कर्ज के सहारे चलती राज्य व्यवस्था : भविष्य के संकट

-सुभाष मिश्र
भारतीय संघीय ढांचे में राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता एक महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती है लेकिन आज यही स्वायत्तता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां विकास और कर्ज के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। भारत के अधिकांश राज्य आज भारी कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं और चिंताजनक बात यह है कि यह स्थिति अपवाद नहीं, लगभग पूरे भारत में सामान्य प्रशासनिक प्रवृत्ति बनती जा रही है।
भारतीय रिज़र्व बैंक और विभिन्न वित्त आयोगों की रिपोर्टों के अनुसार, राज्यों का कुल कर्ज लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2024-25 के आसपास राज्यों का कुल बकाया कर्ज सकल राज्य घरेलू उत्पाद के लगभग 30 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुका है। यह आंकड़ा केवल एक सांख्यिकीय संकेत नहीं, बल्कि उस वित्तीय दर्शन का आईना है , जिसमें वर्तमान की राजनीतिक प्राथमिकताएं भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर भारी पड़ रही हैं।
यदि हम राज्यों के स्तर पर देखें तो स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाती है। पंजाब देश के सबसे अधिक कर्जग्रस्त राज्यों में शामिल है। पंजाब पर कर्ज उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद के लगभग 45 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। राज्य के बजट का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा केवल ब्याज भुगतान में चला जाता है।
इसी प्रकार राजस्थान और केरल भी गंभीर ऋण दबाव का सामना कर रहे हैं। राजस्थान का कर्ज उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद का लगभग 40 प्रतिशत है, जबकि केरल में यह अनुपात 38 प्रतिशत के आसपास है। पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल लंबे समय से कर्ज के जाल में फंसा हुआ है। पश्चिम बंगाल का कुल कर्ज 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है, और राज्य के बजट का लगभग 18 से 19 प्रतिशत हिस्सा ब्याज भुगतान में जाता है।
दक्षिण भारत के अपेक्षाकृत समृद्ध माने जाने वाले राज्य तमिलनाडु पर भी कर्ज 7 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुँच चुका है। वहीं महाराष्ट्र पर कर्ज 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़
मध्य भारत के राज्यों की स्थिति भी अब चिंता से मुक्त नहीं है। मध्य प्रदेश पर वर्ष 2024-25 के आसपास कुल कर्ज लगभग 3.8 से 4 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुँच चुका है। यह राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद का लगभग 30 से 32 प्रतिशत है। मध्य प्रदेश के बजट का लगभग 13 से 15 प्रतिशत हिस्सा ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है। इसका अर्थ यह है कि राज्य की विकास योजनाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कर्ज की देनदारी के कारण सीमित हो जाता है।

इसी प्रकार छत्तीसगढ़, जिसे अपेक्षाकृत वित्तीय रूप से संतुलित राज्य माना जाता था, अब तेजी से कर्ज के रास्ते पर बढ़ रहा है। छत्तीसगढ़ पर कुल कर्ज लगभग 1.2 से 1.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है। यह उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद का लगभग 25 से 28 प्रतिशत है। राज्य के बजट का लगभग 10 से 12 प्रतिशत हिस्सा ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है।
छत्तीसगढ़ की स्थिति फिलहाल अन्य बड़े कर्जग्रस्त राज्यों जितनी गंभीर नहीं है, लेकिन जिस गति से कर्ज बढ़ रहा है, वह भविष्य के लिए चेतावनी अवश्य है। विशेष रूप से सामाजिक योजनाओं और सब्सिडी आधारित खर्चों में वृद्धि ने राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ाया है।
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आखिर राज्य इतने बड़े पैमाने पर कर्ज क्यों ले रहे हैं ? इसका एक कारण यह है कि राज्यों की आय के स्रोत सीमित हैं, जबकि व्यय लगातार बढ़ रहे हैं। जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों की कर लगाने की स्वतंत्रता पहले की तुलना में कम हुई है। दूसरी ओर लोकलुभावन योजनाओं की होड़ जिसे आमजन रेवडिय़ां बांटना कहते हैं, इसने व्यय को असामान्य रूप से बढ़ा दिया है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह है कि कर्ज लेने पर कोई कठोर राजनीतिक या नैतिक नियंत्रण नहीं रह गया है। संविधान में वित्तीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन कानून का प्रावधान है, लेकिन व्यवहार में इसका पालन शिथिल हो चुका है।
सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह कर्ज विकास के उत्पादक क्षेत्रों में कम और उपभोग आधारित योजनाओं में अधिक खर्च हो रहा है। यदि कर्ज लेकर सड़क, उद्योग, शिक्षा या स्वास्थ्य जैसी संरचनात्मक परिसंपत्तियाँ बनाई जाएं तो भविष्य में उससे आय उत्पन्न हो सकती है। लेकिन यदि कर्ज केवल राजनैतिक लोकप्रियता बनाए रखने के लिए खर्च हो, तो वह आने वाली पीढिय़ों पर एक निष्क्रिय बोझ बन जाता है। यह एक बड़ा संकट है। यह स्थिति एक प्रकार के वित्तीय दुष्चक्र को जन्म दे रही है। राज्य पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए नया कर्ज ले रहे हैं।
आज कर्ज लेना आसान विकल्प लग सकता है, लेकिन यह सुविधा भविष्य की कठिनाइयों की भूमिका भी लिख रही है। यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में राज्य सरकारें विकास की योजनाएं बनाने के बजाय केवल कर्ज चुकाने की मशीन बनकर रह जाएंगी।
यह केवल अर्थशास्त्र का प्रश्न नहीं, बल्कि शासन की दूरदर्शिता की परीक्षा भी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *