-सुभाष मिश्र
यौन हिंसा और विशेषकर बच्चों व महिलाओं के खिलाफ अपराध आज केवल भारत की समस्या नहीं रह गए हैं, बल्कि यह एक वैश्विक चिंता का विषय बन चुके हैं। डिजिटल युग, सत्ता-संपन्न नेटवर्क और संगठित अपराध के नए रूपों ने इन अपराधों को और जटिल बना दिया है। ऐसे समय में न्यायपालिका की संवेदनशीलता केवल कानूनी प्रक्रिया का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज में भरोसा कायम करने की मूल शर्त बन जाती है।
इसी संदर्भ में हाल में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया है कि वह यौन हिंसा से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रतिक्रिया को अधिक मानवीय, संवेदनशील और प्रभावी बनाने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित कर तीन महीने में व्यापक दिशानिर्देश तैयार करे। यह आदेश उस विवादास्पद फैसले की सुनवाई के दौरान आया जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाबालिग के साथ हुई गंभीर छेड़छाड़ को बलात्कार या उसके प्रयास की श्रेणी में नहीं माना था।
इस आदेश का महत्व केवल एक फैसले को सुधारने तक सीमित नहीं है। यह न्यायिक सोच में बदलाव का संकेत है। ऐसा बदलाव जिसमें पीडि़ता के अनुभव, गरिमा और मनोवैज्ञानिक प्रभाव को कानूनी तकनीकीताओं से ऊपर रखने की कोशिश दिखाई देती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक भाषा सरल हो, स्थानीय भाषाओं की समझ हो और उन शब्दों-हावभावों को भी चिन्हित किया जाए जो सामाजिक रूप से सामान्य दिखते हैं लेकिन कानून की दृष्टि में आक्रामक या दंडनीय हो सकते हैं।
याचिकाकर्ता संगठन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की पहल भी इस मामले में महत्वपूर्ण रही, जिसने न केवल इस फैसले को चुनौती दी बल्कि न्यायिक संवेदनशीलता को संस्थागत रूप देने की मांग की। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायिक सुधार केवल अदालतों के भीतर नहीं बल्कि नागरिक समाज की सक्रियता से भी आगे बढ़ते हैं।
दरअसल, यह पूरा विमर्श ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया भर में प्रभावशाली लोगों से जुड़े यौन अपराधों के खुलासे लगातार चर्चा में हैं। ऐसे मामलों ने यह प्रश्न और तीखा कर दिया है कि जब अपराधों में शक्तिशाली लोग शामिल हों तो न्याय व्यवस्था कितनी प्रभावी रहती है।
भारत की स्थिति पर नजर डालें तो पिछले पाँच वर्षों के रुझान चिंता बढ़ाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाओं के खिलाफ दर्ज कुल अपराध 2020 के लगभग 3.7 लाख से बढ़कर हाल के वर्षों में 4.4 लाख के आसपास पहुँचे हैं, जबकि बलात्कार के मामले हर वर्ष लगभग 31-32 हजार के स्तर पर बने हुए हैं। बच्चों के खिलाफ अपराधों में भी वृद्धि दर्ज हुई है और पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामले कई वर्षों में 50 हजार के आसपास या उससे ऊपर बने रहे हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि चार्जशीट दर अपेक्षाकृत ऊँची होने के बावजूद सजा दर सीमित रहती है और बड़ी संख्या में मामले लंबित रहते हैं। यानी निर्भया के बाद कानून सख्त होने और दंड प्रावधान कठोर होने के बावजूद अपराध की प्रवृत्ति पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाई है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि वृद्धि बेहतर रिपोर्टिंग का संकेत भी हो सकती है।
यहीं न्यायपालिका की नई पहल महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि दिशानिर्देश वास्तव में प्रशिक्षण, भाषा, पीडि़त-केंद्रित प्रक्रिया और न्यायाधीशों की संवेदनशीलता में बदलाव ला सके, तो इसका असर फैसलों की गुणवत्ता पर पड़ेगा। परंतु बड़ा प्रश्न यही है क्या दिशानिर्देश पर्याप्त होंगे?
समस्या का एक पहलू यह भी है कि यौन अपराधों में सत्ता, प्रभाव और सामाजिक दबाव अक्सर न्याय की राह में बाधा बनते हैं। जब आरोपी प्रभावशाली हों, जांच प्रभावित हो, या सामाजिक कलंक पीडि़त को चुप करा दे, तब कानून की मौजूदगी के बावजूद न्याय दूर हो जाता है। इसलिए न्यायिक सुधार के साथ पुलिस जांच, फोरेंसिक क्षमता, गवाह संरक्षण और सामाजिक जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है।
इसके बावजूद अदालत की यह पहल उम्मीद जगाती है। यह संकेत है कि न्यायपालिका कम से कम इस बात को स्वीकार कर रही है कि संवेदनशीलता भी न्याय का हिस्सा है, केवल कानून की व्याख्या नहीं। यदि यह सोच संस्थागत रूप लेती है तो भविष्य में विवादास्पद टिप्पणियों और तकनीकी आधार पर गंभीर अपराधों को हल्का करने की प्रवृत्ति कम हो सकती है।
अंतत: सवाल केवल यह नहीं है कि अदालत अपराध रोक सकती है या नहीं। अपराध रोकना समाज और राज्य की साझा जिम्मेदारी है। लेकिन अदालत यह तय करती है कि पीडि़त को न्याय मिला या नहीं, और न्याय व्यवस्था पर भरोसा बना या नहीं।
इसीलिए यह पहल केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं बल्कि न्याय की नैतिक दिशा तय करने की कोशिश है। यौन अपराधों के दौर में समाज की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि कानून कठोर हो, प्रक्रिया संवेदनशील हो और न्याय— स्पष्ट, समझने योग्य और भरोसेमंद हो।