरोसा कमजोर होता है, भले अदालतें बाद में संतुलन बना दें।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे गंभीर पहलू न्यायिक प्रक्रिया की अवधि है। किसी नेता, अफसर या सार्वजनिक व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होना, गिरफ्तारी और वर्षों तक ट्रायल चलना, यह स्वयं एक राजनीतिक परिणाम पैदा करता है। बाद में दोषमुक्त होने पर कानूनी राहत मिलती है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक नुकसान की भरपाई नहीं होती। कई मामलों में यही ‘प्रक्रिया ही दंड (process as punishment) जैसी स्थिति बन जाती है, जहां अंतिम फैसला आने से पहले ही करियर, चुनावी संभावनाएं और सार्वजनिक छवि प्रभावित हो जाती है।
दिल्ली शराब नीति विवाद का व्यापक संकेत यही है कि आधुनिक राजनीति में नैरेटिव की शक्ति बहुत बड़ी हो गई है। आरोप, मीडिया कवरेज और जांच की खबरें मिलकर एक धारणा बनाती हैं, जबकि अदालत का फैसला अक्सर वर्षों बाद आता है। इस अंतराल में जनता के मन में जो छवि बनती है, वही राजनीतिक वास्तविकता तय करती है। इसलिए यह सवाल केवल किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की प्रकृति का है। क्या हम आरोप और दोष सिद्ध होने के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रख पा रहे हैं।
निष्पक्ष राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच होना लोकतंत्र की आवश्यकता है, लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि जांच की गति, पारदर्शिता और अंतिम परिणाम पर सार्वजनिक भरोसा बना रहे। यदि बड़ी संख्या में लोग लंबे समय जेल में रहने के बाद दोषमुक्त होते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत न्याय का प्रश्न नहीं रहता। यह संस्थागत दक्षता, जांच की गुणवत्ता और राजनीतिक संस्कृति तीनों पर प्रश्नचिह्न बन जाता है।
अंतत: यह बहस किसी एक पार्टी की जीत या हार की नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक संतुलन की बहस है जिसमें एजेंसियां स्वतंत्र रहें, राजनीति जवाबदेह रहे और न्यायिक प्रक्रिया समयबद्ध हो। आरोप जरूरी हो सकते हैं, पर लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि अंतिम सत्य आरोप नहीं, बल्कि प्रमाण और न्यायिक निष्कर्ष तय करें। जब तक यह संतुलन स्पष्ट और तेज नहीं होगा, तब तक भारतीय राजनीति में आरोप और नैरेटिव दोनों, वास्तविक फैसलों से अधिक प्रभावशाली बने रहेंगे।
आरोप, एजेंसियां और लोकतंत्र का नैरेटिव

28
Feb