बिलासपुर हाईकोर्ट: आपसी सहमति से हुए तलाक की डिक्री रद्द करने से इनकार, अदालत ने कहा भावनाओं से नहीं कानून से चलता है काम

बिलासपुर

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक अनोखा मामला सामने आया है, जहां आपसी सहमति से तलाक लेने के बाद पति-पत्नी ने फिर से साथ रहने का निर्णय लिया और अदालत द्वारा जारी तलाक की डिक्री को रद्द करने की मांग की। हालांकि, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कानूनी तौर पर अब ऐसा करना संभव नहीं है।

मामले के अनुसार, बिलासपुर के सिविल लाइन क्षेत्र की रहने वाली एक महिला का विवाह मोपका निवासी युवक से हुआ था। वैवाहिक जीवन में कड़वाहट आने के बाद दोनों ने अलग होने का फैसला किया और परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी लगाई। आपसी सहमति के आधार पर फैमिली कोर्ट ने तलाक की डिक्री पारित कर दी थी।

तलाक के बाद बदला फैसला

हैरानी की बात यह है कि कानूनी रूप से अलग होने के महज दो महीने बाद ही दोनों के रिश्तों में फिर से नरमी आ गई। पति-पत्नी ने दोबारा साथ रहने का मन बनाया और इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में दलील दी गई कि उनके संबंध अब सामान्य हो चुके हैं। प्रमाण के तौर पर उन्होंने अपनी शादी की सालगिरह साथ मनाने, मथुरा की यात्रा करने के रेल टिकट और साथ बिताए पलों की तस्वीरें भी अदालत में पेश कीं।

कानूनी प्रक्रिया का हवाला

जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। बेंच ने स्पष्ट किया कि जब तलाक दोनों पक्षों की आपसी रजामंदी से हुआ है, तो अब अपील की कोई गुंजाइश नहीं बचती। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि स्थापित तथ्यों और प्रक्रियाओं के आधार पर चलता है।

इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि एक बार आपसी सहमति से तलाक की डिक्री जारी होने के बाद उसे इस आधार पर वापस नहीं लिया जा सकता कि पक्षकारों ने बाद में अपना इरादा बदल लिया है।


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